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मंगलवार, 20 मई 2008

मेरे पहले राजनीतिक एवं साहित्यिक गुरु डॉ. रामविलास शर्मा : डॉ. शिव कुमार मिश्र

डॉ. सूर्यदीन यादव
आपकी इजाजत हो तो मैं इस साक्षात्कार की शुरुआत कुछ व्यक्तिगत प्रश्नों से करना चाहता हूँ।
पूछिए।
सबसे पहले आप अपने घर-परिवार तथा विद्यार्थी जीवन पर थोड़ा प्रकाश डालें, जैसे कि आपकी शिक्षा कहाँ और किन परिस्थितियों में हुई? आदि।
व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तिगत जीवन संघर्षों के बारे में बात करने में मुझे हमेशा बहुत संकोच रहा है। आपने पूछा है, इस कारण केवल एक प्रश्न के अन्तर्गत ही इस बारे में मैं बात करूँगा। मेरे व्यक्तिगत जीवन में ऐसी कोई खास बात नहीं है, जिसको अलग से रेखांकित किया जाए। सामान्य निम्न मध्यम वर्ग के परिवार में जन्म हुआ। माता-पिता, दो बड़े भाई तथा दो छोटी बहनें, संयुक्त परिवार का यही रूप रहा। पिताजी डाकखाने के मुलाजिम थे। आर्थिक विपन्नता भले न हो, सम्पन्नता भी नहीं रही। भाइयों के विवाह हुए और इण्टरमीडिएट की परीक्षा देते ही मेरा अपना विवाह भी हो गया। जब सन्‌ १९५२ में मैंने एम.ए. पास किया, तब तक परिवार 17-18 सदस्यों का हो चुका था। इच्छा थी लखनऊ या इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने की, परन्तु आर्थिक साधन नहीं थे। कानपुर से ही सन्‌ ४६ में मैट्रिक, सन्‌ ४८ में इण्टरमीडिएट, सन्‌ ५० में बी.ए. तथा सन्‌ १९५२ में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इण्टर से लेकर एम.ए. तक कानपुर के डी.ए.वी. कालेज का छात्र रहा। १९५३ में एल.एल.बी. की परीक्षा भी वहीं से उत्तीर्ण की। तब तक मैं एक बेटी का पिता बन चुका था। संप्रति-मैं तीन बेटियों का पिता हूँ। तीन बेटियाँ अपने-अपने विषयों में पी-एच.डी. हैं, परन्तु सभी गृहणियाँ हैं। नौकरी किसी ने नहीं की। सब अपने-अपने घर-परिवार में सुखी हैं।
इच्छा थी हिन्दी साहित्य में शोधकार्य करने की। परन्तु यह भी संकल्प था कि शोध या तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में करूँगा या आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी के निर्देशन में, जो उस समय हिन्दी के सबसे ख्यात आचार्य थे। किसी से भी व्यक्तिगत परिचय नहीं था। आर्थिक साधन ऐसे नहीं थे कि बनारस या सागर जाकर शोध कार्य करूँ। दोनों आचार्यों को पत्र लिखता रहता था, परन्तु उत्तर नहीं मिलते थे। सन्‌ १९५२ से ५६ तक का समय दूसरी उधेड़ बुन में बीता।
कानपुर के परेड मार्केट में किताबों की एक प्रसिद्ध दुकान किताब घर के नाम से थी। उसके मालिक मेरे एक दूर के रिश्तेदार थे। वे प्रकाशक भी थे। एम.ए. में अध्ययन के दौरान और उसके बाद भी मेरा अधिक समय उनकी दुकान में ही बीतता था। वे मेरी परेशानी और मेरी इच्छा को जानते थे। उन्होंने मेरे सामने दो-एक छात्रोपयोगी पुस्तकें लिखने का प्रस्ताव किया, ताकि मैं कुछ कमा सकूँ और घर परिवार को सहयोग दे सकूँ। मैंने कुंजियाँ लिखने से साफ इंकार कर दिया। अन्ततः उनकी प्रेरणा से १९५३ में जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर ढाई-तीन सौ पृष्ठों की एक आलोचनात्मक पुस्तक लिखी, जिसकी सामग्री का आधार वे नोट्स थे जो मैंने एम.ए. के अध्ययन के दौरान तैयार किये थे। साथ में कामायनी की टीका भी की, जिसका आधार उस समय प्रकाशित श्री विश्वंभर मानव की टीका थी। इसे संयोग कहें या मेरा भाग्य कि पुस्तक का पहला संस्करण एक वर्ष में ही बिक गया। लगभग ६०० रुपये रॉयल्टी के मिले, जो मैंने प्रकाशक के पास जमा कर दिये। सन्‌ १९५४-५५ में एक दूसरी पुस्तक बाबू वृन्दालाल वर्मा के उस समय तक प्रकाशित सारे ऐतिहासिक-सामाजिक उपन्यासों को केन्द्र में रखकर लिखी। यह पुस्तक भी तीन सौ पृष्ठों की थी। इसका पहला संस्करण भी एक वर्ष के भीतर बिक गया। जहाँ तक मेरी जानकारी है, बाबू वृंदावन लाल वर्मा के उपन्यास साहित्य पर हिन्दी में यह पहली पुस्तक थी। इसकी रॉयल्टी भी ६-७ सौ रुपये मिली। अब मेरे पास लगभग डेढ़ हजार रुपये थे। अब मैं बाहर शोध के लिये जा सकता था। पिताजी बहुत उदार मानस के थे। परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्होंने मुझे आश्वस्त किया और मुझे आशीर्वाद दिया। ये दोनों पुस्तकें मैंने उस समय के ख्यात सभी विद्वानों को भेजी थीं, जिनके पत्रभी मिले थे। उन विद्वानों में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और आचार्य वाजपेयी जी भी थे। अकस्मात सन्‌ १९५६ में आचार्य वाजपेयी का एक कार्ड मुझे मिला कि मैं उनसे सागर में मिलूँ। मैं तत्काल सागर पहुँचा और उन्होंने मुझे अपने निर्देशन में शोध करने की अनुमति दे दी। दो वर्षों तक अपने कमाये कुछ पैसों के आधार पर शोध कार्य चला। बीच में आचार्य वाजपेयी ने एक प्रोजेक्ट के तहत कुछ आर्थिक सहायता दी और मेरा कार्य निर्विहन पूरा हो गया। मैं आचार्य वाजपेयी जी का स्नेह भाजन तो बना ही, सन्‌ १९५९ में सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में मेरी नियुक्ति भी हो गई। यह है मेरे इस समय तक के जीवन की संक्षिप्त कथा। जैसा मैंने कहा कि इसमें ऐसा कुछ भी खास नहीं, जो मेरे जैसे तमाम दूसरे लोगों के जीवन में घटा हो।
मार्क्सवाद की ओर झुकाव कब और कैसे हुआ?
कानपुर के जिस मुहल्ले में मेरा बचपन बीता, मैंने बचपन से ही मजदूरों के जुलूसों का एक सिलसिला देखा। कानपुर एक औद्योगिक शहर है। मजदूर हड़ताल करते, जुलूस निकालते, बड़ी-बड़ी सभाएँ होतीं, मेरे मन पर शुरुआती दौर में इन सब बातों का सघन प्रभाव रहा। सन्‌ १९६४ में मैट्रिक पास कर डी.ए.वी. कालेज में इण्टर का छात्र बना और उसी समय छात्रों की वामपंथी राजनीति से जुड़ गया। कालेज में छात्रों के तीन संगठन थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, कांग्रेस की स्टूडेंट्स, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी का आल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन। कालेज में इंटर से एम.ए. तक सबसे मेधावी छात्रों का संबंध फेडरेशन से था। मेरा संपर्क भी फेडरेशन के छात्रनेताओं से हुआ और मैं उनके गोल में शामिल हो गया। बीच-बीच में परेड स्थित कामरेड पार्टी के दफ्तर के चक्कर भी लगाने लगे। इसी बीच यशपाल के उपन्यास और राहुल सांकृत्यायन की किताबें भी पढ़ीं, जिनके जरिये भी मार्क्सवाद को जाना समझा। जैसे-जैसे आगे की कक्षाओं में बढ़ता गया, अंग्रेजी में प्रकाशित मार्क्सवादी साहित्य की पुस्तकें भी पढ़ीं। जब एम.ए. में था तभी सन्‌ १९५२ में प्रगतिशील लेखक संघ के किसी कार्यक्रम में डॉ. रामविलास शर्मा कानपुर आये थे। कानपुर के प्रगतिशील साथियों ने उनसे मेरा परिचय कराया और उनका स्नेह भी मुझे मिला।
सन्‌ १९५२ से ५६ तक जब मैं सड़कों पर था, प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और इसी दौर में मार्क्सवाद का जितना अध्ययन कर सकता था किया। डॉ. रामविलास शर्मा से पत्राचार भी इसी समय से प्रारम्भ हुआ। वे मेरे राजनीति और साहित्य के पहले गुरु हैं। सन्‌ १९५३ में कानपुर की स्टूडेन्ट फेडरेशन की इकाई का अध्यक्ष भी रहा और प्रगतिशील लेखक संघ में मेरी सक्रियता तो थी ही। कानपुर के उस समय के ख्यात प्रगतिशील लेखकों और विचारकों से घनिष्ट संबंध भी बने, जिनमें श्री शिव वर्मा और शीलजी मुख्य हैं।
आपके गुरुजी, आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी भिन्न विचारों और संस्कारों के व्यक्ति थे। फिर भी आप उनके प्रियपात्रकैसे बन गये। उनके साथ आपने कैसे निभाया।
आचार्य वाजपेयी के पास मैं सन्‌ १९५६ के अंत में गया और जैसा मैं कह चुका हूँ कि इससे पहले सन्‌ १९५२ में रामविलास शर्मा जी से मेरी भेंट हो चुकी थी। पत्राचार भी शुरू हो गया था और उनसे दो-तीन बार मिल भी चुका था। आचार्य वाजपेयी से मिलने सागर जाने से पहले मैं डॉ. रामविलास शर्मा से मिला भी था और उन्हें अपने सागर जाने की बात बता दी थी। वे आचार्य वाजपेयी के गाँव-घर के पास के रहने वाले थे ही, उनके कर्म विचारों और उनके साहित्य से भली-भाँति परिचित भी थे तथा उनके मन में आचार्य वाजपेयी के प्रति आदर का भाव भी था। उन्होंने मुझे आश्वत किया था कि जनतांत्रिक सोच के आचार्य वाजपेयी के निर्देशन में निर्विहन अपना शोधकार्य कर सकूँगा।
लगभग एक वर्ष तक मैंने अपनी वैचारिक आस्थाओं और रामविलास जी से अपने संबंधों के बारे में नहीं बताया। जब मुझे विश्वास हो गया कि मैं स्नेह भाजन बन चुका हूँ, मैंने उन्हें सब कुछ बताया। उन्होंने मेरी बातें ध्यान से सुनी और मुझे अपने अन्तर्गत शोध की अनुमति दे दी। उन्होंने मुझसे कहा : डॉ. रामविलास शर्मा मेरे मित्र हैं और साहित्य और जीवन में प्रगतिशील विचारों का मैं हमेशा समर्थक रहा हूँ। प्रगतिशील लेखक संघ की काशी इकाई का अध्यक्ष भी मैं रहा हूँ और मार्क्सवाद की शक्ति तथा सीमाओं, दोनों का मुझे बोध है। तुम्हें जो विषय दिया गया है, उस पर कार्य करो और सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो।''
सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में मेरी नियुक्ति तो हुई ही। जब तक आचार्य वाजपेयी जीवित रहे, मैं उनकी सघन आत्मीयता के दायरे में रहा। शोध के दौरान उन्होंने कभी भी मुझे विचार के स्तर पर दबाने की कोशिश नहीं की। हाँ, मेरे अतिवादी आग्रहों को जब-तब संतुलित जरूर किया। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है। कुछेक गहन संकटों के क्षण में, मसलन सन्‌ १९६२ में चीनी आक्रमण के समय जब कम्युनिस्टों की व्यापक धरपकड़ हो रही थी, उन्होंने एक रात मुझे बुलाया और कहा कि उन्हें स्थानीय खुफिया विभाग से सूचना मिली है कि किसी ने मेरे बारे में कुछ लिखकर भेजा है। मेरे परिवार की देखरेख की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुझे १५ दिनों के लिए कहीं बाहर चले जाने जाने के लिए कहा। बाद में उनका संदेश पाकर मैं सागर लौटा, तब तक संकट के बादल छट चुके थे। उन्होंने मुझसे यहाँ तक कहा था कि यदि तुम गिरफ्तार हो जाते हो, तो मैं अदालत में तुम्हारी जमानत लूँगा। ऐसे उदार गुरु को क्या कोई कभी भूल सकता है।
आचार्य वाजपेयी निश्चय ही रोमानी मनोभूमि के समीक्षक विचारक थे। कई मुद्दों पर मार्क्सवाद से उनकी असहमति थी। परंतु वे निहायत जनतांत्रिक सोच के व्यक्ति थे। मेरी उनसे अनेक बार लंबी बहसें हुईं। तब मेरे साथ मेरे मार्क्सवादी साथी चंद्रभूषण तिवारी भी हुआ करते थे, जो आचार्य वाजपेयी के ही निर्देशन में शोधकार्य कर रहे थे। जो स्नेह आचार्य वाजपेयी का मुझे मिला और जो उनके बारे में मेरे अनुभव हैं, वही चन्द्रभूषण तिवारी के भी थे। आचार्य वाजपेयी की मनोभूमि पर उस समय हम लोग छाए हुए थे बहसें होती थीं, वैसी ही, जैसी गुरु-शिष्य के बीच में होती हैं या होनी चाहिए। आचार्य वाजपेयी के नियंत्राण पर डॉ. रामविलास शर्मा, नागार्जुन, राहुल जी, केदारनाथ अग्रवाल सभी सागर आये। मेरा मानना है कि कुल मिलाकर वाजपेयी के विचार मार्क्सवाद-विरोधी नहीं हैं। यद्यपि जैसा मैंने कहा कि कुछ मुद्दों पर उनकी असहमतियाँ जरूर रहीं। डॉ. रामविलास शर्मा ने उनके बारे में मुझसे जो कुछ भी कहा था, वह एकदम सत्य था। उन्होंने मुझसे एक बार यह भी कहा था कि तुम लोग वाजपेयी जी को मार्क्सवादी बनाने का उपक्रम न करना। वे जैसे हैं, उसी रूप में हमारे मद्दगार हैं। उनके विचारों का इस्तेमाल करो। रामविलास जी की सलाह को मैंने बराबर ध्यान में रखा और आचार्य वाजपेयी के साथ अंत तक जुड़ा रहा और आज भी मेरे मन में उनके प्रति अगाध श्रद्धा है। आज मैं जो कुछ हूँ, मेरे निर्माण में उनका बहुत योगदान है।
आप मार्क्सवादी हैं, धर्म को आप किस रूप में लेते हैं?
मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक विचारधारा है, जिसका संबंध दर्शन की भौतिकवादी शाखा से है। मार्क्स ने इस दार्शनिक भौतिकवाद को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का रूप दिया। दर्शन की यह भौतिकवादी शाखा संसार के कर्ता या कारण के रूप में किसी भी परम सत्ता को स्वीकार नहीं करती। इसके लिए प्रकृति ही एक मात्र सत्य है, जो अनादि और अनंत है। जहाँ तक धर्म का सवाल है, धर्म एक मिथ्या चेतना है, जिसे मार्क्स ने जनता के लिए अफीम कहा है। मार्क्स की इस उक्ति को बहुत विज्ञापित किया गया है, जबकि अपनी व्याख्या में मार्क्स ने धर्म के बारे में कुछ और बातें भी कहीं हैं। वस्तुतः धर्म जब संस्थागत बनता है, उसका मतवाद खड़ा होता है, उसमें तरह-तरह के कर्मकांड जुड़ते हैं। मार्क्सवादी धर्म से जुड़े इन पाखंडों और मिथ्या विचारों का विरोध करते हैं। धर्म अपने बुनियादी रूप में कर्तव्य का, ईमानदार, मेहनत और मशक्कत की कमाई का पर्याय है। संतों ने धर्म के इसी रूप को माना और ग्रहण किया है। उससे जुड़े पाखंडों की धज्जियाँ उड़ाई हैं। धर्म के नाम पर मनुष्यता का जितना रक्त बहा है, उतना युद्धों और महायुद्धों में भी नहीं बहा है। धर्म के बारे में मेरा यही अभिमत है कि उसे कर्तव्य और सेवा के रूप में स्वीकार किया जाए।
लोगों में एक यह भी धारणा है कि मार्क्सवाद परंपरा का विरोधी है।
मार्क्सवाद के बारे में लोगों की यह धारणा निहायत भ्रांत धारणा है। यद्यपि यह भी सच है कि हिन्दी के कुछेक मार्क्सवादी माने जाने वाले रचनाकारों और विचारकों ने इस तरह की भ्रांत धारणा के लिए उन्हें मौका दिया है। मार्क्सवाद से परिचित, विशेषकर मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन आदि के लेखन को जिन्होंने सही ढंग से पढ़ा है वे स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुँच जायेंगे कि परंपरा के बारे में मार्क्सवाद पर लगाया गया यह आरोप एकदम गलत है। मार्क्सवादी विचारकों ने यह कहा है कि परंपरा में जो कुछ प्राणवान और ऊर्जामय होता है, वह आगे के विकास का हिस्सा बनता है, और जो निष्प्राण और रुढ़िबद्ध होता है, वह अपने समय में ही खप जाता है। परंपरा के जीवंत तत्त्वों के विकास का हिस्सा बनाने और उससे प्रेरणा लेने की बात ही सही मार्क्सवादी दृष्टि है। मार्क्स, एंगेल्स एवं लेनिन का लेखन स्वतः इसका प्रमाण है। हिन्दी में शुरुआती दौर में कुछ प्रगतिशीलों के लेखन से इस प्रकार की ग्रंथियाँ जरूर फैलीं, परंतु बाद में स्थिति सामान्य हो गई। डॉ. रामविलास शर्मा की किताब का नाम ही परंपरा का मूल्यांकन शीर्षक से है, जिसमें उन्होंने कहा है कि बिना परंपरा को जाने हम विकास की दिशाएँ निर्धारित नहीं कर सकते हैं। हाँ, मार्क्सवाद का यह आग्रह जरूर है कि परंपरा के प्रति हमारा दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो, विवेकपूर्ण हो। परंपरा की पूजा नहीं, उसका विवेक परक अध्ययन होना चाहिए और इस विवेक के तहत उसके संप्राण तत्त्वों की खोज करते हुए आगे के विकास में उनका इस्तेमाल होना चाहिए।
प्रगतिशील विचारधारा के होते हुए भी आपने भक्तिकाल के पक्ष में बहुत कुछ लिखा है; जबकि कई बड़े प्रगतिशील विद्वानों ने भक्तिकाल को खारिज करने की हद तक उसकी आलोचना की है।
डॉ. रामविलास शर्मा की अपने समकालीनों - खासतौर से शिवदान सिंह चौहान, यशपाल, भदंत आनंद कौशल्यायन, रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन आदि से जो वैचारिक भिड़ंत हुई और जिसे लेकर कुछ लोग आज भी डॉ. रामविलास शर्मा को दोषी करार दे रहे हैं, उसके मूल में भक्तिकाल-विशेषकर गोस्वामी तुलसीदास को लेकर व्यक्त किये गये उपर्युक्त रचनाकारों - विचारकों और समीक्षकों के विचार ही हैं। परंपरा के वैज्ञानिक मूल्यांकन की बात मैंने ऊपर की है; इन लोगों के इन विचारों में उसी का निषेध है। के. दामोदरन ने अपनी पुस्तक में स्पष्टतः भक्ति आन्दोलन पर लिखते हुए उसके सकारात्मक पहलुओं को जिस तरह विशद् किया है उससे बात साफ हो जानी चाहिए। मेरे अध्ययन का क्षेत्र आधुनिक साहित्य रहा है। भक्ति काल और भक्ति कवियों की और मेरी समज्ञ परंपरा के बारे में मार्क्सवादी विचारों के आलोक में ही हुई है। कहने की जरूरत नहीं कि मध्यकाल में अनेक ज्वलंत सामाजिक विषयों पर भक्ति के आवरण में ही उसके रचनाकारों और विचारकों ने विचार किया है, जिन्हें हमें संजीदगी से पढ़ना चाहिए। भक्तिकालीन रचनाओं और रचनाकारों में विचारगत अन्तर्विरोध हैं; परंतु उनके साहित्य में ऐसा भी बहुत कुछ है, जो सामंती मूल्यों के विरोध में है, जनता के पक्ष में है और जो हमारे आज के रचनाकारों के लिए भी एक मिसाल है। यदि हम परंपरा को सही रूप से मार्क्सवादी विचारों के अनुरूप समझते हैं तो हमें निश्चय ही ऐसा बहुत कुछ प्राप्त होता है, जो आज भी हमारे लिए प्रेरणा है; हमारी विरासत है।
आप अपने तमाम लेखन में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के प्रति बहुत उदार दिखाई पड़ते हैं। इस विषय पर कुछ कहिए।
मेरी दृष्टि में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पहले भी आधुनिक हिन्दी समीक्षा की वृहद्त्रायी के पहले व्यक्ति रहे हैं और आज भी हैं। उनके समीक्षात्मक अवदान से जो लोग ठीक से परिचित हैं, वे इस बात की ताईद करेंगे कि आचार्य शुक्ल ने अपने लेखन से हिन्दी समीक्षा को ऐसा सुदृढ़ वैचारिक आधार प्रदान किया है, सिद्धान्त और व्यवहार दोनों आयामों पर कि उसकी मिसाल नहीं है। आचार्य शुक्ल के विचार बड़ी दूर तक साहित्य और कला के विषय में मार्क्सवादी विचारों की संगति में हैं। यद्यपि आचार्य शुक्ल को मैं न तो मार्क्सवाद के दायरे में लाने का पक्षधर हूँ और न दार्शनिक भौतिकवाद के दायरे में। वे जैसे हैं, और जो हैं, हमारे लिए इसी रूप में बेहद उपयोगी हैं। कविता की उनकी समझ और उसके बारे में उनके विचारों और व्यवहारिक विश्लेषण का मैं दूर तक कायल हूँ। उनका बुद्धिवाद उनकी लोकवादी आस्था उनके अध्ययन का फलक मुझे बराबर उनकी ओर आकर्षित करता रहा है। अब तो उनकी पुस्तक चिन्तामणि के चार भाग सामने आ चुके हैं और परवर्ती जागीर में ऐसी कुछ नयी सामग्री संकलित है, जो उन तमाम भ्रांतियों का निराकरण करती है, जिन्हें उनके आरंभिक लेखन में इंगित करते हुए उन पर वर्णवादी, ब्राह्मणवादी होने जैसे आरोप लगाए गए हैं, और उन्हें साम्प्रदायिक इतिहास दृष्टि का पोषक बताया गया है।
वस्तुतः शुक्ल जी जीवन भर विचारगत आत्म-संघर्ष से गुजरे हैं और आगे चलकर उन्होंने स्वयं अपने पिछले तमाम विचारों को छोड़ा है। जरूरत उनके निहायत वस्तुनिष्ठ और पूर्वाग्रह रहित अध्ययन की है। रहस्यवाद, कलावाद, रीतिवाद आदि का उनका विरोध निहायत तर्क संगत एवं वैज्ञानिक है। जहाँ तक मैं समझता हूँ हमारी समीक्षा में विचारों के स्तर पर उनकी वही भूमिका और उनका वही महत्त्व है, जो रूस में मार्क्सवाद के आने के पहले बेलिन्सकी चेर्नीशेव्स्की, दोब्रोल्यूबोव जैसे विचारकों का था। वे हमारी विरासत हैं और रहेंगे। उनकी विचारगत असंगतियाँ होंगी और हैं; परंतु वे हमारे वैचारिक सरोकारों के अनेक आयामों पर प्रेरणा-स्रोत हैं।
डॉ. रामविलास शर्मा से आप खुद को किन रूपों में प्रभावित मानते हैं।
मैं बता चुका हूँ कि डॉ. रामविलास शर्मा से मैं १९५२ से परिचित हूँ। तब से उनके जीवन पर्यन्त मेरे और उनके संबंध बने रहे। जिस समय मैं कानपुर में सन्‌ १९५२ से ५६ के बीच, प्रगतिशील लेखक संघ और कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों में शरीक था, प्रगतिशील समीक्षक के रूप में रामविलासजी शीर्ष पर थे। मैं जब भी उन्हें पढ़ता, उनकी विवेचन शैली और तर्कों से बेहद प्रभावित होता। कालान्तर में उनके विचारों और उनकी समीक्षा की कुछ सीमाएँ भी मेरे सामने स्पष्ट होती गयीं, परन्तु कुल मिलाकर उनके वैदुष्य का प्रभाव मेरे ऊपर बना रहा। मैंने उनके अतिवादी आग्रहों तथा उनकी दीनार सीमाओं से अपने को बचाते हुए, उनमें जो कुछ ठोस और सकारात्मक था, उससे अपना संबंध जोड़ा, उनका स्नेह-भाजन बनकर मैंने उनसे लंबी बहसें भी की। उनके जीवनकाल में उनके कुछ विचारों से असहमत होते हुए मैंने लिखा भी और उनसे बातें भी कीं। मेरे बहुत से तर्कों को उन्होंने माना भी। बावजूद इसके मैंने उनकी समीक्षा से और उनके सानिध्य से बहुत कुछ पाया है। आचार्य वाजपेयी के साथ वे भी मेरी मनोभूमि में हमेशा गुरु के रूप में विद्यमान रहे। स्पष्ट और पारदर्शी भाषा में जटिल से जटिल विषय को सरल बनाकर लिखने की तमीज मैंने उनसे ही सीखी।
मुक्तिबोध के बारे में आपका जो नजरिया है, उसे थोड़ा स्पष्ट करें।
जब मैं सागर में शोध कार्य कर रहा था, मुक्तिबोध सागर विश्वविद्यालय की सेनेट के सदस्य थे, जिसकी बैठकों में वे प्रतिवर्ष आते थे। सागर के कुछ प्रबुद्ध छात्र, जिनमें आज के ख्यात अशोक वाजपेयी भी हैं, उनसे अंतरंग रूप से जुड़े हुए थे। मैं आचार्य वाजपेयी का शोध छात्र था और आचार्य वाजपेयी उस समय नयी कविता-विरोधी के रूप में विज्ञापित किये जा चुके थे। मुक्तिबोध जब भी आते, कोई न कोई विचार गोष्ठी जरूर होती, जिसमें मैं भी शामिल होता। मेरी मुक्तिबोध जी से अंतरंगता नहीं बढ़ सकी; फिर भी मैंने जितना संभव था, मुक्तिबोध को पढ़ा और ऐसे कुछ लोगों से, जो जितने अंतरंग मुक्तिबोध से थे, उतने ही मेरे, मुक्तिबोध के बारे में और भी बहुत कुछ जाना। ऐसे लोगों में एक श्री हरिशंकर परसाई थे। बहरहाल, जैसे मैं मुक्तिबोध को पढ़ता गया, उनसे प्रभावित भी हुआ वे हमारे समय के बड़े ईमानदार, बौद्धिक रचनाकार थे। कालांतर में जब मुक्तिबोध को कुछ लोगों ने एक मिथ बनाकर पेश करना शुरू किया, मेरी उनसे असहमतियाँ बनी और मैंने बराबर उसका विरोध किया। मैंने मार्क्सवाद को जितनी दूर तक जाना समझा है, मैं बराबर इस विचार का रहा हूँ कि किसी भी रचनाकार - विचारक की देवमूर्ति नहीं गढ़नी चाहिए। जबकि मुक्तिबोध को लेकर कुछ लोगों का पहले भी ऐसा ही प्रयास था और आज भी है। मेरा हमेशा से यह विचार रहा है कि हर रचनाकार के अपने अन्तर्विरोध भी होते हैं, जिनसे वह आजीवन जूझता-टकराता है। जरूरत उन अन्तर्विरोधियों को पहचानते हुए उनके बीच से उनकी शक्ति को पहचानने और उजागर करने की है; न कि अन्तर्विरोधों को ढकते हुए अंधभाव से उसे पूजने की। दुर्भाग्य से मुक्तिबोध को लेकर कुछ लोग ऐसा ही कर रहे थे। वे मुक्तिबोध पर किसी भी तरह का प्रश्न चिद्द सहन नहीं कर पाते। मेरी दृष्टि में यह नजरिया सही नहीं है। डॉ. रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध के बारे में जो स्थापनाएँ दी हैं, मुक्तिबोध के तथाकथित प्रशंसकों ने रामविलास शर्मा की स्थापनाओं को न केवल खारिज किया है, उन्हें मुक्तिबोध विरोधी भी घोषित किया है। जहाँ तक रामविलास शर्मा की स्थापनाओं और निष्कर्षों का सवाल है, उनमें अतिरंजना हो सकती है, परंतु मेरा यह विश्वास है कि रामविलास शर्मा का मुक्तिबोध संबंधी लेखन मुक्तिबोध-विरोधी लेखन नहीं है, वह हमें मुक्तिबोध को समझने में मद्द देती है। उन्होंने मुक्तिबोध के आत्म-संघर्ष को एकदम सही रूप में पहचाना है। उनके अनुसार मुक्तिबोध की सबसे बड़ी समस्या मार्क्सवाद से अपने जीवन, अपने व्यवहार और अपनी रचनाशीलता का संबंध बिठाने की थी। वे मार्क्सवाद को जीना चाहते थे; जबकि उनके मध्यवर्गीय संस्कार उनके आड़े आते थे। वे जीवनभर इस आत्मसंघर्ष को जीते रहे। उनकी बुनियादी समस्या थी, मध्यवर्ग व्यक्तित्वांतरित होकर किस तरह सर्वहारा हो सकता है। मार्क्सवाद उनके लिए, जैसा कि रामविलास जी ने कहा है; जीवनमरण का प्रश्न था। वे उससे हट नहीं सकते थे और उनके मन में जो तरह-तरह के सवाल उठते थे, उन सबका जवाब वे मार्क्सवाद से नहीं पा रहे थे। इसी उधेड़ बुन में वे, योग, रहस्य, तंत्र और न जाने किन-किन विचारकों के विचारों में गोते लगाते थे। मेरे विचार से निहायत प्रतिबद्ध और ईमानदार मार्क्सवादी होते हुए भी उनके विचारों में कुछ ऐसे अवकाश हैं, जिनके नाते कट्टर से कट्टर मार्क्स-विरोधी भी उन्हें अपनी शर्तों पर, अपने तर्कों की ज+मीन पर व्याख्यायित करते हुए आधुनिक हिन्दी का शीर्ष रचनाकार सिद्ध कर ले जाते हैं। इसके माने हैं कि मुक्तिबोध में ऐसा कुछ है, जो दूसरों को उन्हें अपने ढंग से व्याख्यायित करने की छूट देता है। मेरा कहना है कि हम मुक्तिबोध की विचारगत असंगतियों को नजर-अंदाज न करें, उन्हें पहचाने और उनसे सीख लें तथा उनमें जो ताकत है, उसे अपनी विरासत माने और उससे प्रेरणा लें। उनकी या किसी की देवमूर्ति न गढ़ें। अपने इन विचारों के साथ निश्चय ही मुक्तिबोध को अपने समय का बहुत जरूरी और बहुत महत्त्वपूर्ण रचनाकार मानता हूँ। बातें बहुत-सी हैं, जिन्हें मैंने लिखी भी है, फिलहाल इतना ही।
इस समय चर्चा के केन्द्र में जो दो विषय हैं - दलित-विमर्श तथा नारी-विमर्श, उनकी दिशा और दशा पर थोड़ा प्रकाश डालें।
दलित और स्त्री, वस्तुतः हमारी सामाजिक संरचना में सबसे अधिक सताए हुए हैं। इस विषय पर मैंने अन्यत्रविस्तार से लिखा है और कहा है कि हमारी सामाजिक संरचना में उन्हें सच पूछा जाए तो नरक की नियति दी गई है। अपनी साहित्यिक परंपरा को देखें और यथास्थितिवादियों की बात छोड़ दें, तो संवेदनशील रचनाकारों ने और उदार मन के मानवतावादी विचारकों ने इस स्थिति पर बराबर लिखा है और बराबर चिंता जताई है, परन्तु कुल मिलाकर इनके प्रति उनका दृष्टिकोण सहानुभूतिपरक और मानवीय करुणा से परिचालित ही रहा है जिस सामाजिक संरचना के ये शिकार हैं; उसके खिलाफ आवाजें या तो उठी ही नहीं या एक सुधारवादी मानसिकता के तहत सामाजिक विसंगतियों पर रंग-रोगन चढ़ाकर उस इमारत को दुरुस्त बनाने की बातें ही की गई हैं। मध्ययुग के निर्गुण संतों के अपवाद को छोड़ दिया जाए तो समूचे भारतीय साहित्य में लंबे समय तक किसी दलित के बड़े रचनाकार के रूप में सामने आने का उदाहरण नहीं मिलता। यह बात स्त्री के संदर्भ में भी उतनी ही सही है।
आधुनिक युग में खासतौर से, नवजागरण काल से स्थितियों के बदलने के क्रम में स्त्रीऔर दलित-अस्मिता के सवाल कुछ उभरकर सामने आए। आजादी के बाद दलित और स्त्री अस्मिताएँ कुछ तो बदली हुई परिस्थितियों के नाते और कुछ पश्चिमी जगत्‌ में, खासतौर से स्त्री विषयक मुद्दों के उभरने के नाते अधिक प्रखर होकर सामने आईं। आज नई सदी में, हमारे प्रमुख साहित्यिक विमर्शों में स्त्री और दलित विमर्श हैं। जैसा मैंने कहा, मैंने इन दोनों मुद्दों पर थोड़ा-बहुत लिखा है, जो प्रकाशित है। संप्रति बहुत संक्षेप में बात करना चाहूँगा। पहले स्त्रीविमर्श को लें। स्त्री लेखन और स्त्री-विमर्श के नाम पर जो कुछ लिखा और कहा गया है उससे बुनियादी तौर पर सहमत होते हुए संप्रति मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि स्त्री लेखन और स्त्री-विमर्श का दायरा व्यापक हो और उसमें उस स्त्री को भी शामिल किया जाए जो गाँवों, कस्बों और दूर-दराज के अंचलों में हाशियों की जिन्दगी जी रही है। अभी स्त्री लेखन का अधिकांश मध्यवर्गीय दायरे में है, उसे बढ़ाया जाए। दूसरी बात, जरूरी है कि जो हजारों सालों के जड़ संस्कारों को ढोते हुए गुलामी में ही सुख का अनुभव कर रही है। अपने तन और मन पर पुरुष द्वारा अंकित सैंकड़ों निशानों को लिए हुए, उसी के कंधों पर चढ़ाकर परलोक जाना चाहती है। स्त्री-अस्मिता का एक शत्रु सामने है - पितृ सत्तात्मक सामाजिक संरचना, पुरुष दर्प आदि; परंतु उसका एक शत्रु जड़ संस्कारों के रूप में खुद स्त्री के भीतर है, जिससे पुरुष की सहायता से स्त्रीको अपने भीतर लड़ना है। स्त्री-मुक्ति का सवाल स्त्री-जाति की मुक्ति का सवाल है और मुक्ति जब भी होगी, सबकी होगी और एक बार में होगी। स्त्री-विमर्श और स्त्री-लेखन में जब तक यह बात शामिल नहीं होती, स्त्री-मुक्ति के कोई मायने नहीं दिखाई देते। एक और बात, स्त्री मुक्ति का प्रश्न उपन्यास, कहानियों से आगे सामाजिक जीवन की सच्चाई बने। स्त्री-मुक्ति का तभी कोई अर्थ है और वह कार्य हड़बड़ी से नहीं हो सकता है। इस अभियान को बहुत संजीदगी से आगे चलना चाहिए।
इसी तरह दलित-विमर्श के बारे में भी मेरे जो कुछ विचार हैं, वे मेरे अनेक लेखों में विस्तार के साथ आ चुके हैं। मराठी के दया पवार से मेरे घनिष्ट संबंध रहे हैं और लंबी बातचीत भी रही है। हिन्दी के भी ओमप्रकाश वाल्मीकि तथा सूरजपाल चौहान जैसे दलित लेखकों से मेरे अच्छे संबंध और पत्राचार भी है। जिस तरह मुझे इस बात की खुशी है कि आज स्त्रीअपनी कलम से, अच्छी भाषा में अपने मन की बात लिख रही है, उसी तरह मुझे इस बात की भी खुशी है कि जिन लोगों के लिए हमारी सामाजिक संरचना के विधाताओं ने हमेशा-हमेशा के लिये पढ़ने-लिखने और सोचने के क्षेत्र निषिद्ध करार दिये थे, आज वे दलित अपनी कलम से अपनी भाषा में अपने मन की बात लिख रहे हैं और उस तरह से ही हमें रू-ब-रू कर रहे हैं, जिसे सदियों से वे सहते और भोगते आ रहे हैं, जहाँ तक दलित लेखन का सवाल है, उसके जरिये हिन्दी में पहली बार कुछ अछूते अनुभव-संवेदन हमारे साहित्य में आए हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं ने और कहानियों ने निश्चित रूप से हिन्दी आत्मकथा और कथा-साहित्य को समृद्ध किया है। जहाँ तक वैचारिक लेखन का प्रश्न है, कुछ ऐसे मुद्दे जरूर उभरे हैं, जिन्हें लेकर अब तक दलित लेखकों और उनके समर्थक गैर-दलित रचनाकारों और विचारकों में आम सहमति नहीं बन सकी है। जहाँ तक मेरा विचार है पारस्परिक संवाद जरूरी है और यह भी जरूरी है कि रूढ़िवादिता और दुराग्रहों से अलग संजीदगी से इस संवाद को जारी रखा जाए ऐसे तत्त्व भी हैं जो बजाय इसके कि संवाद को जारी रखने में मद्द दे, चाहते हैं कि सब कुछ उन्हीं की शर्तों पर तय हो। संवाद का यह नजरिया सही नहीं है। मैंने इस विषय पर काफी लिखा है। जरूरी है कि दलित और उनके समर्थक गैर-दलित लेखक-विचारक अपने पूर्वग्रहों को छोड़ें, अपने अंतर्विरोधों के प्रति सजग हों, और मिल-जुलकर उस व्यवस्था के प्रतिरोध में खड़े हों, जो यथास्थिति बनाए रखना चाहता है। किसी भी ओर से उपक्रम न हों, जो संवाद धर्मिता को क्षति पहुँचाए। ऐसे उपक्रम इस बीच हुए हैं, जो सही नहीं हैं जो संवाद को विवाद में बदलना चाहते हैं। दलित-मुक्ति का सवाल हो अथवा दलित-अस्मिता की बहाली का सवाल हो, इसे मिल-जुलकर ही उन लोगों के जरिये सुलझाया जा सकता है, जो यथास्थितिवादियों और कट्टरपंथियों के विरोध में मुद्दे पर एक मत हैं।

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शुक्रवार, 16 मई 2008

उत्तर-आधुनिकतावाद को एक मुहावरे के रूप में अपनाये जाने से हिन्दी आलोचना का कोई ज्यादा भला होने वाला नहीं है : प्रो. मैनेजर पाण्डेय

देवेन्द्र चौबे, अभिषेक रौशन, उदय कुमार एवं रेखा पाण्डेय
प्रो. पाण्डेय, देरिदा कहते हैं कि इतिहास एक पाठ है, उसका कोई निश्चित अर्थ नहीं होता है। देरिदा की इस धारणा के आलोक में उत्तर-आधुनिकता के बारे में आप क्या सोचते हैं?
देखिए, एक तो देरिदा खुद को उत्तर-आधुनिक नहीं मानते, और वैसे भी उत्तर आधुनिकतावाद का कोई सुनिश्चित अर्थ नहीं है। उत्तर-आधुनिकतावाद के बहुत सारे विचारक या कहिए कि जिनको उत्तर-आधुनिकतावाद का विचारक माना जाता है, उनमें से अनेक लोगों ने यह स्वीकार किया है कि हम उत्तर-आधुनिकतावादी नहीं हैं। इसलिए एक तो देरिदा के इस कथन को उत्तर-आधुनिकतावादी कथन नहीं माना जा सकता। इस कथन की अलग से व्याख्या और उस पर बात की जाए, यह समझ में आता है। आपके सवाल से एक बात यह भी जुड़ी हुई है कि जैसे देरिदा के इस कथन में सबसे अधिक महत्त्व अनिश्चितता को या .... को दिया गया है कि पाठ का कोई निश्चित अर्थ नहीं होता, उसी तरह उत्तर-आधुनिकतावाद को अधिकांश स्थापनाओं के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनका भी कोई निश्चित अर्थ नहीं है। इसलिए उत्तर-आधुनिकतावाद की तरह-तरह की व्याख्याएँ प्रचलित हुई हैं, बल्कि मैं अतिरंजना का खतरा उठाते हुए यह कह सकता हूँ कि उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में जितने मुँह उतनी बातें सुनाई पड़ती हैं। अब रही बात देरिदा के उस कथन की, तो उस कथन को दो-तीन संदर्भों में समझने की जरूरत है। पाठ के रूप में अब तक हम लोग लिखित पाठ जानते हैं और दर्शन के प्रसंग में यह परंपरा लम्बे काल से बनी हुई कि पुराने पाठों की नई व्याख्या करते हुए नई दार्शनिक दृष्टि का विकास होता रहा है; और मेरा ख्याल है कि जॉक देरिदा की मान्यता के मूल में दर्शन की यह परम्परा मौजूद है। पाठ का दूसरा रूप साहित्यिक कृतियों में दिखाई देता है। उत्तर-आधुनिकतावादी लेखक को महत्त्व नहीं देते। स्वयं दो विचारकों ने, रोलाबार्थ और फूको ने लेखक के बदले पाठ को महत्त्व दिया है, या बल्कि रोलाबार्थ का तो यह कथन है कि लेखक की मृत्यु की कीमत पर ही पाठ और पाठक का महत्त्व स्थापित हो सकता है। तब पाठ से पाठक का सम्बन्ध ही आलोचना का केन्द्रीय तत्त्व होगा, पाठ से लेखक का सम्बन्ध नहीं। ऐसी स्थिति में, पाठक तो बदलते रहते हैं। हर युग के नए पाठक पुरानी रचनाओं का पुराने पाठों का नया अर्थ करते हैं। इसलिए जॉक देरिदा के इस कथन का एक अभिप्राय साहित्यिक पाठों के अर्थ की अनेकता भी है। आगे एक और स्तर पर इस बात को देखा जा सकता है। सबसे अधिक परेशानी यह है कि जॉक देरिदा सब कुछ को पाठ मानते हैं। ...तो इसका मतलब है कि संसार की घटनाएँ, स्थितियाँ ये सब पाठ हैं। अब यहीं से खतरनाक अर्थ की शुरूआत होती है। मान लीजिए कि उनके अनुसार हम मान लें कि इराक पर अमेरिकी हमला की घटना एक पाठ है, तो इतनी दूर तक तो सही होगा कि उसका एक अर्थ जार्ज बुश अपना लगाते हैं और दूसरा अर्थ इराक की जनता लगाती है और दोनों अर्थों की टकराहट हो रही है इतिहास की प्रक्रिया में। पर सवाल यह है कि वह दोनों में से किसी एक अर्थ को स्वीकार करें, क्योंकि यह कहना काफी नहीं होगा कि इस घटना रूपी पाठ के दो अर्थ हैं, बल्कि दो अर्थ कहने का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए यह तो बाहर बैठे आदमी को बताना ही पड़ेगा कि वह किस अर्थ को सही समझता है। इसलिए जॉक देरिदा के इस कथन में अर्थ की अनिश्चितता के साथ-साथ विचारक की नैतिक स्थिति की भी अनिश्चितता है और ऐसी स्थिति में अर्थ का अनर्थ होने लगता है। मान लीजिए कि हम बाबरी मस्जिद के ध्वंश को भी एक घटना और पाठ के रूप में देखें तो उसका एक अर्थ हिन्दूवादी लोग करते हैं, दूसरा अर्थ मुसलमान करते हैं और तीसरा अर्थ इस देश के लोकतांत्रिक चेतना वाले लोग करते हैं और यह कहना कि तीनों अर्थ बराबर सही हैं कुछ भी कहना नहीं है, बल्कि अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचना है। इसलिए जॉक देरिदा के पाठ में फिसलन की संभावना बहुत है और इस तरह के मुहावरेदार वाक्यों के ऐसे ही खतरे हुआ करते हैं।
आज भारत में विचारधाराओं को लेकर जो सारी बहसें हो रही हैं उसमें उत्तर-आधुनिकतावाद से संबंधित बहस को आप किस रूप में देखते हैं?
देखिए, जहाँ तक मुझे मालूम है कि हिन्दुस्तान की बहुत सारी भाषाओं में उत्तर आधुनिकतावाद के बारे में बातें हो रही हैं, बहसें हो रही हैं, हम उनको नहीं जानते, आप भी नहीं जानते। दो भाषाएँ ऐसी हैं जिनमें होने वाली बहसों से हम परिचित हैं, एक तो हिन्दी दूसरी भाषा है अंग्रेजी। अंग्रेजी में जो उत्तर-आधुनिकतावाद से संबंधित बहसें हैं, वह पश्चिम में होने वाली बहसों का विस्तार हैं। मुझे हिन्दुस्तान के किसी अंग्रेजी लेखक की ऐसी किताब या ऐसा लेख पढ़ने को नहीं मिला है जो उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में कोई नई बात कहता हो। हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद पर जो बहस है वह और भी खराब स्तर की है। हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद पर कोई गंभीर बहस हुई ही नहीं है, न तो उसकी व्याख्या करने वाली बहस, न उसके पक्ष को ठीक से प्रस्तुत करने वाली बहस और न उसका विरोध करने वाली बहस; बल्कि मैं तो अभी यही कह सकता हूँ कि हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में जो कुछ लिखा गया है वह बहुत कुछ पश्चिम में और वह भी अंग्रेजी के माध्यम से उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में जो बातें कही गयी हैं, उनकी पुनर्प्रस्तुति ही हिन्दी में हुई है। मतलब हिन्दी में जो उत्तर-आधुनिकतावाद पर लिखने वाले हैं उनमें सबसे अधिक तो सुधीश पचौरी ही लिखते रहते हैं और जाहिर है कि वे काफी उत्तर-आधुनिकतावादी भाषा में उत्तर-आधुनिकतावाद पर लिखते हैं। इसलिए उनके लेखन से भी उत्तर-आधुनिकतावाद का कोई स्वरूप लोगों के सामने स्पष्ट हुआ हो, ऐसा नहीं है। हाँ, इस बहस के प्रसंग में मैं यह जरूर कहूँगा कि असल में उत्तर-आधुनिकतावाद की बुनियादी बहस मार्क्सवाद से है। अपने यहाँ मार्क्सवादियों ने भी उत्तर-आधुनिकतावाद से पैदा हुए सवालों का कोई बहुत अच्छा उत्तर दिया हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। मेरी अपनी जानकारी में दो लोग हैं, एक तो प्रो. रणधीर सिंह और दूसरे एजाज अहमद, जिन्होंने उत्तर-आधुनिकतावाद पर गंभीरता से बहस करने की कोशिश की है मार्क्सवाद की ओर से बहस करने की कोशिश की है। इसलिए मैं कहूँगा कि अभी उत्तर-आधुनिकतावाद को ठीक से समझने-समझाने की जरूरत हिन्दी में बनी हुई है। देखिए, मैं विचार और आलोचना के प्रसंग में इस धारण को महत्त्व देता हूँ कि किसी भी विचार को अस्वीकार करने से बेहतर है कि उसको गलत साबित करना, अगर आपको वह गलत लगता है तो। क्योंकि अस्वीकार करने में कुछ बौद्धिक प्रयास नहीं लगता, गलत साबित करने में बौद्धिक प्रयास की जरूरत होती है। इसलिए हिन्दी में उत्साही मार्क्सवादियों ने उत्तर-आधुनिकतावाद को अस्वीकार करने का काम बहुत अधिक किया है और उसे गलत साबित करने का काम बहुत कम किया है।
उत्तर-आधुनिकतावाद के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि इससे स्थानीय स्वायत्तता और विकेन्द्रीकरण की जमीन मजबूत हुई है और उत्तर उपनिवेशवादी साहित्य, तीसरी दुनिया का साहित्य, नारी एवं अश्वेत लेखन, दलित साहित्य आदि केन्द्र में आए हैं। आप इस तर्क से कहाँ तक सहमत हैं?
देखिए, एक बात तो यह है कि हिन्दी में या सारी दुनिया में आपने जिन-जिन समस्याओं की चर्चा की है उन तीनों समस्याओं पर गंभीर बहसें उत्तर-आधुनिकतावाद के आने के बहुत पहले से चल रही हैं। मतलब स्त्रीकी स्वाधीनता और पराधीनता के प्रश्न पर बहस, भारतीय समाज के प्रसंग में दलितों की पराधीनता और स्वाधीनता पर बहस या फिर उसी से जुड़ा हुआ दलित साहित्य का प्रश्न और इसके साथ ही केन्द्र बनाम हाशिए का द्वंद्व, इन सब पर बहसें उत्तर-आधुनिकतावाद के आने के बहुत पहले से चल रही हैं। बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद केवल शब्द नहीं, बल्कि एक विचार प्रक्रिया के रूप में इतिहास पर आप ध्यान दें तो मालूम होगा कि कुल मिलाकर १९८० के आस-पास से इसकी शुरूआत होती है। थोड़ा पहले आप फूको को उसमें जोड़कर देखें तो थोड़ा और पीछे जाएँगे ७० के दशक में, अन्यथा सब लोग जानते हैं लेकिन स्त्रियों की स्वाधीनता के प्रश्न पर हम सारी दुनिया को छोड़ भी दें तो हिन्दी में ४० के दशक से बहस चल रही है कम या ज्यादे। मतलब महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक श्रृंखला की कड़ियाँ १९३५ के आस-पास उनके लिखे निबंधों का ऐसा संकलन है जो पुस्तकाकार १९४२ में छपा। मतलब हिन्दी में और हिन्दुस्तान में स्त्रियों की स्वाधीनता का सवाल देश की स्वाधीनता के सवाल से जुड़ा हुआ दिखाई देता है और उसके बाद आप देख सकते हैं हिन्दी में स्त्रियों की स्वाधीनता का एक बड़ा प्रमाण उनकी स्वतंत्र रचनाशीलता में दिखाई देता है। हिन्दी साहित्य में स्त्रियों को रचनाशीलता का इतिहास भी छिट-पुट ही सही बहुत पुराना है लेकिन व्यवस्थित रूप से उसकी शुरूआत नई कविता, नई कहानी के दौर से दिखाई देती है। अब रही बात दलित साहित्य की तो देखिए, हिन्दी में दलित साहित्य बाद में आया, पर मराठी में दलित साहित्य उत्तर-आधुनिकतावाद के बहुत पहले से स्थिर और स्थापित धारा के रूप में मौजूद है और हिन्दी के दलित लेखक उत्तर-आधुनिकतावाद से जितना परिचित हैं, प्रेरित हैं और प्रभावित हैं उससे बहुत अधिक वह मराठी के दलित लेखक से परिचित, प्रेरित और प्रभावित हैं। रही बात केन्द्र और हाशिए के द्वंद्व की, तो बहुत पहले बीसवीं सदी के दूसरे या तीसरे दशक की बात होगी, ...केन्द्र और हाशिए की बहस स्वयं आधुनिकतावादी विचार और रचनाशीलता में मौजूद रही है, इसलिए यह कहना कि उत्तर-आधुनिकतावाद के कारण स्त्रियों की स्वाधीनता, दलित लेखन या केन्द्र और हाशिए पर बहस की शुरुआत हुई उससे कोई दिशा मिली है मुझे एकदम ठीक नहीं लगता। हाँ, यह जरूर कहूँगा कि उत्तर-आधुनिकतावादी चिंतन ने इन तीनों प्रसंगों में थोड़ी मद्द की है, क्योंकि पहले के दिनों में ये सब विवाद के विषय के उत्तर-आधुनिकतावाद ने इन सबके महत्त्व को नए रूप में स्थापित करने में मद्द की है। इसलिए व्यक्ति की स्वायत्तता, समुदायों की स्वतंत्रता और समाज में हाशिए पर रहने वाले लोगों की ताकत का अहसास, यह उत्तर-आधुनिकतावाद की मद्द से बेहतर रूप में समझा गया है। इसलिए मैं यह जरूर कहूँगा कि ये सारी बहसें पुरानी हैं, पर उत्तर-आधुनिकतावाद ने इन बहसों को नई धार देने में मद्द की है।
मार्क्सवादी चिंतन का आधार आर्थिक विश्लेषण था। उत्तर-आधुनिकतावाद आर्थिक पक्ष के प्रति उदासीन है। क्या यह सही नहीं है कि आर्थिक पक्ष के प्रति उदासीनता के कारण ही मार्क्सवादी विचारक उत्तर-आधुनिकतावाद की आलोचना करते हैं?
हाँ, पर बात सही है। देखिए, उत्तर-आधुनिकतावाद असल में सामाजिक संरचना को महत्त्व नहीं देता और इसीलिए वह वर्ग को भी महत्त्व नहीं देता। मुझे तो लगता है कि यह उत्तर-आधुनिकतावाद का एक अंतर्विरोध है कि आप सुबह से शाम तक हाशिए के लोगों की बात तो करें, पर सर्वहारा की बात आते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगें। स्वयं पूँजीवादी व्यवस्था के हाशिए पर रहता है सर्वहारा वर्ग। लेकिन मार्क्सवादियों ने असल में जब उत्तर-आधुनिकतावाद की आलोचना की है तो इसलिए भी की है कि उत्तर-आधुनिकतावादी, सामाजिक, राजनीतिक द्वंद्व, संघर्ष और किसी भी तरह से मुक्ति के प्रयास को महत्त्व नहीं देते। वे बल्कि अधिक से अधिक द्वंद्व को विचार के स्तर तक स्वीकार करते हैं; बहस के स्तर पर उसको मानते हैं, लेकिन सामाजिक व्यवहार में भी उसको लागू करना जरूरी है यह वे स्वीकार नहीं करते और तब मुझे वाल्टर बेंजामिन का एक कथन याद पड़ता है कि पूँजीवाद और सर्वहारा के बीच लड़ाई विचारकों के दिमाग में नहीं, समाज में होती है। पर समाज में जो लड़ाई होती है वह लड़ाई किसी भी तरह से उत्तर आधुनिकतावादियों को स्वीकार नहीं। मुझे फूको का एक ... याद पड़ रहा है जिसमें उन्होंने कहा था कि एक स्तर पर हम सब लोग आंतरिक द्वंद्व से गुजरते हैं। अब दिमाग के भीतर द्वंद्व हो यह वे मानते हैं लेकिन समाज में वह द्वंद्व हो और निर्णायक दौड़ तक पहुँचे, यह उनके लिए महत्त्व की बात नहीं है। वे यह बात पहली बार थोड़े कह रहे हैं। बहुत पहले जयशंकर प्रसाद कामायनी में कह चुके हैं कि -
देवों की विजय दानवों की
हारों का होता युद्ध रहा
संघर्ष सदा उर अन्तर में
जीवित रह नित्य विरुद्ध रहा।
मतलब यह कि मनुष्य की चेतना के भीतर अच्छी प्रवृत्तियों और बुरी प्रवृत्तियों जिसको वे दैवी और आसुरी प्रवृत्तियाँ कहते हैं उनके बीच द्वंद्व चलता ही रहता है। जयशंकर प्रसाद के इस कथन के लगभग ५०-६० साल बाद बहुत नई बात की तरह जो फूको ने कहा वह वही है जो जयशंकर प्रसाद कह चुके। इसलिए मार्क्सवादी जब उत्तर-आधुनिकतावाद का विरोध करते हैं तो इसलिए भी कि उत्तर-आधुनिकतावादी मुक्ति को किसी धारणा और कोशिश को महत्त्व नहीं देते। उत्तर-आधुनिकतावादी दिमागी गुलामी की बात तो करते हैं पर सामाजिक और राजनीतिक गुलामी की बात नहीं करते और उस तरह की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए जो संघर्ष है उसको भी महत्त्व नहीं देते। इसलिए बहुत लोगों का ख्याल है कि उत्तर-आधुनिकतावाद ने एक तरह से संघर्षशील चेतना को लकवाग्रस्त करने का प्रयास किया है कि हर चीज केवल बौद्धिक बहस तक सीमित रह जाए। समाज में जो संघर्ष है और द्वंद्व हैं वह केवल बौद्धिक बहसों से हल नहीं होंगे।
उत्तर-आधुनिकतावादी मजदूरी को सेवा का नाम देते हैं इस पर आपकी कोई टिप्पणी....।
फ्रांस के एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री थे। अभी उनकी क्मंजी हुई है। उन्होंने कहा है कि पंडिताऊ शास्त्रार्थ की प्रवृत्ति उत्तर-आधुनिकतावाद में दिखाई देती है। मतलब यह कि मजदूरी को सेवा कहना, उसमें से शोषण के बोध को गायब करना। शोषण का बोध नहीं होगा तो संघर्ष की संभावना भी नहीं होगी। इसीलिए मैं बार-बार कहा करता हूँ कि उत्तर-आधुनिकतावाद असल में पूँजीवाद के वर्तमान दौड़ की रक्षा करने वाली विचारधारा है।
उत्तर-आधुनिकतावादी कहते हैं कि सर्वहारा वर्ग खत्म हो गया वे सब मध्य वर्ग में शामिल हो गए हैं। उनकी इस मान्यता पर आपका क्या सोचना है?
अरे,मतलब सपने में ऐसा हो गया होगा। सपनों पर तो मेरा नियंत्रण नहीं है।जाकर पूछना चाहिए कि भारत जैसे देश में जहाँ लाखों मजदूर बेकार हैं और दस हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है ये जीवन से मुक्त होकर मध्य वर्ग में शामिल हुए हैं क्या? इस मूर्खतापूर्ण मान्यता पर मैं क्या कह सकता हूँ। आप उन किसानों से जाकर अब तो खैर कैसे पूछेंगे आप, जिन्होंने आत्महत्या कर ली। उनके घर-परिवार के लोग बता सकते हैं कि वे मध्य वर्ग में शामिल हुए हैं या प्रेतों में शामिल हो गए हैं।यह बहुत ही भ्रामक, मैं कह सकता कि छल-छद्म से भरी हुई बातें हैं।
हिन्दी आलोचना में एक दौर ऐसा था जब आधुनिकता और-आधुनिकतावाद की चर्चा थी। आज उत्तर-आधुनिकतावाद की चर्चा जोरों पर है। आधुनिकता और-आधुनिकतावाद से उत्तर-आधुनिकतावाद की यह यात्रा साहित्य और समाज की वास्तविकताओं से कितना जुड़ा है?
भई देखो, बात यह है कि यह तो मैं मान सकता हूँ कि आजकल हिन्दी आलोचना में उत्तर-आधुनिकतावाद की चर्चा बहुत है, लेकिन मेरी जानकारी में हिन्दी में कोई उत्तर-आधुनिकतावादी आलोचना नहीं है, मैं सुधीश पचौरी को याद करते हुए यह बात कहना चाहता हूँ। उसका एक कारण है कि उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता भी हिन्दी में अभी उस तरह से विकसित नहीं हुई है जिसकी उत्तर-आधुनिकतावादी औजारों से ही व्याख्या करने की स्थिति बनती हो। इसलिए यह पूरी बहस ठोस आलोचना पर होने के बदले केवल विस्तार के स्तर पर मौजूद है। लेकिन आधुनिकता और आधुनिकतावाद से संबंधित जो बहस थी वह गहरे स्तर पर आलोचनात्मक बहस थी। क्योंकि आधुनिकता रचनाशीलता और-आधुनिकतावादी रचनाशीलता के विकास के साथ-साथ आधुनिक और-आधुनिकतावादी आलोचना का भी विकास हुआ। हिन्दी में उसका क्षेत्र बहुत लम्बा है। आप उसको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से लेकर नामवर सिंह तक में देख सकते हैं और देखिए, जब आधुनिक कहा जाता है तो मैं तो मार्क्सवाद को भी आधुनिकता का ही एक रूप समझता हूँ। यद्यपि तब मार्क्सवादियों ने आधुनिकतावाद का विरोध किया लेकिन आधुनिक और-आधुनिकतावाद में फर्क करने की जरूरत है। मैं इसलिए आधुनिक विचारधाराओं के अन्तर्गत मार्क्सवाद को रखता हूँ, आधुनिकतावाद को इससे अलग रखता हूँ। जैसी रचनाशीलता, आधुनिकता और-आधुनिकतावाद के साथ हिन्दी में विकसित थी, वैसी रचनाशीलता और आलोचना अभी उत्तर-आधुनिकतावाद से प्रेरित-प्रभावित होकर हिन्दी में विकसित नहीं हुई है।
आपने एक साक्षात्कार में कहा है कि आलोचना को कोई वाद वहीं तक मद्द कर सकता है जहाँ तक वह रचना की अर्थवत्ता और सार्थकता समझने में सहायक हो। उत्तर-आधुनिकतावाद के संदर्भ में यह बात कहाँ तक सच है?
देखिए, उत्तर-आधुनिकतावाद के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि यह हवा में तैरते विचारों को पकड़कर अपना व्यवसाय चलाने की कोशिश है। यह ठीक है कि मार्क्सवाद से या मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि से आप पुराने साहित्य की भी व्याख्या कर सकते हैं। लोगों ने कालिदास से लेकर भक्तिकाल होते हुए छायावाद तक की व्याख्या मार्क्सवादी दृष्टि से की है। मार्क्सवादी दृष्टि से गैर मार्क्सवादी रचनाओं की व्याख्या करना जिस तरह संभव है उसी तरह उत्तर-आधुनिकतावाद दृष्टि से गैर उत्तर आधुनिकतावादी और पुरानी रचनाओं की व्याख्या करना भी संभव है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब पहले उत्तर-आधुनिकतावाद की व्यवस्थित समझ विकसित हो। मेरी चिन्ता और शिकायत यह है कि अभी हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद की व्यवस्थित समझ ही पैदा नहीं हुई है। उत्तर-आधुनिकतावाद की एक स्थापना यह है कि साहित्य के प्रसंग में शास्त्रीय और लौकिक के बीच कोई फर्क नहीं है। ... अगर आप इसको रचना के स्तर पर देखना चाहें तो नागार्जुन की मंत्र कविता में इसको देखा जा सकता है। बाबा ने लौकिक और शास्त्रीय दोनों को मिलाने की कोशिश की है और बहुत सफल कोशिश की है। इस कोशिश के माध्यम से उन्होंने धारदार राजनीतिक समझ की कविता लिखी है मंत्र। अब कोई चाहे और उत्तराआधुनिकतावाद के भीतर लौकिक और शास्त्रीय के द्वंद्व और दोनों की एकता की जटिलता को समझता हो, तो वह नागार्जुन की इस कविता की ठीक से व्याख्या कर सकता है। लेकिन केवल अध्ययन की सुविधा के लिए उत्तर- आधुनिकतावाद को एक मुहावरे के रूप में अपनाते जाने से हिन्दी आलोचना का कोई ज्यादे भला होने वाला नहीं है।
एक समय में मार्क्सवादी विचारधारा ने हिन्दी साहित्य की दिशा और दशा बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। क्या आपको लगता है कि उत्तर-आधुनिकतावाद वही भूमिका निभा पाएगा?
देखिए, ऐसा है कि मार्क्सवादी आलोचना ने हिन्दी आलोचना और हिन्दी साहित्य की दिशा बदलने में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी उसका एक कारण यह भी था कि मार्क्सवादी आलोचना केवल साहित्यिक दृष्टिकोण नहीं है। वह एक साथ साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोण है और इस व्यापक दृष्टि के तहत मार्क्सवादी आलोचना ने हिन्दी साहित्य में हस्तक्षेप किया और उसकी दिशा बदलने में एक भूमिका निभाई। उत्तर-आधुनिकतावाद इस तरह की समग्रता को स्वीकार नहीं करता। दूसरी बात यह भी है कि मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का विकास अपने देश में जनसंघर्षों की लम्बी परंपरा से जुड़कर हुआ था और उसी प्रकार की रचनाशीलता भी विकसित हुई थी। हिन्दी में अभी उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता का भी ठीक से विकास नहीं है। मैंने नागार्जुन की एक कविता का उल्लेख किया यद्यपि यह कविता लिखते समय नागार्जुन ने किसी उत्तर-आधुनिकतावाद को ध्यान में नहीं रखा था और वे जानते भी नहीं थे कि उत्तर-आधुनिकतावाद क्या है। सजग रूप से उत्तर-आधुनिकतावादी लेखक हिन्दी में मेरी जानकारी में एक ही है, वे हैं मनोहर श्याम जोशी, जो घोषित रूप से अपने उपन्यासों को उत्तर-आधुनिकतावादी मानते हैं और स्वीकार भी करते हैं। असल में जब तक हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता का विकास नहीं होगा तब तक उत्तर-आधुनिकतावादी आलोचना भी ठीक से विकसित नहीं होगी। इसीलिए मैं सारांश के रूप में कहूँ तो उत्तर-आधुनिकतावादी आलोचना दृष्टि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, यद्यपि वह मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का स्थानापन्न कभी नहीं बनेगी। लेकिन उसकी एक भूमिका हो सकती है बशर्तें कि एक तो स्वयं उत्तर-आधुनिकतावाद की शक्ति और सीमाओं का स्पष्ट बोध हो और दूसरे उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता का भी विकास हो और तीसरे इन दोनों के बीच एक द्वंद्वात्मक संबंध का निर्माण हो।

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अदब से ही रिश्ता बाकी रहा : जाबिर हुसेन

रामधारी सिंह दिवाकर
आपके रचनाकर्म पर मरगंगा में दूब किताब लिखते समय मुख्यतः आपकी कृतियां ही मेरे सामने थीं। आपके परिवार या आपकी वंश-परंपरा के विषय में जानने की कोशिश मैंने नहीं की। अब चाहता हूं कि आपकी जिंदगी के कुछ अनजाने पक्ष भी हमारे सामने आयें। क्या आप अपने और अपने परिवार के विषय में कुछ बताना चाहेंगे?
मैंने अपने बारे में बहुत कम लिखा या कहा है, बल्कि नहीं के बराबर। इस मामले में अपने को औरों से थोड़ा अलग महसूस करता हूँ। जरूरत हो तो भी अपने रिश्तेदारों का जिक्र करने से परहेज करता हूँ। मैं उनमें नहीं, जो अपनी कारगुजारियाँ बयान करते वक्त अपने बाप-दादों की सिफतों का सहारा लेते हैं। बस इतना ही काफी है जानना कि मेरा खानदान कई पीढ़ियों से इल्म-व-अदब की ख़िदमत करता रहा है। कई अहम्‌ शायर-अदीब हुए हैं, अपने खानदान में। वालिद, चचा, फूफा, भाई-बहन, सब शायरी, अफसानानिगारी में अच्छी-खासी शोहरत के मालिक रहे हैं। बहार हुसैनाबादी, परवीन शाकिर, अख्तर पयामी, शीन अख्तर, महदी अली, जीशान फातमी, इनमें से कुछ हैं। बहार हुसैनाबादी ने तो अपनी उर्दू-फारसी शायरी से अपने समकालीन गजलगो शायरों को हैरत में डाल दिया था।
अपना रिश्ता सूफी परंपरा से रहा है। सात-आठ सौ वर्षों की अपनी तारीख़ लिखी मिलती है। मनेरशरीफ के सूफियों से अपना सिलसिला जुड़ा है। शाह शुएब अपने पुरखों में हैं। कइयों को बादशाहों और अंग्रेज शासकों के हाथ जाम-ए-शहादत पीने की नौबत आई है। उसूलपसंदी, ईमानदारी, इल्म-दोस्ती विरासत में मिली है। कोई अनर्गल आरोप लगाता है तो मन में आरोप लगाने वाले के प्रति दया का भाव जागता है। जो हमारी जड़ों से वाकिफ नहीं और जो अपनी जड़ों को ही हमारी जड़ समझने की भूल करता है, वही आरोप लगाने की कोशिश करता है। मुझे ऐसे लोगों पर तरस आता है।
मुझे नहीं मालूम इल्म-व-अदब की हमारी परंपरा और कितना आगे जायेगी। हमारे बाद की नस्लें इसे आगे बढ़ा सकेंगी, तभी तो हमारी विरासत महफूज रह पायेगी। कभी-कभी हालात मुझे मायूस कर देते हैं। लोगों में इल्म हासिल करने के लिए कोई बेचैनी नहीं रह गई है। आसानी से सब कुछ मिल जाए, यही जिंदगी का मकसद हो गया है।
कुछ अपनी अदबी तालीम, औपचारिक शिक्षा के बारे में बतायेंगे।
अदब की तालीम तो बस घर के माहौल ने दी है। सोचने-समझने की सलाहियत हुई तो देखा कि खानदान में अपने बड़े भाई अख्तर पयामी की जेहानत और शायरी की धूम मची है। सबकी जबान पर उनकी नज्में हैं, अशआर हैं। फिर शीन अख्तर की कहानियों का दौर आया। दोनों भाइयों की सियासी सरगर्मियों ने भी दिल-व-दिमाग़ में हरकत पैदा कर दी। स्कूल के दिनों से ही बीड़ी मजदूरों के संगठन से जुड़ गया। उनके सम्मेलनों, सभाओं में सक्रिय भागीदारी होने लगी। वालदैन को भाइयों की तरह मेरे बिगड़ने का भी अंदेशा हुआ तो सख्तियां बढ़ गयीं। पढ़ाई में अव्वल आते रहने की वजह से शिकायत का कोई मौक़ा उन्हें कभी नहीं मिला। अपनी ख्वाहिश राजनीति विज्ञान पढ़ने की थी, लेकिन वालिद ने अंग्रेजी साहित्य की डोर हाथों में थमा दी। फिर तो बस अदब से ही रिश्ता रह गया, बाकी चीजें पीछे छूट गईं। केन्द्रीय सेवाओं के इम्तेहान में बैठा, कामयाबी मिली, लेकिन किस्मत कहीं और ले जाना चाहती थी। फिर कालेज की नौकरी में आ गया। रिद्म ऑफ विजन इन हार्ट क्रेन्स पोयटरी शीर्षक से शोध-निबंध लिखा। आपातकाल के दौरान पुलिस कार्रवाई में शोध-निबंध की सारी पांडुलिपि नष्ट हो गई। किताबों का बड़ा सरमाया भी जाता रहा। आज भी इसकी याद आने पर गहरी टीस महसूस होती है।
आप हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखते हैं। क्या कभी आपके सामने अभिव्यक्ति की माध्यम-भाषा को लेकर कोई आंतरिक संकट महसूस हुआ? आपके आरंभिक लेखन के पीछे कौन-सी प्रेरणाएं थीं।
स्कूल-कालेज के दिनों से ही लिखने-पढ़ने का शौक गहराया। घर का माहौल ही ऐसा था कि अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ न कुछ लिखना लाजिमी था। आरंभ में नज्में लिखीं, कविताएं लिखीं। पत्रिाकाओं में छपीं। आरंभिक रचनाएं सज्जाद जहीर की पत्रिका में प्रकाशित हुईं। बड़े प्यार से बीड़ी मजदूरों की तहरीक से जुड़ी मेरी रिपोर्टें और नज्में छापते थे। उन दिनों मैं आठवीं-नवीं कक्षा में था। नज्में छपने लगीं तो वालदैन की वहशत बढ़ी। वो दरअसल मुझे अफ़सर बनाना चाहते थे। लेकिन अपनी मिट्टी में ही सरकारी तंत्र से तनावपूर्ण दूरी रखने की ख़ासियत छिपी थी। भाषा को लेकर मुझे कोई समस्या नहीं रही। हिंदी-उर्दू दोनों भाषाओं में लिखता रहा। मेरे लिए बता पाना मुश्किल है कि कौन-सी रचना पहले किस भाषा में लिखी गई। ज्यादातर रचनाएं एक साथ दोनों भाषाओं में लिखी गईं। शुरू के दिनों में संस्कृत और फारसी का प्रभाव अधिक रहा। यह प्रभाव दरअसल मेरे शिक्षकों की देन थी। आहिस्ता-आहिस्ता, शायद कालेज के दिनों में, मैंने इस प्रभाव पर काबू पाने की कोशिश की। बाद के अनुभवों ने अभिव्यक्ति के लिए अपनी भाषा खुद गढ़ ली। आगे चलकर यह भाषा मेरी नहीं रह गई, मेरे सरोकारों और अनुभवों की भाषा हो गई। मेरे कितने काम की बन पाई यह भाषा, मैं नहीं जानता। लेकिन अपने सरोकारों की तल्ख़ सच्चाई बयान करने के लिए इससे अलग किसी भाषा का इस्तेमाल मेरे लिए मुमकिन नहीं था। उर्दू के कुछ अहम्‌ लोगों को मेरी तहरीरों में हिंदी-उर्दू के मिले-जुले अलफ़ाज की मौजूदगी पर एतराज है। इस एतराज को लेकर संजीदगी से गौर करने पर मुझे महसूस होता है कि वो मुझसे ख़ालिस क्लासीकी जबान लिखने की उम्मीद रखते हैं। मैं इसका अहल नहीं हूं। मेरे लिए अपने सरोकारों और अनुभवों से हटकर कोई रचना-माध्यम तैयार करना संभव नहीं है। आगे भी शायद यह संभव नहीं हो।
आपकी कथा-डायरियों को पढ़ते हुए महसूस होता है कि तमाम घटनाएं सच्चाई की दस्तावेज हैं। एक कथाकार के रूप में सोचते हुए मुझे लगता है, इस कच्चे माल को लेकर कलात्मक रचनाएं भी लिखी जा सकती थीं लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। क्या लेखन के यथार्थ को लेकर आपकी कुछ निजी मान्यताएं या प्रतिबद्धताएं हैं? अपनी कथा-डायरियों के वस्तुगत यथार्थ के विषय में साफ-साफ कुछ बताना चाहेंगे।
मैंने बहुत सोचकर, योजना बनाकर, गहरा परिश्रम करके अपनी कथा-डायरियों की दुनिया नहीं रची है। यह दुनिया दरअसल मेरे सामाजिक सरोकारों और संघर्षों की कोख से अपने आप जन्मी है। इसमें रचनाकार की हैसियत से मेरा कोई विशेष योगदान नहीं। मैंने सिर्फ इतना किया कि जो तजुर्बे मेरे सामने आये, जो घटनाएं मेरी आंखों ने खुद देखीं, और जिनसे होकर मैं खुद गुजरा, उनको शब्दों का जामा पहनाया और उन्हें एक कथावरण दिया। कथावरण देते समय भी मैंने यह सावधानी जरूर बरती कि मूल कथा-सामग्री पर कला की कृत्रिम परतें नहीं पड़ें। मेरे लिए कला के उस रूप को स्वीकारना कठिन हो जाता है, जो समाज को, पाठकों को जीवन के यथार्थों से कट जाने के लिए प्रेरित करता है। मुझे कला का वही रूप स्वीकार है जो उपेक्षित समाज को न सिर्फ आत्मबल प्रदान करे, बल्कि उसे हालात से जूझने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी करे।
मैं किसी शाम पड़ोस के किसी गांव में जाता हूँ, अपनी आंखों से गांव के शोहदों की दरिंदगी की शिकार शांतीया की लाश देखता हूँ, प्रतिरोध के लिए दस-बीस गांव के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को तैयार करता हूँ। स्वयं पुलिस बल की ज्यादतियों का मुकाबला करता हूँ। आख़िरकार शोहदों को सजा दिलाने में कामयाब होता हूं। अब यह एक तजुर्बा मेरी कथा-डायरी का आधार बनता है। इतना जरूर है कि डायरी लिखते वक्त मैं घटना के प्रतिरोध में अपनी भूमिका को बिल्कुल गौण कर देता हूँ। ऐसा नहीं होने पर मेरी हस्तक्षेप-कार्रवाई ही डायरी के केंद्र में आ जाती और जो स्थान बलात्कार की शिकार उस दलित महिला को मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता। यह उदाहरण मेरी कथा-डायरी के तमाम संदर्भों को परिभाषित करता है। डायरी में बस कहीं-कहीं एक नैरेटर के रूप में मेरी मौजूदगी दर्ज होती है, वो भी बिल्कुल हाशिए पर।
मैं अपनी कथा-डायरी के अधिकांश पात्रों से गहरे तौर पर जुड़ा होता हूँ। आज भी सैकड़ों ऐसे पात्र जिंदा हैं, मेरे आसपास हैं, जिनकी यातनाओं को मैंने अपनी डायरी में दर्ज किया है। लेकिन उन्हें उनकी यातनाओं से निजात दिलाने की ख़ातिर मैंने जो लड़ाइयां लड़ीं उनका जिक्र मैंने अपनी डायरी में करना जरूरी समझा। मेरा मक़सद हालात के प्रति व्यापक समाज में तेजी से क्षीण हो रही संवेदनशीलता के तंतुओं को दोबारा जिंदा या बहाल करना था। मैं इस मक़सद में बड़ी हद तक सफल रहा हूँ। बिहार में नई सामाजिक शक्तियों के उभार तथा उनकी व्यापक गोलबंदी के पीछे इन प्रयासों की अच्छी-खासी भूमिका रही है। मैंने इस काम में अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा लगाया है। मैं सुख और समृद्धि के पीछे कभी नहीं भागा। मैंने, एक सामान्य, मध्यम वर्ग के परिवार को जो सुविधायें मिल सकती हैं, उनसे भी अपने आप को बचाने की कोशिश की। अपने लिए कांटों का यह रास्ता मैंने अपनी मजरी से चुना है, किसी और को इसका कुसूरवार नहीं ठहरा सकता। मेरी रचनाओं की मिट्टी इन्हीं सच्चाइयों से गूंधी गई है।
आपने कविताएं भी लिखी हैं। ज्यादा सहज आप कहां होते हैं, डायरी में या कविताओं में? ये दो भिन्न विधाएं क्या जाबिर हुसेन के अंतर्जगत के अलग-अलग प्रतिरूप हैं?
कथा-डायरी का रिश्ता मेरे सामाजिक सरोकारों से है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। ये मेरे खुद से बाहर के सफर को रेखांकित करती है, मुझको व्यापक समाज से जोड़ती है। लेकिन कविता मेरे भीतर जो कैफ़ियत है, उसको व्यक्त करने का माध्यम बनती है। कविताओं में अपने आपसे बातें करने का अवसर मिलता है। कभी-कभी अपने आपसे बातें करना जिंदा रहने के बराबर है। यह सिलसिला रुक जाये तो शायद जिंदा रहना भी मुश्किल हो। कविताओं में अपने आपको पूरी तरह खोलने का सुख है, जो आपका होकर भी सिर्फ आप तक सीमित नहीं रहता उसकी हदें व्यापक हो जाती हैं, विस्तारित भी। कविता मेरी रचनाशीलता को जिंदा रखती है। इसलिए बार-बार इसकी शरण में आता हूँ।
इन सबके बावजूद आप सच्ची बात पूछेंगे तो कहूंगा कि मैं न तो कविताएं लिखता हूँ, न कथा-डायरियां। ये दोनों मुझसे खुद को लिखवाती हैं और मेरे लिए मुश्किलें पैदा करती हैं। मुझे इन मुश्किलों से निबटने की कला नहीं मालूम। मैं करूँ भी तो क्या!
इधर क्या कुछ लिख रहे हैं?
तीन अहम्‌ काम अपने हाथ में ले रखें हैं। एक तो विधान परिषद् में अपने बारह साल के अनुभवों पर आधारित पुस्तक है। काफ़ी हिस्सा इस पुस्तक का लिखा जा चुका है। शीघ्र प्रकाश में आ जाए, ऐसी इच्छा है। दूसरा काम कबीर आज पर अपनी अधूरी पुस्तक का है। इसमें इधर थोड़ी प्रगति हुई है। लेकिन सबसे अहम्‌ काम उपन्यास कैनवस पर लिखी जा रही लंबी कथा-डायरी दोआबा है। ज्यादा समय इसी पर दे रहा हूं। दोस्तों और मेहरबानों ने जिंदा रहने दिया, तो जल्द ही ये सारे काम मुकम्मल हो जायेंगे।
आप लंबे समय से राजनीति में हैं। क्या हिंदू बहुल दलीय राजनीति में आपको मुस्लिम होने या इस नाते अकेले पड़ जाने का भी एहसास हुआ है?
मैं राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूँ। अब भी मेरे रिश्ते राजनीति से हैं। मैं वर्षों राजनीतिक ओहदों पर रहा हूं। एसेम्बली काउंसिल में रहा हूं। एक दशक से ज्यादा मैंने सदन चलाया है। अब कुछ महीनों से संसद में हूँ। मेरे लिए ये ओहदे हमेशा व्यापक सामाजिक जवाबदेही निभाने का माध्यम रहे हैं। मैं अपने फैसलों से कई निहित स्वार्थी राजनेताओं और अपराधी सरगनाओं को नाराज करता रहा हूं। जो तत्त्व जनता के बुनियादी सवालों पर अपने स्वार्थों को तरजीह देने के आदी हैं, उनसे हमेशा मेरा संघर्ष रहा है। ऐसे तत्त्व न सिर्फ मेरी मुखाल्फ़त करते हैं, बल्कि मेरे खून के प्यासे भी हैं। मैं इन तत्त्वों के इरादे जानता हूं, लेकिन इससे घबराता नहीं। समय-समय पर ये तत्त्व मुझे विवादों में ढकेलने की कोशिश करते रहते हैं। मैं उनके नाम गिनाना नहीं चाहता। सामाजिक संदर्भों में मेरी निरंतर क्रियाशीलता के कारण ही ये तत्त्व मुझे निशाना बनाते हैं। ये दरअसल नस्लवाद में यक़ीन रखने वाले लोग हैं। ये अपनी सोच और नजरिए से घोर जातिवादी और सांप्रदायिक हैं। मैं उन्हें तमाम पसमांदा बिरादरियों का हिमायती नजर आता हूँ। ये हमेशा लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि मेरा जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ है और राजनीति में मेरे अधिकार सीमित हैं। दलितों के प्रति भी इनके विचार कुछ इसी प्रकार के हैं। ये स्वस्थ एवं प्रगतिशील विचारों के दुश्मन हैं। इससे ज्यादा मैं इस वक्त उनके बारे में कुछ नहीं कहना चाहता।



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अभी तो हम सब कोशां है : नासिरा शर्मा

डॉ० फ़ीरोज अहमद
आपकी साहित्य साधना कब और कैसे आरम्भ हुई और उसके लिए प्रेरणा आपको कहाँ से मिली।
घर में लिखने पढ़ने का माहौल था। उससे कहाँ बचा जा सकता था। स्कूल में भी कहानी प्रतियोगिता आयोजित होती दोनों जगह रचनात्मक माहौल सृजन की दुनिया को लगातार अंकुर फोड़ने की प्रतिक्रिया में रखते जिसके कारण लेखन एक सहज प्रक्रिया के रूप में जीवन का हिस्सा बनती चली गयी।
सृजन से पूर्व, सृजन के समय और सृजन के पश्चात्‌ आपकी मनःस्थिति क्या होती है?
लिखने से पहले एक बेचैनी, कभी-कभी उदासी, अक्सर ख़ामोशी की कैफियत बनती है। लिखते समय जज्बात और ख्यालात का हुजूम उत्तेजना भरता है। तब कोई शोर या आवाज किसी तरह का खलल कभी मूड खराब करता है तो कभी तेज गुस्सा दिलाता है। उसका कारण भी है कि आपके हाथ से दरअसल भाषा का तारतम फिसल जाता है। जो बहाव सहज रूप से निकलता है वह फिर बनावट से पूरा होता है जो मुझे ठीक नहीं लगता मगर हमेशा ऐसा नहीं होता जब कहानी गिरफ्त में हो तो बाक़ी चीजें बेकार सी लगती हैं। क़यामत भी आकर गुजर जाये तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। लिखने के बाद एक अजीब-सी खुशी, इत्तमिनान-सा महसूस होता है मगर इस अहसास से मैं कोसों दूर रहती हूँ कि मैंने कोई शहकार रचा है क्योंकि कहानी मुकम्मल हो जाने के बाद भी, अभिव्यक्ति और किरदार की सहजता को लेकर मैं काफी सोचती और शब्दों को अक्सर बदलती रहती हूँ। जब हर तरफ से मुतमईन हो जाती हूँ तभी छपने भेजती हूँ।
साहित्य को आप किन शब्दों में परिभाषित करेंगी।
इन्सान बने रहने की कोशिश और इन्सान बने रहने के लिए दूसरों को उस कोशिश में शामिल करना।
इतनी लम्बी साहित्य साधना में क्या कभी आपका जी ऊबा है? यदि हाँ तो क्या कारण रहे हैं?
बीच-बीच में काफी फुजूल के काम करती हूँ। इसलिए हमेशा ताजगी का अहसास बना रहता है। लेखन और लेखक का भारी लबादा पहनना और उसे तकलीफ के साथ घसीटते जाना मेरी फितरत नहीं है।
अवाम के सन्दर्भ में साहित्य की भूमिका को आप किस प्रकार देखती हैं।
कहानियों में अवाम का दखल दरअसल एक महत्त्वपूर्ण गारा है जिससे आप कहानी बनाते हैं। मगर अफसोस जिस अवाम के लिए हम लिखते हैं ज्यादातर वे लोग साहित्य नहीं पढ़ पाते हैं। पहला कारण शिक्षित न होना, दूसरा मेहनत मजदूरी और सर छिपाने की जद्दोजहद के बाद उनके पास थककर सोने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। हम खुद ही लिखते हैं और खुद ही पढ़ते हैं जो शिक्षित है जिन्हें साहित्य से लगाव है उन तक पुस्तकें उस तरह सुलभ नहीं है जैसी होनी चाहिए। साहित्य की कोई कृति न सामूहिक रूप से समाज की धारा बदल पाई न समाज की कुरीतियों की जड़ से उखाड़ पाई न पुराने कानूनों में संशोधन करा पाई मगर हाँ, व्यक्तिगत रूप से कुछ व्यक्तियों को, बिखरे रूप से, जरूर बदल पाई मगर वास्तविकता तो यह है कि क्या अकेला चना भाड़ भूंज सकता है? कहने का अर्थ साफ है कि समाजिक जकड़न और जड़ सोच वाले कुनबे में जो व्यक्ति बदला, वह पूरे परिवार को नहीं बदल पाया मगर उसे घर निकाला जरूर मिला तो भी अपवाद की कमी नहीं है। यह अपवाद कब सामूहिक फोर्स में बदलेंगे और अवाम और साहित्यकार में कब संवाद स्थापित होगा कहा नहीं जा सकता है। अभी तो हम सब कोशाँ हैं।
क्या साहित्योपजीवी होकर जिया जा सकता है।
नहीं।
बाल-साहित्य के रूप में आपने साहित्य का विपुल मात्रा में सृजन किया है। हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य में उसकी स्थिति और भूमिका पर आपका दृष्टिकोण क्या है?
बच्चों के लिए मैंने बचपन से लिखा। लगातार लिखा मगर उस लेखन का उस तरह नोटिस नहीं लिया गया जिसको राष्ट्र के स्तर पर पहचान का नाम दिया जा सकता है क्योंकि हिन्दी की दुनिया में बाल-साहित्य का कोई अहम्‌ रोल नजर नहीं आता है जबकि उसके लिखने वालों की संख्या काफी है और वे जो केवल बाल-रचनाओं के साहित्यकार हैं उनको भी वह सम्मान और पहचान किसी मंच पर जैसी विदेशों के रचनाकारों को मिली हुई है नहीं प्राप्त है। जबकि बहुत कुछ बाल-भवन, नेशनल बुक ट्रस्ट के द्वारा होता रहता है मगर वह सब कुछ मुख्यधारा जैसा नजर नहीं आता है न इनकी चर्चा खास व आम में बराबर से होती है। बाल पत्रिकाएँ भी हैं। बाल-साहित्य पुरस्कार भी हैं। मगर जिस तरह उर्दू में अब्बू खाँ की बकरी को साहित्यिक कृति होने का तमग़ा मिला हुआ है या हर बड़े लिखने वाले ने बच्चों के लिए भी लिखा है वैसा रिवाज हिन्दी में देखने को नहीं मिलता है भले ही अन्य भारतीय भाषाओं में हो। हम भूल जाते हैं कि लेखक इन्सानी अहसास को अपने कलम से काग़ज पर उतारता है न कि खानाबन्दी किये इन्सानों में से किसी को उठाता है। गरीब-अमीर, अफसर-नौकर, मर्द-औरत, बूढ़े-बच्चे सब मिल कर परिवार में रहते हैं और समाज की संरचना करते हैं, मगर जब साहित्यकार कलम उठाता है तो उसकी रचना से अक्सर बाल पात्र गायब रहते हैं आखिर क्यों? क्या स्वयं उसका बचपन उसका पीछा कभी छोड़ता है? (कृष्ण बलदेव वेद के उपन्यास उसका बचपन याद आ गया) कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि हम अपने तक सीमित न रहें वैसे भी बच्चों के लिए लिखना आसान काम नहीं है। जबरदस्ती लिखवाना भी नहीं चाहिए मगर जो लिखते हैं उनको आदर व सम्मान मिलना चाहिए और हमारी मानसिकता में यह बात दाखिल हो जानी चाहिए कि बच्चों का एक बड़ा संसार है जिसमें जिज्ञासा, मासूमियत, भय, खुशी, चीजों को देखने और महसूस करने का बिल्कुल अलग अनुभव है जिसको समेटने का अर्थ है कि हम अपनी रचनाओं में केवल नई पीढ़ी को जगह नहीं दे रहे है बल्कि अपने कलम और अपनी सोच को निरन्तर शादाबी बख्श रहे हैं।
साधारणतया कहानी की एक परिभाषा दी जाती है कि कहानी घटना या घटनाओं का सुसंयोजित रूप है। आज की कहानी इस दृष्टि से काफी भिन्न नजर आती है। तो क्या इसको कहानी नहीं मानना चाहिए। आप अपनी राय बताइये।
घटनाएँ यदि कहानियाँ हैं तो फिर रिपोर्टिंग क्या हैं। पत्रकारिता और साहित्यिक लेखन का बुनियादी फर्क़ यह है कि एक में सूचना होती है और दूसरे में अहसास। रपट की सीमा जहाँ समाप्त होती है कहानी वहाँ से शुरू होती है। कहानी इन्सान के अन्दर की दुनिया को खोलती है बाहर के ब्योरे गैरजरूरी तौर से नहीं देती है। कहानी मेरी नजर में वह है जो घटनाओं का उल्लेख न करके उस घटना के प्रभाव का वर्णन करे जो इन्सान पर बीती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह लेखन रिर्पोताज भी हो सकता है और लेख भी कहला सकता है।
साहित्य लेखन में महिलाओं की क्या स्थिति है और उसका मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है?
हिन्दी साहित्य में महिलाओं का हमेशा से योगदान रहा है मगर हाँ, अब संख्या काफी बढ़ गई है। विभिन्न तरह के मुद्दों को लेकर उनकी कलम मुखर हुई है। यदि आप सवाल सम्पूर्ण औरत की स्थिति पर करते तो अच्छा होता है। अभी तक सही तरीके से हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन नहीं हो पाया तब उस लेखन के लिए क्या कहूं जो ग़ैरजरूरी तरीक़े से मुख्य धारा से अलग हो अपनी पहचान बनाने के संघर्ष में रत है।
विभिन्न साहित्यिक विमर्शों के सन्दर्भ में आपकी क्या मान्यता है। इसकी प्रासंगिकता के सन्दर्भ में आप क्या लिखती हैं।
बुनियादी तौर पर मैं साहित्य में खानाबन्दी की क़ायल नहीं हूँ। हम एक समाज में रहते हैं। समाज के बाँटे जाने पर एतराज करते हैं मगर वही काम हम अपने-अपने कार्य क्षेत्र में करने से बाज नहीं आते हैं। कुछ जुल्म हमारे यहाँ हुए हैं। उनका सिलसिला आज भी अफसोसनाक तरीके से जारी है मगर उसको इस तरह से खत्म करने की दलीलें कि विमर्श व आरक्षण देकर खत्म किया जाय न न्यायसंगत लगती है न तर्कसंगत लगती है। यही कारण है कि हम बहुत सारे मुद्दों से जूझने के बावजूद कहीं पहुंचे नहीं हैं।
कुछ लोगों का मत है कि आज की कहानी पाठकों से कट गई है। लेखक लेखकों से प्रशंसा प्राप्त करने के लिए लिखता है। क्या यह सही है?
इसमें कोई शक नहीं है कि आज पाठकों के वैसे खत नहीं मिलते हैं जैसे कि बीस वर्ष पहले मिलते थे। जिसमें कहानी पर जमकर बात होती थी। कहीं पर कुछ घटा तो है जो संवाद की स्थिति नहीं बन पाती है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमने कुछ जगहों पर बेजा हस्तक्षेप कर उनको पीछे धकेल दिया है जिनकी राय और प्यार की हमें जरूरत होनी चाहिए। शायद इसी के चलते पाठकों में पुस्तक खरीदने की संख्या भी घटी है। पहले दाम ज्यादा फिर उपलब्ध नहीं। खरीद्दारी लाइब्रेरी या अन्य संस्थाओं में बल्क के रूप में होती है तो वहाँ पाठक नहीं। बात केवल लेखक, प्रकाशक, पाठक के बीच तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीति का तंग दायरा और गैर जरूरी मुद्दों पर फोकस भी इस दुर्दशा में शामिल हैं।
हिन्दी कहानी साहित्य का भविष्य कैसा है?
हिन्दी में कहानियाँ लिखी जा रही हैं। बेहतर भी और खूबसूरत भी। जैसे-मधुसूदन आनन्द की जर्राह मेराज अहमद की अमरूद और हरी पत्तियाँ हसन जमाल की जमील मुहम्मद की बीवी', अब्दुल बिस्मिल्लाह की कागज के कारतूस', चित्रा मुद्गल की मिट्टी, रवीन्द्र कालिया की सुन्दरी बहुत देर तक याद रह जाने वाली कहानियाँ हैं। मगर परेशानी यह है कि हमारे कलम पर कुछ नाम चढ़ गये हैं। हम लगातार उसे दोहराते रहते हैं। कहानियों के नए नामों के लिए जगहें तंग हैं या फिर हम पढ़ते ही नहीं हैं क्योंकि भीड़ बहुत है। पत्रिकाएँ फिलहाल बहुत हैं। खेमे अंसख्य है। पैमाना तय नहीं, कसौटी का कोई प्रमाणिक मंच नहीं। अपनी ठफली अपना राग है। मगर यह समय निकल जायेगा। भुला दिए जाने के बाद भी बेहतर चीजें सामने आयेंगी। ऐसा हो रहा है। धूल, धुआँ, शोर, परिदृश्य को वक्ती तौर से धुंधला बना सकते हैं मगर कब तक?

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मैं कहता आँखिन देखी... : काशीनाथ सिंह

प्रो. रामकली सराफ
आपका ग्रामीण जीवन से गहरा सरोकार रहा है, आपके कहानी लेखन में इसकी क्या भूमिका रही है?
ऐसा है कि मैं गाँव में पैदा हुआ, वहीं पला बढ़ा, खेला-कूदा, खेती में भी साथ देता रहा। कटाई हो, दँवरी हो ये सब कुछ मैंने किया। हाईस्कूल तक गाँव में पढ़ा। उसके बाद इंटरमीडिएट में मैं शहर आया और फिर शहर में ही सारी पढ़ाई लिखायी हुई और वो भी बनारस में। लिखना तो शुरू कर दिया था बी.ए. में मामूली कविताएँ लिखता था जिसका कोई मतलब नहीं था। सन्‌ १९६० ई. के आसपास विधिवत्‌ लिखना शुरू किया।
कविता जब आप लिख रहे थे शुरू में, तो अचानक ये कैसे मोड़ आ गया कि कहानी लिखने लगे?
इसलिए कि मेरे भाई साहब (डॉ. नामवर सिंह) स्तम्भ लिख रहे थे कहानी पत्रिका के लिए और ज्यादातर घर में कहानियों पर बात होती थी। तो कहानी पत्रिका की कहानियों को पढ़ता था और उन कहानियों को पढ़ता था जिनकी तारीफ करते थे भाई साहब। खासतौर से रूसी कहानियाँ, हेमिंग्वे की कहानियाँ, मंटो की कहानियाँ तो इन्हें पढ़ता था तो कहानी की तरफ धीरे-धीरे मुड़ने लगा और कहानी लिखना शुरू किया सन्‌ ६० के बाद से। तो जो पात्र हमारे आते थे, जो जीवन होता था वो गाँव का ही होता था। धीरे-धीरे मुझे लगा कि मैं उस आदमी के बारे में लिख रहा हूँ जो गाँव को छोड़ चुका है, लेकिन शहर में रहते हुए शहर का नहीं हो पा रहा है। सन्‌ ६० के आस-पास की स्थितियाँ ऐसी ही थीं भी। मेरी शुरुआत की कहानियों में इस तरह का एक आदमी था।
नयी कहानी का दौर और उसके समाप्ति पर आपने लिखना शुरू किया। लेकिन उस प्रभाव से जो अपने को अलग किया लेकिन मुख्य बात यह है कि उस पूरे प्रभाव से स्वयं को बचाते हुए कैसे इतना बड़ा परिवर्तन आपके लेखन में आया? क्या बदली हुई परिस्थितियाँ ही थीं इसके मूल में?
देखिए, लगभग ऐसा समय तो शीतयुद्ध का था, कांग्रेसी हुकूमत थी। जनता का मोहभंग हो गया था... ढेर सारी योजनाएँ चालू की गयी थीं और योजनाएँ या तो अधूरी थीं या जैसे बाँध बन रहा था, बने बाँध लेकिन बारिश हो तो बाँध बह जाय। सड़कें टूट जाएं, विकास जैसे होना चाहिए था वैसे नहीं हो रहा था। तो लग रहा था कि यह सत्ता इस लोकतंत्र में जनता के लिए जो काम कर रही है वह काम संतोषजनक नहीं है और इस पर मुहर लगाने का काम किया जनता ने। पूरी तरह से भारत प्रभावित हुआ था। इस परिवर्तन ने हमारी भाषा को भी प्रभावित किया और हमारे कंटेंट को भी।
आपकी कहानियों में तो है ही लेकिन आज जो कथा रिपोर्ताज लिख रहे हैं संतो घर में झगड़ा भारी पांडे कौन कुमति तोहे लागि... आदि में जो गँवईमन झाँक रहा है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
बुनियादी निर्माण तो हमारे गँवई मन का ही है, इसलिए वह भाषा वो मुहावरे, वो लोकोक्तियाँ, वो मन, वो संस्कार कहीं-न-कहीं हमारी रचनाओं पर आज भी प्रभाव जमाए हुए हैं।
आपकी पहचान आज के कथा साहित्य में एक खास किस्म की बन चुकी है। कथा भाषा को लेकर तथा कथा स्थल को लेकर (अस्सी लंका के संदर्भ में) एक बात बताना चाहेंगे कि क्या ये स्थल एक ऐसे रूपक के समान तो नहीं हैं जहाँ से हम पूरे वैश्विक परिस्थिति और परिवेश को देख सकते हैं? (संदर्भ-संतों घर में झगड़ा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागि, कौन ठगवा लूटल नगरिया हो)
ये अच्छी बात की है आपने। दरअसल मैं कहानी से संस्मरण की तरफ आया और संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की ओर। इसमें एक संगत रही है। मेरे दिमाग में था कि जब व्यक्ति पर संस्मरण हो सकता है तो स्थल पर क्यों नहीं? व्यक्ति पर जिस तरह लिखा जा सकता है उस तरह से उस स्थल पर भी लिखा जा सकता है। जहाँ मैं रहा था। २०-२५ वर्षों तक उस स्थल को देखा। एक तरह से देखा जाय तो जैसे मेरा सम्पर्क बना था विश्वविद्यालय से पहले वैसे ही अस्सी से सम्पर्क बना रहा। रोज-ब-रोज आना-जाना रहता था। अस्सी को बदलते हुए देख रहा था, लोग बदल रहे थे। ९० के बाद मैंने कथा रिपोर्ताज लिखने की शुरुआत की। पहला रिपोर्ताज सन्‌ १९९१ में देख तमाशा लकड़ी का (हंस में) अस्सी पर था। अस्सी बदल रहा था, कारण चाहे भूमंडलीकरण रहा हो या और...। विदेशी आ रहे थे घाट के किनारे के मकान लॉज बनने शुरू हो रहे थे, वे हमारे बीच रह रहे थे, हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे थे, इसमें महिलाएँ भी थीं और पुरुष भी थे। देखिए, कहने को तो यह मुहल्ला है लेकिन रिफ्लेक्ट कर रहा है पूरे देश को। विदेशियों में आस्ट्रेलिया, नाइजेरिया, हंगरी से थे जो अपनी संस्कृति के साथ हमारे बीच में थे। इस वजह से हम सांस्कृतिक धरातल पर एक दूसरे से मिल रहे थे। मुझे लग रहा था कि वस्तुतः यह है एक मुहल्ला, लेकिन है नहीं मुहल्ला, यह है पूरा देश। अमेरिका पर टिप्पणियाँ हैं।
कैथरीना महिला जो बनारस पर शोध कर रही है, बनारस के प्रति क्या धारणा है? वह व्यक्त करती है। उसकी प्रतिक्रिया होती है लोगों में। भूमंडलीकरण के दौरान अस्सी सूचक है देशी-विदेशी परिप्रेक्ष्य में। बड़ा फलक है। अस्सी को एक मुहल्ला मानकर न देखा जाय।
बनारस को मिनी भारत कहा जाता है। तमिल, कन्नड़, बंगाली, असमिया, सिंधी, ईसाई सभी रहते हैं। यह मिनी भारत है। इस कारण यह संभव हो सकता है कि विदेशियों और भारत के सांस्कृतिक टकराव के लिए चुना और देखा.
डॉ. साहब आपके रचना स्थल और पात्र बिल्कुल निश्चित हैं तथा जीवित हैं, क्या आपको उनकी आलोचना का शिकार नहीं होना पड़ता है? क्या रचनाकार के लिए यह कम चुनौतीपूर्ण कार्य है कि हम उसी समय की कहानी उसी समाज के लोगों के बीच रहकर उन्हें खड़ा करके कहते हैं? यों कहें कि आप हिन्दी कथा साहित्य में कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपणाँ चले हमारे साथ की चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं और दे भी रहे हैं। इसमें आपको कैसा अनुभव होता है? क्योंकि दौर तो घर बनाने का है और बचाने का है और इसमें आपकी कहानियाँ घर जलाकर साथ आने की बात करती है?
जी, साहस किया था उसे लेकर...। प्रेमचंद ने अपनी कहानी में (मोटेराम शास्त्री) एक ब्राह्मण को खड़ा किया था नाम बदलकर। उन पर मुकदमा भी हुआ। तो ऐसे में जीवित पात्रों को लेकर रचनाओं में सीधे-सीधे इस्तेमाल... (विस्मय) मेरी जानकारी में हिन्दी के किसी लेखक ने मेरे पहले ऐसा नहीं किया है सीधे-सीधे जीवित पात्रों को लेकर। हाँ,... डर तो था ही, गालियाँ मिली, धमकियाँ मिली, मारने तक की बात आयी। ऐसा मेरे किसी खास रचना के साथ नहीं हुआ बल्कि चाहे संतो-असंतो घोंघा बसंतो हो, देख तमाशा लकड़ी का हो, संतो घर में झगड़ा भारी हो... सभी के साथ हुआ। मुश्किल तो बहुत था। जिस रिपोर्ताज में पप्पू का जिक्र है उस पप्पू पर संस्कृत पढ़ने वाले बच्चों ने पत्थर मारा था।
कर्फ्यू लगा हुआ था, कारण दूसरा था लेकिन... धीरे-धीरे फिर पात्रों को ऐसा लगा, अहसास हुआ कि वे इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि लोग देखने आ रहे हैं तो महत्त्व के कारण सम्मान दे रहे हैं। कौन है जया सिंह, दीनबंधु तिवारी कौन है? तो कौन है पप्पू चाय दुकानवाला? तो जैसे उन्हें महत्त्व का ज्ञान हुआ अब गाली के बदले सम्मान मिलने लगा।
कथा भाषा को लेकर सवाल खड़े किए गए, श्लीलता-अश्लीलता का आरोप लगा, आपको विरोध झेलना पड़ा?
कथा भाषा को लेकर उन पात्रों की तरफ से कोई विरोध नहीं था, क्योंकि मैंने उन्हीं शब्दों को उन्हीं बातों में रखा था जिसे उन्होंने कहा था। बातों में सच्चाई थी इसलिए उन्हें इनका विरोध नहीं था। विरोध तो साहित्यिक रुचि के पाठकों को लगा, विरोध लेखकों का था उन पाठकों का था जो यह मानते हैं कि साहित्य बहुत अभिजात्य था। विरोध उनका था जो साहित्य को शराफत भरा मानते थे।
हाँ,... मैं पाठकीय प्रतिक्रियाओं के सन्दर्भ में पूछ रही थी।
सड़क के पाठकों के साथ ऐसा नहीं था उन्हें तो लग रहा था कि इसमें उनकी जिन्दगी बोल रही है।
एक बात खास यह लगती है कि दलित लेखन की भाषा पर भी अश्लीलता का आरोप लगा लेकिन वे अपने बचाव के लिए आपके पास क्यों नहीं लौटते हैं? क्यों नहीं कहते कि सवर्ण लेखकों ने भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया?
दलित लेखन एक आन्दोलन की तरह था - इनके पहले मैंने लिखा है, लेकिन दलित लेखन की भाषा पर हमसे कोई खास बात...। उन्होंने काफी बाद में शुरू किया लेकिन उनकी ओर से कोई तालमेल नहीं कोई सफाई नहीं...।
इधर बीच आपकी कहानियों में एक चीज देखने को मिल रही है लगभग कहानियों के शीर्षक कबीर के पदों की पंक्तियाँ हैं - इसके पीछे आपकी क्या चिन्तन पद्धति है? मुझे लगता है कि आपकी रचनाओं में पैठी साहसिकता है, जो बार-बार आपको उधर ले जाती है?
ये मेरी चिन्तन पद्धति नहीं है बनारस की एक परम्परा रही है जो बड़ी शालीन है। वह लोक परम्परा है जबकि दूसरी ओर तुलसी ब्राह्मणवादी परम्परा के प्रतिनिधि कवि हैं और कबीर उनके ठीक उलटे छोटी जातियों के कवि हैं। सम्प्रदाय विरोधी और साहस का काम करने वाले कवि हैं। शीर्षक चुनने के लिए कबीर से बल मिलता रहा है, इसलिए मैं कबीर की ओर लौटता हूँ। आँखिन देखी बात कबीर कहते हैं और मैं भी आँखिन देखी ही कहा करता था।
आप डॉ. धर्मवीर के बारे में क्या कहेंगे जो धर्मवीर कबीर पर और कबीर के आलोचकों पर प्रहार कर रहे हैं?
धर्मवीर कबीर पर ही नहीं प्रेमचंद पर भी (सामंत का मुंशी) प्रहार करते हैं। मैंने पढ़ा नहीं उसे। धर्मवीर को अब उतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, वे अनर्थ कर रहे हैं। चीजों को गलत इंटरप्रेट कर रहे हैं। सचमुच धर्मवीर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं।
ऐसा लगता है कि प्रेमचंद से आप ज्यादा प्रभावित नहीं हो पाए। ऐसा क्यों?
नयी कहानी प्रेमचंद की खिलाफत का आन्दोलन था। नये कहानीकार प्रेमचंद की कहानियों को पुरानी कहानी कहने लगे। कफन, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ में आधुनिक तत्त्व की तलाश की जाने लगी। नयी कहानी के तत्त्व भी तलाशे जाने लगे। विरोध के नाम पर प्रेमचंद की प्रासंगिकता शुरू हो गयी थी।
अपने समय में अपने समकालीनों के बीच मैंने ही सबसे ज्यादा प्रेमचंद की चर्चा की। प्रेमचंद ने शक्ति दी, प्रेमचंद ने बड़ा साहस प्रदान किया। वो कौन-सी चीज है जिसने प्रेमचंद को प्रेमचंद बनाया? देखिए, कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढ़ने और पढ़ाने की नहीं। श्रवणीयता बुनियादी चीज है। इसको मैंने समझा और ये हमारे लेखन में भी है। मेरे सभी कथा रिपोर्ताजों में मिलेगी। हमारे यहाँ भी श्रवणीयता बुनियादी चीज है।
महाकवि तुलसीदास में भी तो श्रवणीयता है वे केवल सनातनी और ब्राह्मणवादी ही नहीं थे। तो क्या भविष्य में तुलसीदास पर लिखने के लिए सोचा है आपने?
जी, नाटक लिखने की सोच रहा हूँ दस पन्द्रह वर्षों से। खासतौर से तुलसीदास जब अंतिम दिनों में बाहुशूल से पीड़ित हैं कोई देखने वाला नहीं है। तुलसीदास के उपेक्षित दिनों पर। जिस तरह से इस ब्राह्मण मुहल्ले ने उपेक्षित किया है उन्हें। वैसे इन विषयों पर लिखना इतिहास की ओर लौटना होगा और इतिहास की ओर लौटना एक तरह से भागना होता है। हमें वर्तमान पर लिखना चाहिए। वैसे जो भी नाटक आए जैसे- आषाढ़ का एक दिन हो अंधायुग हो कबिरा खड़ा बाजार में' हो सभी इतिहासाश्रित नाटक हैं। जबकि ऐसा मैं नहीं सोचता इसलिए हम वहाँ आश्रय नहीं चाहते हैं। इसलिए तुलसीदास पर मैंने नहीं लिखा।
संचारतंत्र और मीडिया, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद पर आप लगातार हमले कर रहे हैं। सच ही यह समय का यथार्थ है और यथार्थ की अभिव्यक्ति है लेकिन प्रारंभिक दौर में आपने जिस तरह काम किया है स्त्री-विमर्श पर। कहनी : उपखान में संग्रहित अनेक कहानियाँ इसकी गवाह हैं। अब जब पूरा दौर स्त्री-विमर्श को लेकर सक्रिय है आप मौन क्यों हैं? जबकि सातवें दशक में बड़े बेबाक तरीके से अभिव्यक्त कर रहे थे?
स्त्री-विमर्श पर बातें खूब हो रही हैं, बहसें हो रही हैं, राजेन्द्र यादव के अनुसार दलित और स्त्री एक हैं। स्त्रियों का शोषण दलित भी अपने घरों में करते हैं। पुरुष वर्चस्व सभी जगह है। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि वह लेखन ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है, न स्त्रियों द्वारा और न पुरुषों द्वारा। खुद स्त्रीविमर्श पर बात करने वाले लोग अपनी बेटियों और पत्नियों पर दोहरे मानदंड अपनाते हैं, यह सोचने का विषय है।
लेकिन डॉ. साहब यहाँ हावी तो पुंसवादी दृष्टि ही रही है।
हाँ-हाँ, आप ठीक कह रही हैं।
डॉ. साहब, मार्क्सवाद के बारे में बताएँ? पहले आप इस जीवन दर्शन से प्रभावित रहे लेकिन अब ऐसा नहीं लगता कि आप उससे कुछ अलग हटे हैं। इसमें एक और बात कि स्त्री और दलित लेखन में मार्क्सवाद की भूमिका कितनी बनती है?
देखिए, मार्क्सवादी दृष्टि से हम अलग नहीं हैं। अब हम लोकतांत्रिाक हो गए हैं। मार्क्सवाद को हम व्यवहार में लाए और वही हमारे विचार में भी बदलाव लाया। अब मार्क्सवादी कट्टरता नहीं रही है हमारे भीतर। स्त्री, दलित मुद्दे पर मार्क्सवादी दृष्टि हमें बल देती है। दलित जीवन में वर्ण के साथ वर्गान्तरण हो रहा है और दलित लेखक आत्मबद्ध हो रहे हैं। वर्ण एक सामाजिक सच्चाई है लेकिन वर्ग को दरकिनार करके नहीं देखना चाहिए। अम्बेडकर और मार्क्सवाद दोनों मिलकर दलित लेखन को ताकत प्रदान करते हैं।
हाँ, यह तो सही है लेकिन डॉ. साहब आपने भी जाति केन्द्रित कहानियाँ लिखीं हैं, जिसमें जातीय समस्याओं को लेकर गंभीर विमर्श किया गया है, फिर भी इन कहानियों ने दलित लेखकों का ध्यान आकर्षित नहीं किया?
हाँ, जाति केन्द्रित कहानियाँ हैं चोट, सराय मोहन... जाति को ध्यान में रखकर ७१ में चोट लिखी जो आधार पत्रिका में प्रकाशित हुई। वे तीन घर कहानी सराय मोहन की' उन्हें दलित विमर्श की कहानी नहीं कह सकता, क्योंकि दलित विमर्श तब तक आया ही नहीं था। इसमें सवर्ण दृष्टि... यह लेखक की गलती है। चोट कहानी में दलित अन्तर्विरोध भी है - तीन घरों के बारे में टिप्पणी है इसमें। दलित स्त्रीहै अपने कामरेड मित्र से कहती है कि उन दलित घरों पर ध्यान मत दीजिए। कहानी सराय मोहन' में ठाकुर, ब्राह्मण, हरिजन हैं। हरिजन रोटियाँ बना रहा है और उसकी रोटियाँ सब खा जाते हैं। भूख के सामने जाति का कोई मतलब नहीं रह जाता। लेकिन जैसे ही पता चलता है कि वह दलित है ब्राह्मण तो पचा जाता है और ठाकुर कै कर देता है और उसकी लुटिया भी चुराकर पंडित जी चल देते हैं। जैसे वे तीन घर दलितों के भीतर के अंतर्विरोध को व्यक्त करती हुई कहानी है वैसे ही कहानी सराय मोहन में ब्राह्मण के प्रति उपहास का भाव है दलित का प्रतिकार है। पर कहानीकार ने स्वयं बताया कि ये दलित विमर्श की कहानियाँ नहीं हैं।
भले ही आप कहें, लेकिन दलितों ने उसकी नोटिस क्यों नहीं ली जबकि दलित टोन तो है?
कोई बात नहीं... उधर ध्यान जाना चाहिए था।
ठाकुर का कुआँ, सद्गति, कफन इस पर क्या कहेंगे? जबकि ये भी तो दलित विमर्श से पहले की कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ बराबर उनके घेरे में हैं क्यों?
सारनाथ वाली गोष्ठी में मैंने कहा था प्रेमचंद बरगद हैं और हम लोग बरोह हैं, जो उसी की डाल से हम लोग निकले हुए हैं जिसकी जड़े जमीन में हो जाती हैं। प्रेमचंद आज भी अद्वितीय हैं। उनके सामने जातियाँ नहीं थी, पूरा देश था। जाति या दलित उसी स्वाधीनता आन्दोलन के अंग हैं।
आज के दलित लेखन को किस रूप में आप देखते हैं?
प्रेमचंद की दृष्टि गाँधीवादी थी और आज के दलित लेखन की दृष्टि अम्बेडकरवादी है। सुमनाक्षर ने रंगभूमि जलायी। जबकि ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल पाल चौहान की सहमति है प्रेमचंद से। हाँ, असहमति है तो इसलिए कि प्रेमचंद लेखक हैं दलित नहीं। दलितों की पीड़ा केवल दलित ही लिख सकते हैं, जबकि साहित्य में ऐसा कोई अंकुश नहीं है। वे मानते हैं कि दलितों की समस्या पर अम्बेडकरवादी दृष्टि से विचार करें। लेकिन यदि कोई सवर्ण भी अम्बेडकरवादी दृष्टि से लिखे तो भी वे ऐसा नहीं मानेंगे। इसके लिए वे दलित होना आवश्यक मानते हैं। यह नजरिया एकांगी है।
आपने महत्त्वपूर्ण दलित लेखक सूरजपाल चौहान की संतप्त की भूमिका लिखी है। दो पृष्ठ की भूमिका पाठक को बाध्य कर देती है कृति से होकर गुजरने के लिए। डॉ. साहब एक बात बताना चाहेंगे कि सूरजपाल ने दलित पीड़ा को न सिर्फ बाहरी संघर्ष को अभिव्यक्त किया है अपितु दलित समाज के भीतर की संरचना को एकांकित किया है? दूसरे शब्दों में दलित अंतर्विरोधों का खुलासा किया है उन्होंने इस कृति में। हम देख भी रहे हैं। आज यह स्थिति दलित लेखन में तेजी से घर कर रही है। दो हिस्सों में बँटा दलित लेखन कहीं अपने उत्स तक पहुँचने के पहले चूक तो नहीं रहा है?
मैं ऐसा नहीं मानता। कहानियाँ उतनी अच्छी नहीं लगीं आत्मकथा के बनिस्बत। आत्मकथाएँ मुझे बेहद पसंद हैं। अंतर्विरोध आन्दोलन को अंततः मजबूत करता है। यह एक डेमोक्रेटिक प्रोसेस' है। इससे आन्दोलन मजबूत होगा। मैं देखता हूँ प्रगतिशील आन्दोलन को, शिवदान सिंह चौहान, रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द गुप्त, अमृत राय, यशपाल एक ही आन्दोलन में थे। लेकिन इनके विचार विरोधी थे और आन्दोलन प्रभावित हुआ, प्रगतिशील लेखन खत्म हुआ। दलित आन्दोलन का भी ऐसा हो सकता है। लेकिन विचारधाराओं में टकराव से जो स्थिति आएगी उसमें से लेखन की एक उर्वर भूमि बनेगी। विघटन के बीच से जो चीज आएगी उसमें एक ताजगी एक नयी ऊर्जा मिलेगी।
हाँ, यह भी एक संभावना बनती है। लेकिन क्या दलित लेखन में खासतौर पर आत्मकथाएँ एक रस नहीं हो रही हैं?
हाँ-हाँ, जो आन्दोलन हुआ था अफ्रीका में ब्लैक लिटरेचर का वह थम गया। आज दलित आन्दोलन की आवाज भी मद्धिम हो रही है। कंट्राडिक्शन का आना शुभ है यहाँ से ऊर्जा मिलेगी। दूसरी बात सभी एक ही दिशा में सोचेंगे-लिखेंगे तो आन्दोलन का क्या होगा?
फिर भी डॉ. साहब आन्दोलन की धार मद्धिम पड़ी है?
हाँ, ऐसा हो रहा है।
दलित लेखन में स्त्रीलेखन की कमी आपको परेशान करती है? मान लीजिए कि विमला चौहान भी अपने सच को लिखें तो कहीं सच का दूसरा रूप तो उभरकर सामने नहीं आयेगा? क्योंकि शुरू से ही सब कुछ का बहुत हद तक एहसास करते हुए सूरजपाल मूक क्यों बने रहे? उनका लेखन तो काफी बोल्ड है। लेकिन इसके मूल में वजह क्या है? उनमें भी कोई कमी तो नहीं है? लेखन में इतनी प्रखरता साफ दृष्टि और जीवन में इतनी चुप्पी?
विमला चौहान का प्रसंग पढ़ा था भूमिका लिखते समय, उस समय मेरी स्थिति थी कि एक तरफ तो सूरजपाल के सामने सिर झुक रहा था और क्रोध भी आ रहा था कि रोका क्यों नहीं? सूरजपाल की कौन-सी मजबूरियाँ थी? सूरजपाल ने क्यों नहीं रोका क्यों चुप थे? विमला आगे बढ़ती जा रही थी। (क्षणभर चुप रहकर) यह तो विमला ही बता सकती हैं।
दलित लेखन में स्त्रियों को लेकर उनकी समस्याओं को लेकर लेखक चुप हैं, लेखन के क्षेत्र में दलित स्त्रिायाँ भी आगे नहीं आ रही हैं। जबकि मराठी में कुछ दलित स्त्रियों ने बड़ी शिद्दत से अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं?
देखिए, मैं तस्लीमा को पढ़ता हूँ भारतीय लेखिकाओं को पढ़ता हूँ। अब लेखन कम हो रहा है, विमर्श ज्यादा हो रहा है। यहाँ वह तेजस्विता नहीं है। स्त्रीविमर्श का मतलब हिन्दी के लेखक के लिए देहमुक्ति है।
जी डाक्टर साहब, कुछ लेखकों के लिए हो सकता है, पर स्त्रीविमर्श यहीं तक सिमटा हुआ नहीं है। स्थितियाँ तो विपरीत हैं, एक साथ स्त्री पर भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद मिलकर हमला कर रहे हैं, स्त्री आन्दोलन आज भी साहित्य के धरातल पर ही ज्यादा दीख रहा है। सामाजिक धरातल पर बहुत कम, तो ऐसे में किस प्रकार यह सामाजिक धरातल पर आएगा क्योंकि स्त्रीआन्दोलन और स्त्री साहित्य अस्मत और अस्मिता का साहित्य है?
देखिए, जो हजारों साल से हमारे संस्कार बने हैं, उसे न तो पुरुष लेखक तोड़ रहे हैं और न स्त्रियाँ। स्त्रियाँ तो तोड़ रही हैं बहुत हद तक पुरुष लेखक नहीं तोड़ पा रहे हैं। उनकी फ्यूडल मानसिकता स्त्री शोषण से बाज नहीं आ रही है।
वर्तमान कथा लेखन पर आपकी क्या टिप्पणी है?
संभावनाओं से भरा अच्छा लेखन हो रहा है। हाँ, युवा लेखकों में प्रसिद्धि पाने की बेचैनी है जो घातक है उनके लिए।
पहले लेखन में जो प्रतिरोधी स्वर था जो धार थी, वह धार आज के लेखन में क्या कम हुई है?
(थोड़ा गंभीर होकर) इसे पॉजिटिव ढंग से लेना चाहिए। ये कम अधिक होते रहते हैं। आज के युवा लेखकों में कम लिखकर प्रसिद्धि पाने का जो उतावलापन है, उसी बाजारवाद के कारण है। बाजारवाद के विरोध में लिखते भी हैं और उसी से स्वीकृति भी पाना चाहते हैं। धार तो कमजोर हुई ही है।
अपना रास्ता लो बाबा' में एक छटपटाहट है उस युवक के मन में। उसे लगता है कि उसके अंदर जो लगाव है वह टूटेगा तो कोई बड़ी चीज बिखर जायेगी। लेकिन आज सम्बन्धों के भीतर वह गहराई नहीं रह गयी है, वह उष्मा भी नहीं बची है। उससे रिक्त हो रहा है युवा लेखन। कहीं अपनी आत्मबद्धता के कारण है। इसे पीढ़ियों का गैप ही कहा जा सकता है? इनका लेखन आपको चुनौती नहीं दे पा रहा है। आपको इरीलिवेन्ट साबित नहीं कर पा रहा है। यही कारण है कि आज भी पाठक आपके लेखन को बड़ी शिद्दत के साथ पसंद कर रहे हैं।
इस टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद दे रहा हूँ। आप बहुत सही कह रही हैं। हाँ, यह पीढ़ी हमें हाशिए पर नहीं डाल पा रही है, जबकि इनसे पहले की पीढ़ी में एक ऊर्जा थी, चुनौती थी।
क्या व्यवस्था के साथ उनकी सहमतियाँ ज्यादा बन रही है?
हाँ, ऐसा है। लिखने के साथ जितना श्रम किया जाना चाहिए उतना श्रम नहीं कर रहे हैं। साथ ही लेखक का जो संबंध जनजीवन से होना चाहिए, लोक जीवन से होना चाहिए, अब ऐसा कम है।
सही है जब सुरेश कांटक, अखिलेश, उदय प्रकाश, सृंजय, देवेन्द्र आदि लिख रहे हैं तो उनमें तो एक धार है, कथा लेखन में एक ऊँचाई है।
आपसे मैं सहमत हूँ।
लेकिन आज?
आज निश्चित ही वह बात नहीं रह गयी है जो व्यवस्था को चुनौती दे सके या पाठक को व्यग्र और बेचैन बना सके और उद्वेलित कर सके।
वैसे आज आपको कथा लेखन के क्षेत्र में कौन से नये लेखक आकृष्ट कर रहे हैं?
चंदन पाण्डेय, कुणाल सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, राकेश कुमार मिश्र अच्छा लिख रहे हैं। इनके भीतर वह बेचैनी नहीं है जिसे हम लोग महसूस कर रहे हैं अपने लेखन के दौरान। चंदन पांडेय की दो कहानियाँ तो ठीक आयीं लेकिन तीसरी कहानी ऐसी लिखी जिस पर हम उम्मीद रखें या न रखें। देखिए न, आज ही एक लड़के ने फोन किया और कहा कि यह पुरस्कार मुझे मिल जाता तो ठीक रहता। स्वयं के लिए कहा था।

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मैं कहानी का होल टाइमर समीक्षक हूँ : मधुरेश

साधना अग्रवाल
हिन्दी कथा आलोचना के क्षेत्र में लगभग ३५ वर्षों से आप निरन्तर सक्रिय रहे हैं। हिन्दी कहानी और उपन्यास पर आपकी कई पुस्तकें छपकर चर्चित हुई हैं। मेरे मन में यह जानने की उत्सुकता है कि कविता, कहानी जैसी रचनात्मक विधा से शुरुआत न करके आपने किन कारणों से कहानी समीक्षा से लेखन का आरम्भ किया?
मैंने कई जगह इस बात का उल्लेख किया है कि अपने लेखन की शुरुआत मैंने कहानी से ही की थी। सन्‌ १९५६ में जब मैं बरेली कालेज, बरेली में इंटर में पढ़ता था, कालेज की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा मेरी कहानी बुघिया को प्रथम पुरस्कार मिला था जबकि उस प्रतियोगिता में एम.ए. के भी कई छात्र सम्मिलित थे। तब कुछ स्थानीय पत्रों में एक-दो कहानियाँ छपी भी थीं। बाबाशाह नामक अपनी एक कहानी मैंने यशपाल को सम्मति और संशोधन को भी भिजवाई थी। रांगेय राघव ने मेरी एक कहानी का शीर्षक ऊपर खाल नीचे खून रखा था। इसी दौर में मैंने कुछ अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद भी किया जो तब की कहानी और ज्ञानोदय प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपे थे। लेकिन इसी बीच मैंने कहीं अश्क को लिखा गया प्रेमचंद का एक पत्रपढ़ा जिसमें उन्होंने नए लेखकों को खूब सारा साहित्य, इतिहास, दर्शन आदि पढ़ने का सुझाव दिया। इस पत्र के प्रभाव में ही मैंने बी.ए. में हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य के साथ दर्शन भी पढ़ा फिर तीन-चार वर्ष मैंने कुछ नहीं लिखा - यह सोचकर कि अब पूरी तैयारी के बाद ही लिखूंगा। जब मैंने एम.ए. अंग्रेजी साहित्य में किया तो पढ़ने का और अधिक अवसर मिला। वह कुंजियों और गाइडों का दौर नहीं था। इसके बाद कहानी लिखने के बदले मैंने लहर की संपादिका मनमोहिनी जिनसे मेरा पत्राचार था और जिन्हें मैं मोना जी कहता था के सुझाव पर लहर के लिए यशपाल पर अपनी पहली टिप्पणी लिखी जो दिसम्बर ६७ के अंक में छपी। उसके बहुत पहले यशपाल से मेरा पत्राचार शुरू हो चुका था। वस्तुतः उस टिप्पणी के बाद आलोचना भीगे कंबल की तरह मुझ पर सवार हो गई। वैसे उसके बाद भी काफी समय तक मुझे लगता था कि कहानी ही मेरा मूल क्षेत्र है लेकिन आलोचना ने मुझे कभी छोड़ा ही नहीं। बाद में कुछ संस्मरण अवश्य लिखे जो कभी-कभार अभी भी लिख लेता हूँ।
जिस समय आपने लिखना शुरू किया कहानी समीक्षा का परिदृश्य कैसा था? यह धारणा प्रचलित है कि कहानी समीक्षा की शुरुआत डॉ. नामवर सिंह ने कहानी एवं नई कहानियाँ के अपने स्तम्भ से की। आगे चलकर धनंजय वर्मा, देवीशंकर अवस्थी, गोपाल राय तथा विजय मोहन सिंह भी इस क्षेत्र में आये। इन लोगों के बीच कहानी समीक्षा में किस तरह आपने अपने लिए स्पेस बनाया?
जब मैं कथालोचना के क्षेत्र में आया नामवर सिंह भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में निकलने वाली नई कहानियाँ में अपना स्तम्भ हाशिए पर लिख रहे थे। कहानी की आलोचना में धनंजय वर्मा, देवीशंकर अवस्थी, सुरेन्द्र चौधरी और विजय मोहन सिंह सक्रिय थे। इनमें सबसे अधिक क्षमतावान आलोचक सुरेन्द्र चौधरी थे। लेकिन कुछ तो इसलिए कि उन्होंने बहुत व्यवस्थित ढंग से कुछ नहीं लिखा और कुछ प्रकाशन के प्रति उनकी उदासीनता के कारण आज भी उनकी लिखी अधिकतर आलोचना पत्रिकाओं में दबी पड़ी है। बाद में देवीशंकर अवस्थी की पत्नी श्रीमती कमलेश अवस्थी ने अपने पति की पुस्तकों के प्रकाशन की दिशा में जैसी निष्ठा और समर्पण भाव से अपनी सक्रियता दिखाई वैसा दुर्भाग्य से सुरेन्द्र चौधरी के साथ नहीं हुआ। उनकी नई कहानीः प्रकृति और पाठ अपने समय में खूब चर्चित रही। बाद में उसकी लंबी भूमिका अलग से भी पुस्तक रूप में छपी। रेणु पर उनका एक महत्त्वपूर्ण और सुलिखित मोनोग्राफ साहित्य अकादमी से आया। लेकिन इससे कहीं अधिक उनका साहित्य आज भी असंकलित पड़ा है। धनंजय वर्मा की छवि नई कहानी की बदनाम त्रायी - मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर के जेबी आलोचक की ही अधिक रही। कलकत्ता कथा - समारोह में बाकायदा उन्हें ऐसा कहा गया। गोपाल राय ने कहानी पर कभी नहीं लिखा, वे पूरी तरह से उपन्यास के आलोचना और अनुसंधान-कर्ता ही बने रहे। देवीशंकर अवस्थी द्वारा संपादित नई कहानी : संदर्भ और प्रकृति और विवेक के रंग उनके आलोचना-विवेक की साझी है। कहानी पर वे अधिक नहीं लिख सके। लेकिन नई कहानी के बाद की कहानी की उनकी पहचान बहुत प्रामाणिक और विश्वसनीय है। विजय मोहन सिंह ने भी मुख्यतः सातवें दशक की कहानी पर ही अपने को केंद्रित किया। अज्ञेय उनके प्रिय लेखक थे। प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी उपन्यास में प्रेम की प्रकृति पर ही उन्होंने अपना शोध कार्य किया। पहले नामवर सिंह और बाद में अशोक वाजपेयी का संरक्षण उन्हें मिला। कहानी पर उनकी दो पुस्तकें भी छपीं जो समय-समय पर लिखे गए उनके लेखों और सभी समीक्षाओं के संकलन थे। कुछ कहानीकारों का उन्होंने स्वतंत्र मूल्यांकन भी किया, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, मुक्तिबोध, रघुवीर, रेणु, अमरकांत आदि, लेकिन पूर्वग्रह कराने का यह पूर्व ग्रह उन पर भी हावी रहा कि कवियों द्वारा लिखी कहानियाँ ही अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इसीलिए कहानी को सामाजिक विकास की समानांतरता में वे नहीं देख सके। कुल मिलाकर मेरे सामने यही परिदृश्य था और यहीं से मुझे शुरू करना था।
कहानी समीक्षा पर अपकी आरम्भिक पुस्तक आज की कहानी : विचार और प्रतिक्रिया है जो वस्तुतः आप द्वारा लिखित समीक्षाओं का संकलन है। आज इस पुस्तक को लगभग लोग भूल चुके हैं। शायद इसका दूसरा संस्करण भी नहीं हुआ, जबकि आपके कथा-आलोचक के विकास को समझने में यह पुस्तक मद्द करती है। अब पीछे मुड़कर देखने पर अपनी इस पुस्तक को आप किस रूप में लेते हैं?
मेरी पहली पुस्तक आज की हिंदी कहानी : विचार और प्रतिक्रिया सन्‌ ७१ में ग्रंथ निकेतन, पटना से छपी थी। उसे मेरे मित्रप्रो. गोपाल राय ने छापा था। उसमें संकलित अधिकतर निबंध और समीक्षायें मैंने बिसौली जैसे कस्बे में रहकर लिखी थीं। उसके निबंध तब अनेक महत्त्वपूर्ण पत्रिाकाओं - आलोचना, कल्पना, राष्ट्रवाणी कहानी तथा विकल्प आदि के विशेषांकों में छपे थे और उन्होंने मेरे बनते हुए आलोचक की पहचान को सघन किया था। उनमें से हिन्दी की चौदह श्रेष्ठ कहानियाँ : पुरानी पीढ़ी का योगदान मैंने शिवदान सिंह चौहान के अनुरोध पर आलोचना के चार खण्डीय स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी साहित्य विशेषांक के लिए लिखा था। नई कहानी के लेखक तब प्रेमचंद या कैसी भी परम्परा से अपने को जोड़ कर देखने में परहेज बरत रहे थे। यह निबंध मैंने छह महीने की तैयारी के बाद लिखा था। नई कहानी ने पुरानी पीढ़ी से क्या और कैसे लिया है इसका सोदाहरण उल्लेख इसमें विस्तार से हुआ था। इस लेख के लिखे जाने की प्रक्रिया में अनेक लेखकों - जैनेन्द्र कुमार, विष्णु प्रभाकर, अश्क, निर्गुण आदि से मेरा पत्राचार हुआ। बाद में कमल जोशी ने इससे प्रभावित होकर मुझे अपनी अनेक पुस्तकें भिजवाईं। अपने पत्रों में उन्होंने यह भी सूचनायें दीं कि कैसे राजेन्द्र यादव कभी आनंद परिहार और कभी किसी अन्य छद्म नाम से कल्पना, ज्ञानोदय आदि में उनके विरुद्ध लिखते रहे हैं - अपनी षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति के रहते। बाद में राजेन्द्र यादव ने उस लेख को पढ़कर मुझे पहला पत्र लिखा - अपने घोर विरोध और असहमतियों का उल्लेख करते हुए। भैरव प्रसाद गुप्त, शानी, अमरकान्त आदि के पत्र भी मुझे मिले और निबंधों की भी सघन और व्यापक पहचान बनी। वैसे उस किताब का कोई और संस्करण नहीं हुआ। लेकिन उसके कुछ निबंध मैंने सिलसिला में शामिल किए थे और हिन्दी कहानी : अस्मिता की तलाश में वह प्रायः सारी महत्त्वपूर्ण सामग्री ले ली गई है। इसका मतलब मेरे विचार से साधना जी यही है कि वे निबंध आज भी कुछ न कुछ महत्त्व रखते हैं - चालीस वर्ष बाद भी। कहानी की आलोचना में वह मुझे स्थापित करने वाली किताब है। तब विक्टर बालिन, नामवर सिंह, रमेश कुंतल मेघ आदि ने उस पर बहुत उत्साहवर्धक प्रतिक्रियायें भी प्रेषित की थीं। उसने मेरी आगे की राह तय भी की और आसान भी। मेरी दृष्टि में यही उसका महत्त्व है।
जहाँ तक मुझे याद है आपकी पुस्तक सिलसिला : समकालीन कहानी की पहचान' के अन्त में आपने महत्त्वपूर्ण कथा समीक्षकों पर भी विचार किया है। इस पुस्तक में खासकर डॉ. नामवर सिंह को आपने ठीक से याद किया है। नामवर जी के प्रति आपके पूर्वग्रह के कोई खास कारण हैं?
मेरी पुस्तक सिलसिला १९७९ में आई। सहयात्री के अंतर्गत उसमें नामवर सिंह और धनंजय वर्मा पर लेख हैं। नामवर जी पर लिखा गया लेख मूलतः रणधीर सिन्हा द्वारा सम्पादित आलोचक नामवर सिंह के लिए लिखा गया था और पहले वह वहीं छपा भी था। नामवर जी को मैंने पर्याप्त निकट से देखा है। उनका स्नेह भी मुझे मिला है एक समय मेरे अनुरोध पर वे पी-एच.डी. के मेरे गाइड भी थे भले ही वह काम कभी हुआ नहीं। बाद में उनकी उखाड़-पछाड़ काटने जमाने वाली प्रवृत्ति और जिसे वे रणनीतिक आलोचना कहते हैं। उस रुख को देखने-समझने के बाद मुझे कष्ट हुआ। शिष्यों और लाभार्थियों की जो भारी भीड़ उनके साथ रही आई है, उनमें से ही अनेक बाद में उनके विरोधी भी साबित हुए हैं। मेरी सबसे बड़ी पीड़ा अपने को उनका धीरे-धीरे नष्ट करते जाना रही है। व्याख्यान, चर्चा, विवाद का खून उनके मुंह को लग जाने से वे वह बहुत कुछ नहीं कर सके जो सिर्फ वे ही कर सकते थे। पहले वे प्रायः कहते थे कि रिटायरमेंट के बाद जमकर बैठेंगे और काम करेंगे। वैसा कुछ नहीं हुआ। मेरी पीड़ा कहीं न कहीं उन्हें नष्ट होते देखने की ही पीड़ा है। पिछले कुछ समय से मुझे लगता रहा है कि नामवर सिंह पर अपना संस्मरण और उनके पत्रों के प्रकाशन की दिशा में मुझे गंभीर होना चाहिए। शायद यहीं उसका सही समय है। उनके प्रति मेरे अनेक पूर्वग्रह मेरी उपेक्षाओं के आहत होने से उपजे हैं। वैसे भी लल्लो चप्पो और ठकुर सुहाती मेरा स्वभाव नहीं है। मैंने कभी सचमुच उन्हें बहुत प्यार और सम्मान दिया है।
हिन्दी कहानी की पहचान के बाद फिर आपने उसकी अस्मिता की तलाश की है। क्या आप पहचान और अस्मिता को अलग-अलग परिभाषित करना चाहेंगे?
जिसे आप कहानी की मेरी आलोचना में हिन्दी कहानी की पहचान' कह रही हैं वह वस्तुतः मेरी पुस्तक सिलसिला का उपशीर्षक था। यह पुस्तक सन्‌ ७९ में आई थी। हिन्दी कहानीःअस्मिता की पहचान सन्‌ ९७ में अर्थात्‌ उसके लगभग अठारह वर्ष बाद आई। हिन्दी में सामान्यतः आलोचना पुस्तकों के दूसरे संस्करण कम ही निकलते हैं। अस्मिता वस्तुतः पहचान का ही विस्तार है। अस्मिता की पहचान में कुछ निबंध मेरी पहली पुस्तक के भी हैं। सिलसिला में वे दो या तीन थे, यहाँ अधिक हैं। लेकिन इससे अधिक वह इन बीच के अठारह वर्षों में लिखी गई कहानी का मूल्यांकन ही अधिक है।
हिन्दी कहानी का विकास लिखकर आपने कथा आलोचना के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया है। लेकिन आपकी कहानी समीक्षा सम्बन्धित पुस्तकें देखने के बाद ऐसा लगता है कि आपमें पुनरावृत्ति बहुत ज्यादा है। क्या कभी आपने इस पर विचार किया है?
हिन्दी कहानी का विकास सचमुच पाठकों द्वारा पसंद की गई है। तीन वर्षों में उसके तीन संस्करण हुए हैं। हार्ड बाउंड के साथ उसका पेपर बैक्स संस्करण भी हुआ था। उसी श्रृंखला में फिर आगे चलकर मैंने उपन्यास और आलोचना पर भी पुस्तकें लिखीं और वे भी पढ़ी गईं। पहले की पुस्तकें मेरे पूर्व लिखित निबंधों और समीक्षाओं का संकलन थीं। यह पुस्तक एक बार में योजना बनाकर व्यवस्थित रूप में लिखी गई थी। स्वाभाविक है कि इसमें अपनी ही पूर्व प्रकाशित बहुत-सी सामग्री का उपयोग हुआ है। जिसे आप पुनरावृत्ति कह रही हैं वह नयी कहानी : पुनर्विचार और मेरी नई किताब कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार में भी मिलेगी क्योंकि संबंधित लेखकों पर आधार सामग्री तो एक ही है और मेरी ही है।
उपन्यास समीक्षा के क्षेत्र में आप देर से आये। कहानी पर तो आपकी कई पुस्तकें हैं लेकिन उपन्यास की आलोचना पर हिन्दी उपन्यास का विकास और हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान ही क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं है कि कहानी समीक्षा आपके लिए अपेक्षतयः सुविधाजनक है। हिन्दी उपन्यास का विकास तो बिल्कुल नई पुस्तक है इस क्षेत्र में लेकिन हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान में आपने न केवल महत्त्वपूर्ण उपन्यासकारों पर विचार किया है बल्कि महत्त्वपूर्ण उपन्यासों पर भी। फिर भी ऐसा लगता है कि हमारे समय के कुछ महत्त्वपूर्ण उपन्यास छूट गये हैं और कुछ ऐसे उपन्यास सम्मिलित कर लिये गये हैं जो हिन्दी उपन्यास की सार्थकता की पहचान ठीक से नहीं कराते। क्या यह इसलिए हुआ कि प्रकाशित समीक्षाओं को एक जगह एकत्र कर लिया जाए?
मेरे लेखन की शुरुआत सन्‌ ६२ में हुई। कहानी पर मेरी पहली किताब सन्‌ ७१ में आई। लेकिन पत्र-पत्रिकाओं में उपन्यास पर मेरा लिखना प्रायः साथ ही शुरू हुआ। मुझे अभी भी याद है कि उपन्यास पर मेरी पहली समीक्षा ठाकुर प्रसाद सिंह के कुब्जा सुंदरी पर थी जो लहर में ही छपी थी। इसके बाद मैंने यशपाल, अश्क, रेणु, भगवती चरण वर्मा, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश आदि के कुछ उपन्यासों पर समीक्ष में लिखीं। इस दौर में गोपाल राय द्वारा संपादित समीक्षा में मैं अधिकतर उपन्यासों की समीक्षा और वार्षिक सर्वेक्षण से संबंधित निबंध लिखे। हिन्दी उपन्यास पर मेरी पहली पुस्तक सम्प्रति है जिसकी जानकारी शायद आपको नहीं है। यह सन्‌ ८३ में आई। उसके पूर्व सन्‌ ८० में साहित्य अकादेमी से देवकीनंदन खत्री पर मेरा मोनोग्राफ छप चुका था। वहीं से दूसरा मोनोग्राफ रांगेय राघव पर सन्‌ ८८ में आया। स्पष्ट ही इन सबमें उपन्यासों पर ही विस्तार से लिखा गया है। हिंदी उपन्यास का विकास भी वस्तुतः इस पूर्व लिखित और प्रकाशित सामग्री के आधार पर ही बनी पुस्तक है। जहाँ तक हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान का सवाल है, वह एक तरह से उपन्यास पर मेरे लेखन का एक प्रतिनिधि चयन भी मानी जा सकती है। इसे संपूर्णता देने की दृष्टि से ही मैंने कुछ सामग्री देवकीनंदन खत्री और हिन्दी उपन्यास का विकास से भी ली है। ऐसी पुस्तकें योजनाबद्ध तरीके से नहीं लिखी जातीं। अपनी लिखित और पूर्व प्रकाशित सामग्री को संकलित करने की इच्छा भी स्वाभाविक है। इस तरह वह सामग्री कम से कम उसमें की कुछ सुरक्षित और संरक्षित रह जाती है। अच्छी से अच्छी पुस्तक में भी चयनित सामग्री के होने न होने को लेकर चुनौती दे सकती हैं। हिंदी उपन्यास : सार्थक की पहचान की अधिक समीक्षायें नहीं छपीं। प्रायोजित समीक्षकों के इस दौर में इसे मेरी और मेरे प्रकाशक की सीमा भी माना जा सकता है, लेकिन इसके प्रकाशन से मुझे संतोष है।
स्वतंत्र रूप से आपने या तो यशपाल पर विचार किया है या कहानीकार जैनेन्द्र कुमार पर। मेरे ध्यान में रांगेय राघव और यशपाल पर प्रकाशित आपके मोनोग्राफ भी हैं। मैं आपसे यह जानना चाहती हूँ कि आपने कथालोचना के व्यावहारिक पक्ष पर ही ज्यादा ध्यान दिया सैद्धान्तिक पक्ष पर कम, ऐसा क्यों?
हवाई और सैद्धांतिक आलोचना के दौर में भी मेरी भरसक यही कोशिश रही कि आलोचना लेखकों और कृतियों पर केंद्रित हो। मैंने देवकीनंदन खत्री, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर, भैरव प्रसाद गुप्त आदि पर पुस्तकें और मोनोग्राफ लिखे हैं। नयी कहानी : पुनर्विचार में भी नई कहानी आंदोलन के दौर के सोलह लेखकों पर समग्रता में विचार करने की कोशिश की गई है। मुझे इस बात का संतोष है कि अपने विचारों से बाहर के अनेक लेखकों पर मैंने विस्तार से लिखा है। इसका नया उदाहरण जैनेन्द्र की कहानियों पर मेरी किताब है। आपकी यह बात शायद ठीक है कि मैंने आलोचना के व्यवहारिक पक्ष पर ही अधिक लिखा है। हिन्दी में जनवादी आलोचना के दौर में घोर सैद्धांतिक लेखन हुआ और बाद में पूर्वग्रह घराने के लेखकों ने विचार को लगभग आलोचना से निष्कासित करके साहित्य में स्वायत्तता के नाम पर निर्जन, वीरान टापू बसाने की कोशिश की। मेरा मानना है कि सिद्धांत रचना में से ही अर्जित और विकसित होने चाहिए। पूर्वग्रह घराने के लोग आलोचना को जब विचारों का उपनिवेश बनाने की प्रवृत्ति का विरोध करते हैं तो वे वस्तुतः समय के वैचारिक दबावों से रचना को अलग और ऊपर रखने की ही वकालत करते हैं। रचना के मूल्यांकन का यह अवैज्ञानिक और अतार्किक रूप है। अपने समय के प्रति सच्ची रचना ही आगे आने वाले समय में भी पुनर्पाठ की संभावनाएँ जगाती है। किसी सैद्धांतिक समझ के अभाव में सार्थक व्यावहारिक आलोचना नहीं लिखी जा सकती। मेरी कोशिश रही है कि सिद्धांतों के किसी बाहरी जाप के बजाय व्यावहारिक आलोचना में से ही वे सिद्धांत उभरकर सामने आयें। ऐसी आलोचना अपनी प्रकृति में अधिक ग्रह्य, विश्वसनीय और पठनीय भी होगी।
क्या आपके मन में कभी हिन्दी कहानी का सौन्दयच्चास्त्र या हिन्दी उपन्यास का सौन्दर्य शास्त्र लिखने की बात नहीं उठी? जबकि हिन्दी आलोचना का मार्क्सवादी सौन्दय शास्त्र लिखने की बात जब-तब उठती ही रही बल्कि पहल ने मार्क्सवादी सौन्दय शास्त्र पर एक अंक भी केन्द्रित किया था।
सौंदय शास्त्र की शास्त्रीय अवधारणा ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया। शायद इसी कारण कहानी या उपन्यास का सौंदय शास्त्र लिखने का विचार भी मन में कभी नहीं आया। प्रेमचंद ने ही बहुत पहले सौंदर्य की कसौटी बदलने का सवाल उठाया था। जिस मार्क्सवादी सौंदय शास्त्र के निर्माण और विकास की बात हिंदी में जब-तब की जाती रही है वह वस्तुतः जीवन के संदर्भ में विकसित और निर्मित सौंदर्यबोध है। सौंदय शास्त्रे को मैं जीवन की परिपूर्णता और सलीके से उसे जीने की कला के अतिरिक्त और कुछ नहीं मान पाता। रचना की परिवर्तित अंतर्वस्तु के साथ उसका सौंदर्यबोध भी बदलता है। नयी कहानी : पुनर्विचार में आंदोलन और पृष्ठभूमि की चर्चा के प्रसंग में मैंने कहानी के इस परिवर्तित सौंदर्यबोध की चर्चा भी विस्तार से की है। हिन्दी में प्रायः ही नागार्जुन, त्रिलोचन आदि कवियों के प्रसंग में एक नए और परिवर्तित सौंदय शास्त्र की बात उठती रही है। यशपाल पर आने वाली अपनी पुस्तक यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश में मैंने यह दिखाने की कोशिश की है जिसे यशपाल का परम्परागत और रूढ़ शिल्प कहा और समझा जाता है। वह वस्तुतः कथानक हृास और उपन्यास में चरित्रकी तोड़-फोड़ के दौर में एक क्रांतिकारी कदम था। यशपाल मिली हुई दुनिया के विरुद्ध संघर्ष करके एक नई दुनिया बनाने के सपने को साकार करना चाहते हैं। भरे पूरे कथानक और पात्रों के द्वारा ही वे ऐसा कर पाते हैं। उनकी कला अपनी प्रकृति में ठीक वैसी ही कला है जो जीवन को सलीके से जीने की राह दिखाती है। जीवन की परिपूर्णता की इस कला को साधना ही वस्तुतः एक परिवर्तित सौन्दर्यबोध को विकसित करना है। हिंदी में मार्क्सवादी सौंदय शास्त्र के निर्माण और विकास की दिशा भी इससे बहुत अलग और भिन्न नहीं होगी।
मेरी जिज्ञासा आपसे यह जानने की भी है कि हिन्दी कथा-आलोचना खासकर कहानी समीक्षा पर कहानीकारों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि आठवें दशक से लेकर बीसवीं सदी के अन्त तक लिखी कहानियों का ठीक से मूल्यांकन नहीं हुआ। इस आरोप को आप किस रूप में लेते हैं?
साधना जी, हिन्दी कथा-समीक्षा के विरुद्ध सबके लिए कहने को काफी कुछ हैं। कभी-कभी आलोचकों में से भी कुछ उसे लतियाते देखे-सुने जाते हैं। स्थिति सचमुच बहुत अच्छी भी नहीं है। हिंदी में कहानी पर्याप्त विकसित विधा है और निरन्तर वह उत्कर्ष की ओर बढ़ रही है। काफी समय तक उसे हिन्दी में केंद्रीय विधा का गौरव भी दिया जाता रहा है। यदि सचमुच ही किसी विधा को केंद्रीय कहकर स्थापित किया जा सकता है। कहानीकारों और कहानी की तुलना में कहानी के आलोचक बहुत कम हैं। आठवें दशक से बीसवीं सदी तक की ही कहानी का नहीं, पुराने कहानीकारों का भी ढंग से मूल्यांकन नहीं हुआ है। हिन्दी में प्रायोजित समीक्षाओं के इस दौर में यह काम और भी मुश्किल हुआ है। उन पुराने लोगों से अलग किसी को क्या मिलने वाला है? लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस परवर्ती दौर की कहानी का मूल्यांकन हुआ ही न हो। कहानी पर मेरी ही पांच किताबें हैं। हिन्दी कहानी का विकास में मैंने अखिलेश और सारा राम तक की कहानियों को लिया है, बेशक उसके दूसरे संस्करण में, लेकिन इधर बिना देखे-पढ़े ही कथा-समीक्षा को गलियाने और लतियाने की प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है। अपने मन की आलोचना न होने पर... विलम्बित आलोचना की स्थिति में भी, लेखक सारी खीझ आलोचना पर उतारता है। आज हिन्दी में कहानी की आलोचना में दस आलोचक मुश्किल से मिलेंगे। कहानीकार हजारों में हैं। स्वाभाविक है कि सबका वैसा व्यवस्थित और संपूर्ण मूल्यांकन संभव नहीं है। यह गजब की आपा-धापी का दौर है। अपने अलावा किसी को और की चिंता ही जैसे नहीं है। अपने नाम के अलावा लेखक जैसे आलोचना में और कुछ पढ़ना ही नहीं चाहता। मुझे लगता कि हिन्दी कथालोचना की स्थिति सचमुच वैसी ही है जैसा उसका स्यापा आए दिन देखने-सुनने को मिलता है। महत्त्वपूर्ण लेखकों, प्रवृत्तियों और पुस्तकों की उपेक्षा उसने कभी नहीं की। यदि लेखक में दम है जो आलोचक झक मारकर उसका मूल्यांकन करेगा और वैचारिक असहमतियों के बावजूद मेरी नई पुस्तक कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार इसका प्रमाण है।
आरोप तो यह भी लगाया जाता है कि कहानी समीक्षा का कोई होल टाइमर समीक्षक नहीं मिला। ऐसे समीक्षक अनेक मिले जिनके लेखन में न निरन्तरता थी और न व्यवस्थित ढंग से कथा आलोचना करने की फुर्सत। बेशक हांडी के चावल की तरह जब-तब कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियों को टटोलने की कोशिश जरूर की। क्या इस आरोप का कोई ठोस आधार आपको लगता है?
बार-बार अपने को ही सामने रखना और उदाहरण बनाकर चलना अच्छी बात नहीं है। लेकिन जिसे आप कहानी का होल टाइमर समीक्षक कह रही हैं। मैं वही हूँ। मैं पिछले ब्यालीस वर्षों से लिख रहा हूँ - सिर्फ और सिर्फ कथा-समीक्षा। कहानी का इतिहास भले ही न लिखा हो, लेकिन जो लिखा है सब मिलकर वह इतिहास ही है। जिसे आप आलोचक के प्रसंग में उसकी निरन्तरता कहती है और सचमुच भी उसका बहुत मूल्य है, मैंने कभी उसे भी छीजने और सूखने नहीं दिया है। मेरे साथ और बाद के अन्य आलोचक जो कभी बहुत सक्रिय थे अब लिखना छोड़ बैठे हैं। मैं कह चुका हूँ कि कहानी की तुलना में आलोचना बेशक बहुत अपर्याप्त है। लेकिन मैं फिर उसे दोहराना चाहूँगा कि महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय लेखकों, प्रवृत्तियों, कहानियों का इसी आलोचना ने भरपूर नोटिस लिया है। कभी संपादक भी बहुत जिम्मेदारी के साथ इस प्रक्रिया में शिरकत करते थे। इसके कम से कम दो उदाहरण मैं अपने ही प्रसंग में दे सकता हूँ। जब आलोचना के स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी साहित्य विशेषांक के लिए पुरानी पीढ़ी का योगदान पर लिखने के लिए शिवदान सिंह चौहान ने मुझे आमंत्रिात किया तो कहानियों की एक सूची भिजवाकर यह सुझाव भी दिया कि इन कहानियों को आधार बनाया जा सकता है। मूल रूप में मुझे १२ कहानियाँ चुननी थीं। संख्या अधिक होने पर उन्होंने १४ की छूट दी। जिन कहानियों की सूची उन्होंने भिजवाई थी, मैंने उनमें से आधी कहानियाँ भी उस लेख में शामिल नहीं की लेकिन इससे संपादक के रूप में उनकी सजगता का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। आगे चलकर ज्ञानरंजन ने आधार के एक कहानी विशेषांक का संपादन किया। तब तक शायद पहल शुरू नहीं हुई थी। तब जेराक्स वाला दौर नहीं हुआ था। मुझे आज भी याद है कि लेख के लिए मेरी स्वीकृति के बाद उन्होंने कहानी, कल्पना सहित कुछ अन्य पत्रिकाओं में छपी कहानियों के कटिंग मुझे भिजवाए थे। इसके बाद भी यह छूट उन्होंने मुझे दी थी कि इनके अतिरिक्त भी यदि कोई महत्त्वपूर्ण कहानी हो तो मैं अपनी ओर से शामिल कर सकता हूँ। इसी तरह कभी शैलेश मटियानी ने विकल्प के कथा विशेषांक के लिए कुछ समीक्षार्थ कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण संग्रह भिजवाये थे। उनमें राजेन्द्र यादव, निर्मल वर्मा, मन्नू भण्डारी से लेकर तब की एकदम नवोदित कहानीकार सुधा अरोड़ा के बग़ैर तराशे हुए की याद मुझे अभी भी है। उन्होंने सुधा अरोड़ा को लिखा था और उन्होंने वह संग्रह सीधे मुझे भिजवाया था। मुझे नहीं लगता कि संपादन के प्रति ऐसी निष्ठा और ईमानदारी आज बची रह गई है। आज संपादक से असहमति का मूल्य उसकी काली सूची में शामिल होना है - चाहे नामवर सिंह हों, चाहे राजेन्द्र यादव हों या प्रभाकर जो पत्रिका में लेखक को कुछ मानदेय भी देते है, उनके संपादक जो आलोचक के कटोरे में जैसे भीख का सिक्का डालते हैं। क्या सचमुच आपको नहीं लगता कि इन स्थितियों ने भी स्वस्थ, विश्वसनीय और जेनुइन आलोचना को लगातार मुश्किल किया है? आलोचक से ही यह अपेक्षा क्यों की जाती है कि एक साथ वह इन सब मोर्चों पर लड़े? बयालीस वर्षों की अपनी रचनात्मक-आलोचनात्मक सक्रियता के बावजूद आज भी अपनी पसंद की किताब पर लिख पाना मेरे लिए हमेशा ही सुकर नहीं होता। यह जरूरी नहीं कि अपनी रुचि संपादक की रुचि से मिलती हो। इधर संपादकों के मन में आलोचक की इच्छा और रुचि का सम्मान निरन्तर छीजता गया है। वह दौर अब इतिहास की बात है जब रामविलास शर्मा से घोर असहमतियों के बीच शिवदान सिंह चौहान, अमृत राय, प्रकाश चंद्र गुप्त, हंसराज रहबर आदि उनके समालोचक में लिखते थे और रामविलास शर्मा, एक संपादक के रूप में, अज्ञेय को भी अपनी पत्रिाका में लिखने को आमंत्रिात करते थे। आलोचक इसी धरती का जीव है, अपने समय के प्रभावों और दबावों से वह कैसे और कहाँ तक मुक्त रह सकता है। उग्र असहमतियों की हम चाहे कितनी ही बात करें, मूल रूप से हम चापलूसी और ठकुर सुहानी वाली दुनिया में ही रह रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि लेखक की चिप्पी हटाने के बाद उसके नीचे संपादक का नाम साफ दिखाई देता है। मुझे लगता है कि इस पूरे परिवेश को ध्यान में रखकर ही आलोचना पर कोई सार्थक टिप्पणी की जा सकती है।
आज कहानी की एक सदी पूरी होने पर क्या आप महसूस करते हैं कि हिन्दी कहानी का विकास ठीक दिशा में हुआ? संक्षेप में आप कहानी के टर्निंग प्वाइंट और प्रवृत्तियों के बारे में यदि खुलासा करें तो वास्तविकता उजागर होगी?
मुझे तो यही लगता है कि सौ वर्षों में हिन्दी कहानी ने बिना अधिक भटके अपना रास्ता तय किया है। जहाँ तक मेरी जानकारी है किसी यूरोपीय या भारतीय भाषा की कहानी के मुकाबले इस विकास और कुल मिलाकर हिन्दी कहानी की उपलब्धियों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। आरम्भिक कहानियों के संदर्भ में मौलिकता और कलात्मक का सवाल जरूर उठाया जा सकता है लेकिन प्रेमचंद के हिन्दी में आने के पूर्व यानी १९१६ से पहले ही हिन्दी में प्रसाद की अनेक महत्त्वपूर्ण कहानियों के साथ ही माधवराव सप्रे, बंग महिला, चंद्रधर शर्मा गुलेरी आदि की कहानियाँ आ चुकी थीं। ये कहानियाँ एक ओर यदि कहानी को सामाजिक राष्ट्रीय संदर्भों से जोड़ती हैं वहीं रचना विधान की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। हिन्दी कहानी का पहला चरण यही है। प्रेमचंद का हिन्दी में आना और दो दशकों की उनकी रचनात्मक सक्रियता उसका दूसरा कारण है। जैनेन्द्र और अज्ञेय से हिन्दी कहानी का तीसरा चरण माना जा सकता है। प्रेमचंदोत्तर हिन्दी कहानी में जैनेन्द्र और यशपाल दो धाराओं के प्रतिनिधि लेखकों के रूप में भी रेखांकित किए जा सकते हैं। हिन्दी कहानी में नई कहानी का आंदोलन अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। आज हम इस स्थिति में हैं कि उसका तटस्थ और वस्तुपरक मूल्यांकन कर सकें, ऐसी ही एक विनम्र कोशिश नयी कहानी : पुनर्विचार में मैंने की भी है और उसकी उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाओं को देख सकें। हिन्दी में कहानी-समीक्षा की शुरुआत वस्तुतः इस आंदोलन की ही देन है। इसके बाद सातवें दशक और समकालीन कहानी के रूप में कहानी के इस विकास को रेखांकित किया जा सकता है। नई कहानी के बाद आंदोलन कई हुए लेकिन सचेतन कहानी, अकहानी, जनवादी कहानी आदि के वे आंदोलन नई कहानी के रचनात्मक उत्कर्ष तक नहीं पहुँचे। आज उनका महत्त्व सिर्फ कहानी के इतिहास की दृष्टि से ही बचा रह गया है। अपनी पुस्तक हिन्दी कहानी का विकास में मैंने इसी तरह हिन्दी कहानी के विकास और प्रवृत्तियों को समझने की कोशिश की है।
समकालीन कथा समीक्षा में सक्रिय आलोचकों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि आज हिन्दी में गम्भीर समीक्षा नहीं लिखी जा रही। ज्यादातर समीक्षाएं जो समाचार पत्रों या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रों में छपती हैं, बेरोजगार का धन्धा हैं।
आपकी यह बात काफी हद तक ठीक है कि हिन्दी कहानी की सक्रियता के अनुपात में उसकी समीक्षा वैसी गंभीरता से नहीं लिखी जा रही है। लेकिन मैं कह चुका हूँ कि इसके लिए एक ओर यदि संपादक जिम्मेदार हैं, वहीं हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि पिछले दशकों में आलोचना के क्षेत्र में कितने कम लोग उभरकर आए हैं। आलोचना एक गंभीर साहित्यिक उद्यम है। वह पूरी तैयारी और समर्पण की मांग करती है। लोगों के पास अधिक रुकने और ठहरने का धैर्य नहीं है - वे तत्काल अपनी उपलब्धियों और किए गए श्रम का प्रतिफल चाहते हैं। इस दृष्टि से आलोचना उन्हें हताश करती है। चापलूसी और ठकुर सुहाती वाली आलोचना की उम्र अधिक नहीं होती। हिन्दी में प्रायोजित समीक्षकों की चर्चा इधर आम है। संपादकों और लेखकों का पूरा नेटवर्क सक्रिय देखा जा सकता है। पत्रिकाओं, प्रतिष्ठानों और संपादकों के अपने गुट हैं। समग्रता और वस्तुपरकता का आग्रह कहीं दिखाई नहीं देता। लोगों का बस चले तो वे अपने विरोधियों का नाम ही मिटा दें। बात आलोचना के जनतंत्र और विचार की तानाशाही के विरोध की जाती है जबकि सबसे बड़े तानाशाह वे लोग ही हैं। इन स्थितियों में आमतौर पर आलोचना और खासतौर पर कथालोचना के संकट को समझना अधिक मुश्किल नहीं है। पिछले दिनों जो कुछ नाम इस दिशा में उभरकर आए हैं उनमें वीरेन्द्र यादव, रविभूषण, गोपेश्वर सिंह आदि के नाम तत्काल ध्यान में आ रहे हैं। नवजागरण के संदर्भ में कर्मेन्द्र ने भी ठीक-ठिकाने का काम किया है। एक खास चीज जो ध्यान आकृष्ट करती है वह बड़ी संख्या में महिला आलोचकों की उपस्थिति है जो इससे पहले हिन्दी में कभी नहीं रही। अर्चना वर्मा, अनामिका, सुधा सिंह, रोहिणी अग्रवाल आदि अनेक नाम हैं जो इस दिशा में सक्रिय हैं और उम्मीद जगाते हैं। चाहें तो आप अपना नाम भी इनमें जोड़ सकती हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति कथा-आलोचना में नियमित और निरन्तर हस्तक्षेप न करने के बावजूद कभी-कभार बहुत अच्छी समीक्षा लिखकर सन्नाटे को तोड़ देता है। आखिरी कलाम पर आकार में छपी अरुण प्रकाश की समीक्षा एक ऐसी ही समीक्षा है।
आपकी दृष्टि में आज नई पीढ़ी में ऐसे कौन समीक्षक हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है?
अरविंद त्रिापाठी, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी - इनमें से कोई पूरी तरह कथालोचक नहीं है। पंकज चतुर्वेदी की आलोचना तो पूरी तरह काव्य-केन्द्रित है, लेकिन आलोचना में इन्होंने अपनी पहचान बनाई है और अपेक्षाएँ जगाई हैं। इनके अपने-अपने संरक्षक और गॉड-फादर हैं - जिन्हें आलोचना में उसका रोल-मॉडल भी कहा जा सकता है। कहीं न कहीं इससे उनका अपना आलोचना-व्यक्तित्व कुंठित और विकास बाधित भी होता है, इनकी आलोचनात्मक तैयारी में भी गुणात्मक अंतर हो सकता है, लेकिन फिर भी इनके विकास का अनुमान लगा पाना मुश्किल नहीं है। मुझे लगता है कि जो काम कभी देवीशंकर अवस्थी ने विवेक के रंग के माध्यम से किया था, वैसे प्रयास अभी भी किए जाने चाहिए। इसके भी पहले या फिर इसी के आस-पास यही काम बालकृष्ण राव ने विवेचना के माध्यम से किया था। हिन्दी की आरम्भिक समीक्षाओं का भी एक चयन आना चाहिए। आज प्रायोजित और साधारण समीक्षाओं के दौर में जो कुछ अच्छी, चमकदार और विश्वसनीय समीक्षायें लिखी जा रही है उन्हें अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है। ऐसा करके ही शायद और लोगों को वैसी समीक्षाएँ लिखने के लिए उत्प्रेरित किया जा सकता है।
मैं समीक्षा क्यों लिखता हूँ शीर्षक लेख जो आपकी पुस्तक हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान की पीठिका के रूप में प्रकाशित है, पुस्तक समीक्षा को गम्भीर और दायित्वपूर्ण रचनात्मक कर्म मानते हुए आपने अनुभव का साक्ष्य दिया है कि हिन्दी में आलोचना को सहने और झेल पाने के माद्दे का विकास बहुत कम हुआ है जबकि आपके शब्दों में ही उपेक्षा की मुद्रा अपनाने वाले लेखक भी अच्छी प्रशंसात्मक समीक्षा के लिए जमीन-आसमान के कुलावे मिलाते देखे जाते हैं' इस विडम्बानात्मक स्थिति पर आपकी टिप्पणी क्या है?
मैं समीक्षा क्यों लिखता हूँ? नामक जिस लेख का उल्लेख किया है वह लंबे समय तक हंस में बिना छपे पड़ा रहा। लगभग गुस्से की हालत में उसे वापस मंगवाकर मैंने साक्षात्कार में भिजवाया था। क्या छपने पर उसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई। मैंने सचमुच बेहद जुनूनी भाव से समीक्षा-कर्म किया है और आज भी उसे छोड़ा नहीं है। हिन्दी का आलोचक विकसित और स्थापित हो जाने के बाद समीक्षा-कर्म को हिकारत से देखने लगता है। हिन्दी में अश्क और अज्ञेय ने अपने बाद की पीढ़ी के युवा लेखकों पर खूब लिखा है। सामान्यतः बहुत तेजावी समीक्षा में लिखना मेरी प्रकृति नहीं है। लेकिन फिर भी अनेक अवसरों पर मेरी समीक्षाओं ने अश्क, विष्णु प्रभाकर, अमृत लाल नागर जैसे बड़े और स्थापित लेखकों को भी दुखी किया है। इस विडम्बनापूर्ण स्थिति पर मैं यही कह सकता हूँ कि यह हमारे समाज में व्याप्त ढोंग का ही एक हिस्सा है। मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू वाली यह प्रवृत्ति मैंने अनेक युवा और विकासशील लेखकों में भी देखी है। लेकिन इन्हीं के बीच प्रियवंद जैसे कुछ लेखक भी हैं। अक्षरा में अपने उपन्यास परछाई नाच पर मेरी लिखी समीक्षा पढ़कर उन्होंने बहुत कृतज्ञ भाव से मुझे पत्र लिखा और अपनी किताबों के बारे में पूछा कि मेरे पास न होने पर वे मुझे भिजवा सकते हैं। यद्यपि मेरी समीक्षा में उस उपन्यास के नकारात्मक पक्षों की चर्चा भी थी।
एक तरफ तो समीक्षा कर्म को आप महत्त्वपूर्ण मानते हैं दूसरी तरफ ठीक गोपाल राय और परमानंद श्रीवास्तव की तरह समीक्षा लिखने में, चुनाव करने में सावधानी नहीं बरतते? क्या यही कारण तो नहीं कि आप जैसे समीक्षकों की छवि पाठकों में जैसी बननी चाहिए नहीं बनी।
यह स्थिति सचमुच बहुत अंतर्विरोधी है कि एक ओर तो पुस्तक समीक्षा को घटिया, हेय और उपेक्षणीय काम समझा जाता है वहीं, प्रायः ही पुस्तक समीक्षा की स्तरीय पहचान के लिए लोग मुझे शाबासी भी देते हैं। आपकी यह बात ठीक है कि पुस्तकों के चयन के मामले में मैंने अधिक सावधानी शायद नहीं बरती है। ख़ासतौर से शुरू के दौर में। लेकिन जब ऐसा नहीं होता था तब भी मैं अपने संपादक-मित्रों प्रकाशकों या फिर स्वयं लेखक को लिखकर अपनी पसंद की किताब पर लिखे जाने को तरजीह देता था। कभी अपनी समीक्षा की रचना-प्रक्रिया पर लिखूंगा तो इस प्रसंग की चर्चा भी करूँगा। एक समीक्षक के रूप में मेरी चिंता यह भी होती है कि अपने समय की महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय पुस्तकें छूटें नहीं। मैं इसे अपने समय के रचनात्मक प्रवाह के बीच होना और बने रहना कहता रहा हूँ। लेकिन चुनाव में अधिक सतर्क न रहने के अपने खतरे तो हैं ही। एक ओर इसके लिए यदि मेरी प्रशंसा की जाती है कि अपने समकालीन आलोचकों में मेरे यहाँ अपेक्षाकृत लेखकों और पुस्तकों की एक बड़ी और व्यापक दुनिया मिलती है तो वहीं शायद जैसा कि आप कहती हैं, पाठकों में एक समीक्षक के रूप में मेरी वैसी छवि नहीं बन पाती जैसी बननी चाहिए। लेकिन मैं दूर तक इससे सहमत हो पाने की स्थिति में नहीं हूँ। ढेरों लेखकों और पाठकों के पत्र मुझे मिलते हैं। प्रायोजित समीक्षकों के इस दौर में ईमानदारी, वस्तुपरकता और विश्वसनीयता से मुझे जोड़कर देखा जाता है। इससे संतोष मिलना स्वाभाविक है। महत्त्वपूर्ण शायद यह भी है कि मैंने लिखा क्या है। प्रायोजित और अतिरेकपूर्ण समीक्षा मैंने नहीं लिखी। संपादकों की ऐंठ और अकड़ मुझसे नहीं बर्दाश्त होती। पिछले आठ-दस वर्षों से पुस्तकों पर अपने को केन्द्रित करने का यह भी यह बड़ा कारण है। इससे समीक्षा कर्म अपने आप खत्म हो जाता है। फिर भी कसौटी समय माजरा, कथाक्रम, वागर्थ, तद्भव, साक्षात्कार, समीक्षा, अकम्‌ आदि में मैं नई किताबों पर विस्तार से लिखता रहा हूँ। ये समीक्षायें चयन के संबंध में मेरी सतर्कता का संकेत भी देती हैं।

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