शुक्रवार, 16 मई 2008

अभी तो हम सब कोशां है : नासिरा शर्मा

डॉ० फ़ीरोज अहमद
आपकी साहित्य साधना कब और कैसे आरम्भ हुई और उसके लिए प्रेरणा आपको कहाँ से मिली।
घर में लिखने पढ़ने का माहौल था। उससे कहाँ बचा जा सकता था। स्कूल में भी कहानी प्रतियोगिता आयोजित होती दोनों जगह रचनात्मक माहौल सृजन की दुनिया को लगातार अंकुर फोड़ने की प्रतिक्रिया में रखते जिसके कारण लेखन एक सहज प्रक्रिया के रूप में जीवन का हिस्सा बनती चली गयी।
सृजन से पूर्व, सृजन के समय और सृजन के पश्चात्‌ आपकी मनःस्थिति क्या होती है?
लिखने से पहले एक बेचैनी, कभी-कभी उदासी, अक्सर ख़ामोशी की कैफियत बनती है। लिखते समय जज्बात और ख्यालात का हुजूम उत्तेजना भरता है। तब कोई शोर या आवाज किसी तरह का खलल कभी मूड खराब करता है तो कभी तेज गुस्सा दिलाता है। उसका कारण भी है कि आपके हाथ से दरअसल भाषा का तारतम फिसल जाता है। जो बहाव सहज रूप से निकलता है वह फिर बनावट से पूरा होता है जो मुझे ठीक नहीं लगता मगर हमेशा ऐसा नहीं होता जब कहानी गिरफ्त में हो तो बाक़ी चीजें बेकार सी लगती हैं। क़यामत भी आकर गुजर जाये तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। लिखने के बाद एक अजीब-सी खुशी, इत्तमिनान-सा महसूस होता है मगर इस अहसास से मैं कोसों दूर रहती हूँ कि मैंने कोई शहकार रचा है क्योंकि कहानी मुकम्मल हो जाने के बाद भी, अभिव्यक्ति और किरदार की सहजता को लेकर मैं काफी सोचती और शब्दों को अक्सर बदलती रहती हूँ। जब हर तरफ से मुतमईन हो जाती हूँ तभी छपने भेजती हूँ।
साहित्य को आप किन शब्दों में परिभाषित करेंगी।
इन्सान बने रहने की कोशिश और इन्सान बने रहने के लिए दूसरों को उस कोशिश में शामिल करना।
इतनी लम्बी साहित्य साधना में क्या कभी आपका जी ऊबा है? यदि हाँ तो क्या कारण रहे हैं?
बीच-बीच में काफी फुजूल के काम करती हूँ। इसलिए हमेशा ताजगी का अहसास बना रहता है। लेखन और लेखक का भारी लबादा पहनना और उसे तकलीफ के साथ घसीटते जाना मेरी फितरत नहीं है।
अवाम के सन्दर्भ में साहित्य की भूमिका को आप किस प्रकार देखती हैं।
कहानियों में अवाम का दखल दरअसल एक महत्त्वपूर्ण गारा है जिससे आप कहानी बनाते हैं। मगर अफसोस जिस अवाम के लिए हम लिखते हैं ज्यादातर वे लोग साहित्य नहीं पढ़ पाते हैं। पहला कारण शिक्षित न होना, दूसरा मेहनत मजदूरी और सर छिपाने की जद्दोजहद के बाद उनके पास थककर सोने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। हम खुद ही लिखते हैं और खुद ही पढ़ते हैं जो शिक्षित है जिन्हें साहित्य से लगाव है उन तक पुस्तकें उस तरह सुलभ नहीं है जैसी होनी चाहिए। साहित्य की कोई कृति न सामूहिक रूप से समाज की धारा बदल पाई न समाज की कुरीतियों की जड़ से उखाड़ पाई न पुराने कानूनों में संशोधन करा पाई मगर हाँ, व्यक्तिगत रूप से कुछ व्यक्तियों को, बिखरे रूप से, जरूर बदल पाई मगर वास्तविकता तो यह है कि क्या अकेला चना भाड़ भूंज सकता है? कहने का अर्थ साफ है कि समाजिक जकड़न और जड़ सोच वाले कुनबे में जो व्यक्ति बदला, वह पूरे परिवार को नहीं बदल पाया मगर उसे घर निकाला जरूर मिला तो भी अपवाद की कमी नहीं है। यह अपवाद कब सामूहिक फोर्स में बदलेंगे और अवाम और साहित्यकार में कब संवाद स्थापित होगा कहा नहीं जा सकता है। अभी तो हम सब कोशाँ हैं।
क्या साहित्योपजीवी होकर जिया जा सकता है।
नहीं।
बाल-साहित्य के रूप में आपने साहित्य का विपुल मात्रा में सृजन किया है। हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य में उसकी स्थिति और भूमिका पर आपका दृष्टिकोण क्या है?
बच्चों के लिए मैंने बचपन से लिखा। लगातार लिखा मगर उस लेखन का उस तरह नोटिस नहीं लिया गया जिसको राष्ट्र के स्तर पर पहचान का नाम दिया जा सकता है क्योंकि हिन्दी की दुनिया में बाल-साहित्य का कोई अहम्‌ रोल नजर नहीं आता है जबकि उसके लिखने वालों की संख्या काफी है और वे जो केवल बाल-रचनाओं के साहित्यकार हैं उनको भी वह सम्मान और पहचान किसी मंच पर जैसी विदेशों के रचनाकारों को मिली हुई है नहीं प्राप्त है। जबकि बहुत कुछ बाल-भवन, नेशनल बुक ट्रस्ट के द्वारा होता रहता है मगर वह सब कुछ मुख्यधारा जैसा नजर नहीं आता है न इनकी चर्चा खास व आम में बराबर से होती है। बाल पत्रिकाएँ भी हैं। बाल-साहित्य पुरस्कार भी हैं। मगर जिस तरह उर्दू में अब्बू खाँ की बकरी को साहित्यिक कृति होने का तमग़ा मिला हुआ है या हर बड़े लिखने वाले ने बच्चों के लिए भी लिखा है वैसा रिवाज हिन्दी में देखने को नहीं मिलता है भले ही अन्य भारतीय भाषाओं में हो। हम भूल जाते हैं कि लेखक इन्सानी अहसास को अपने कलम से काग़ज पर उतारता है न कि खानाबन्दी किये इन्सानों में से किसी को उठाता है। गरीब-अमीर, अफसर-नौकर, मर्द-औरत, बूढ़े-बच्चे सब मिल कर परिवार में रहते हैं और समाज की संरचना करते हैं, मगर जब साहित्यकार कलम उठाता है तो उसकी रचना से अक्सर बाल पात्र गायब रहते हैं आखिर क्यों? क्या स्वयं उसका बचपन उसका पीछा कभी छोड़ता है? (कृष्ण बलदेव वेद के उपन्यास उसका बचपन याद आ गया) कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि हम अपने तक सीमित न रहें वैसे भी बच्चों के लिए लिखना आसान काम नहीं है। जबरदस्ती लिखवाना भी नहीं चाहिए मगर जो लिखते हैं उनको आदर व सम्मान मिलना चाहिए और हमारी मानसिकता में यह बात दाखिल हो जानी चाहिए कि बच्चों का एक बड़ा संसार है जिसमें जिज्ञासा, मासूमियत, भय, खुशी, चीजों को देखने और महसूस करने का बिल्कुल अलग अनुभव है जिसको समेटने का अर्थ है कि हम अपनी रचनाओं में केवल नई पीढ़ी को जगह नहीं दे रहे है बल्कि अपने कलम और अपनी सोच को निरन्तर शादाबी बख्श रहे हैं।
साधारणतया कहानी की एक परिभाषा दी जाती है कि कहानी घटना या घटनाओं का सुसंयोजित रूप है। आज की कहानी इस दृष्टि से काफी भिन्न नजर आती है। तो क्या इसको कहानी नहीं मानना चाहिए। आप अपनी राय बताइये।
घटनाएँ यदि कहानियाँ हैं तो फिर रिपोर्टिंग क्या हैं। पत्रकारिता और साहित्यिक लेखन का बुनियादी फर्क़ यह है कि एक में सूचना होती है और दूसरे में अहसास। रपट की सीमा जहाँ समाप्त होती है कहानी वहाँ से शुरू होती है। कहानी इन्सान के अन्दर की दुनिया को खोलती है बाहर के ब्योरे गैरजरूरी तौर से नहीं देती है। कहानी मेरी नजर में वह है जो घटनाओं का उल्लेख न करके उस घटना के प्रभाव का वर्णन करे जो इन्सान पर बीती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह लेखन रिर्पोताज भी हो सकता है और लेख भी कहला सकता है।
साहित्य लेखन में महिलाओं की क्या स्थिति है और उसका मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है?
हिन्दी साहित्य में महिलाओं का हमेशा से योगदान रहा है मगर हाँ, अब संख्या काफी बढ़ गई है। विभिन्न तरह के मुद्दों को लेकर उनकी कलम मुखर हुई है। यदि आप सवाल सम्पूर्ण औरत की स्थिति पर करते तो अच्छा होता है। अभी तक सही तरीके से हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन नहीं हो पाया तब उस लेखन के लिए क्या कहूं जो ग़ैरजरूरी तरीक़े से मुख्य धारा से अलग हो अपनी पहचान बनाने के संघर्ष में रत है।
विभिन्न साहित्यिक विमर्शों के सन्दर्भ में आपकी क्या मान्यता है। इसकी प्रासंगिकता के सन्दर्भ में आप क्या लिखती हैं।
बुनियादी तौर पर मैं साहित्य में खानाबन्दी की क़ायल नहीं हूँ। हम एक समाज में रहते हैं। समाज के बाँटे जाने पर एतराज करते हैं मगर वही काम हम अपने-अपने कार्य क्षेत्र में करने से बाज नहीं आते हैं। कुछ जुल्म हमारे यहाँ हुए हैं। उनका सिलसिला आज भी अफसोसनाक तरीके से जारी है मगर उसको इस तरह से खत्म करने की दलीलें कि विमर्श व आरक्षण देकर खत्म किया जाय न न्यायसंगत लगती है न तर्कसंगत लगती है। यही कारण है कि हम बहुत सारे मुद्दों से जूझने के बावजूद कहीं पहुंचे नहीं हैं।
कुछ लोगों का मत है कि आज की कहानी पाठकों से कट गई है। लेखक लेखकों से प्रशंसा प्राप्त करने के लिए लिखता है। क्या यह सही है?
इसमें कोई शक नहीं है कि आज पाठकों के वैसे खत नहीं मिलते हैं जैसे कि बीस वर्ष पहले मिलते थे। जिसमें कहानी पर जमकर बात होती थी। कहीं पर कुछ घटा तो है जो संवाद की स्थिति नहीं बन पाती है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमने कुछ जगहों पर बेजा हस्तक्षेप कर उनको पीछे धकेल दिया है जिनकी राय और प्यार की हमें जरूरत होनी चाहिए। शायद इसी के चलते पाठकों में पुस्तक खरीदने की संख्या भी घटी है। पहले दाम ज्यादा फिर उपलब्ध नहीं। खरीद्दारी लाइब्रेरी या अन्य संस्थाओं में बल्क के रूप में होती है तो वहाँ पाठक नहीं। बात केवल लेखक, प्रकाशक, पाठक के बीच तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीति का तंग दायरा और गैर जरूरी मुद्दों पर फोकस भी इस दुर्दशा में शामिल हैं।
हिन्दी कहानी साहित्य का भविष्य कैसा है?
हिन्दी में कहानियाँ लिखी जा रही हैं। बेहतर भी और खूबसूरत भी। जैसे-मधुसूदन आनन्द की जर्राह मेराज अहमद की अमरूद और हरी पत्तियाँ हसन जमाल की जमील मुहम्मद की बीवी', अब्दुल बिस्मिल्लाह की कागज के कारतूस', चित्रा मुद्गल की मिट्टी, रवीन्द्र कालिया की सुन्दरी बहुत देर तक याद रह जाने वाली कहानियाँ हैं। मगर परेशानी यह है कि हमारे कलम पर कुछ नाम चढ़ गये हैं। हम लगातार उसे दोहराते रहते हैं। कहानियों के नए नामों के लिए जगहें तंग हैं या फिर हम पढ़ते ही नहीं हैं क्योंकि भीड़ बहुत है। पत्रिकाएँ फिलहाल बहुत हैं। खेमे अंसख्य है। पैमाना तय नहीं, कसौटी का कोई प्रमाणिक मंच नहीं। अपनी ठफली अपना राग है। मगर यह समय निकल जायेगा। भुला दिए जाने के बाद भी बेहतर चीजें सामने आयेंगी। ऐसा हो रहा है। धूल, धुआँ, शोर, परिदृश्य को वक्ती तौर से धुंधला बना सकते हैं मगर कब तक?

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मैं कहता आँखिन देखी... : काशीनाथ सिंह

प्रो. रामकली सराफ
आपका ग्रामीण जीवन से गहरा सरोकार रहा है, आपके कहानी लेखन में इसकी क्या भूमिका रही है?
ऐसा है कि मैं गाँव में पैदा हुआ, वहीं पला बढ़ा, खेला-कूदा, खेती में भी साथ देता रहा। कटाई हो, दँवरी हो ये सब कुछ मैंने किया। हाईस्कूल तक गाँव में पढ़ा। उसके बाद इंटरमीडिएट में मैं शहर आया और फिर शहर में ही सारी पढ़ाई लिखायी हुई और वो भी बनारस में। लिखना तो शुरू कर दिया था बी.ए. में मामूली कविताएँ लिखता था जिसका कोई मतलब नहीं था। सन्‌ १९६० ई. के आसपास विधिवत्‌ लिखना शुरू किया।
कविता जब आप लिख रहे थे शुरू में, तो अचानक ये कैसे मोड़ आ गया कि कहानी लिखने लगे?
इसलिए कि मेरे भाई साहब (डॉ. नामवर सिंह) स्तम्भ लिख रहे थे कहानी पत्रिका के लिए और ज्यादातर घर में कहानियों पर बात होती थी। तो कहानी पत्रिका की कहानियों को पढ़ता था और उन कहानियों को पढ़ता था जिनकी तारीफ करते थे भाई साहब। खासतौर से रूसी कहानियाँ, हेमिंग्वे की कहानियाँ, मंटो की कहानियाँ तो इन्हें पढ़ता था तो कहानी की तरफ धीरे-धीरे मुड़ने लगा और कहानी लिखना शुरू किया सन्‌ ६० के बाद से। तो जो पात्र हमारे आते थे, जो जीवन होता था वो गाँव का ही होता था। धीरे-धीरे मुझे लगा कि मैं उस आदमी के बारे में लिख रहा हूँ जो गाँव को छोड़ चुका है, लेकिन शहर में रहते हुए शहर का नहीं हो पा रहा है। सन्‌ ६० के आस-पास की स्थितियाँ ऐसी ही थीं भी। मेरी शुरुआत की कहानियों में इस तरह का एक आदमी था।
नयी कहानी का दौर और उसके समाप्ति पर आपने लिखना शुरू किया। लेकिन उस प्रभाव से जो अपने को अलग किया लेकिन मुख्य बात यह है कि उस पूरे प्रभाव से स्वयं को बचाते हुए कैसे इतना बड़ा परिवर्तन आपके लेखन में आया? क्या बदली हुई परिस्थितियाँ ही थीं इसके मूल में?
देखिए, लगभग ऐसा समय तो शीतयुद्ध का था, कांग्रेसी हुकूमत थी। जनता का मोहभंग हो गया था... ढेर सारी योजनाएँ चालू की गयी थीं और योजनाएँ या तो अधूरी थीं या जैसे बाँध बन रहा था, बने बाँध लेकिन बारिश हो तो बाँध बह जाय। सड़कें टूट जाएं, विकास जैसे होना चाहिए था वैसे नहीं हो रहा था। तो लग रहा था कि यह सत्ता इस लोकतंत्र में जनता के लिए जो काम कर रही है वह काम संतोषजनक नहीं है और इस पर मुहर लगाने का काम किया जनता ने। पूरी तरह से भारत प्रभावित हुआ था। इस परिवर्तन ने हमारी भाषा को भी प्रभावित किया और हमारे कंटेंट को भी।
आपकी कहानियों में तो है ही लेकिन आज जो कथा रिपोर्ताज लिख रहे हैं संतो घर में झगड़ा भारी पांडे कौन कुमति तोहे लागि... आदि में जो गँवईमन झाँक रहा है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
बुनियादी निर्माण तो हमारे गँवई मन का ही है, इसलिए वह भाषा वो मुहावरे, वो लोकोक्तियाँ, वो मन, वो संस्कार कहीं-न-कहीं हमारी रचनाओं पर आज भी प्रभाव जमाए हुए हैं।
आपकी पहचान आज के कथा साहित्य में एक खास किस्म की बन चुकी है। कथा भाषा को लेकर तथा कथा स्थल को लेकर (अस्सी लंका के संदर्भ में) एक बात बताना चाहेंगे कि क्या ये स्थल एक ऐसे रूपक के समान तो नहीं हैं जहाँ से हम पूरे वैश्विक परिस्थिति और परिवेश को देख सकते हैं? (संदर्भ-संतों घर में झगड़ा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागि, कौन ठगवा लूटल नगरिया हो)
ये अच्छी बात की है आपने। दरअसल मैं कहानी से संस्मरण की तरफ आया और संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की ओर। इसमें एक संगत रही है। मेरे दिमाग में था कि जब व्यक्ति पर संस्मरण हो सकता है तो स्थल पर क्यों नहीं? व्यक्ति पर जिस तरह लिखा जा सकता है उस तरह से उस स्थल पर भी लिखा जा सकता है। जहाँ मैं रहा था। २०-२५ वर्षों तक उस स्थल को देखा। एक तरह से देखा जाय तो जैसे मेरा सम्पर्क बना था विश्वविद्यालय से पहले वैसे ही अस्सी से सम्पर्क बना रहा। रोज-ब-रोज आना-जाना रहता था। अस्सी को बदलते हुए देख रहा था, लोग बदल रहे थे। ९० के बाद मैंने कथा रिपोर्ताज लिखने की शुरुआत की। पहला रिपोर्ताज सन्‌ १९९१ में देख तमाशा लकड़ी का (हंस में) अस्सी पर था। अस्सी बदल रहा था, कारण चाहे भूमंडलीकरण रहा हो या और...। विदेशी आ रहे थे घाट के किनारे के मकान लॉज बनने शुरू हो रहे थे, वे हमारे बीच रह रहे थे, हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे थे, इसमें महिलाएँ भी थीं और पुरुष भी थे। देखिए, कहने को तो यह मुहल्ला है लेकिन रिफ्लेक्ट कर रहा है पूरे देश को। विदेशियों में आस्ट्रेलिया, नाइजेरिया, हंगरी से थे जो अपनी संस्कृति के साथ हमारे बीच में थे। इस वजह से हम सांस्कृतिक धरातल पर एक दूसरे से मिल रहे थे। मुझे लग रहा था कि वस्तुतः यह है एक मुहल्ला, लेकिन है नहीं मुहल्ला, यह है पूरा देश। अमेरिका पर टिप्पणियाँ हैं।
कैथरीना महिला जो बनारस पर शोध कर रही है, बनारस के प्रति क्या धारणा है? वह व्यक्त करती है। उसकी प्रतिक्रिया होती है लोगों में। भूमंडलीकरण के दौरान अस्सी सूचक है देशी-विदेशी परिप्रेक्ष्य में। बड़ा फलक है। अस्सी को एक मुहल्ला मानकर न देखा जाय।
बनारस को मिनी भारत कहा जाता है। तमिल, कन्नड़, बंगाली, असमिया, सिंधी, ईसाई सभी रहते हैं। यह मिनी भारत है। इस कारण यह संभव हो सकता है कि विदेशियों और भारत के सांस्कृतिक टकराव के लिए चुना और देखा.
डॉ. साहब आपके रचना स्थल और पात्र बिल्कुल निश्चित हैं तथा जीवित हैं, क्या आपको उनकी आलोचना का शिकार नहीं होना पड़ता है? क्या रचनाकार के लिए यह कम चुनौतीपूर्ण कार्य है कि हम उसी समय की कहानी उसी समाज के लोगों के बीच रहकर उन्हें खड़ा करके कहते हैं? यों कहें कि आप हिन्दी कथा साहित्य में कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपणाँ चले हमारे साथ की चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं और दे भी रहे हैं। इसमें आपको कैसा अनुभव होता है? क्योंकि दौर तो घर बनाने का है और बचाने का है और इसमें आपकी कहानियाँ घर जलाकर साथ आने की बात करती है?
जी, साहस किया था उसे लेकर...। प्रेमचंद ने अपनी कहानी में (मोटेराम शास्त्री) एक ब्राह्मण को खड़ा किया था नाम बदलकर। उन पर मुकदमा भी हुआ। तो ऐसे में जीवित पात्रों को लेकर रचनाओं में सीधे-सीधे इस्तेमाल... (विस्मय) मेरी जानकारी में हिन्दी के किसी लेखक ने मेरे पहले ऐसा नहीं किया है सीधे-सीधे जीवित पात्रों को लेकर। हाँ,... डर तो था ही, गालियाँ मिली, धमकियाँ मिली, मारने तक की बात आयी। ऐसा मेरे किसी खास रचना के साथ नहीं हुआ बल्कि चाहे संतो-असंतो घोंघा बसंतो हो, देख तमाशा लकड़ी का हो, संतो घर में झगड़ा भारी हो... सभी के साथ हुआ। मुश्किल तो बहुत था। जिस रिपोर्ताज में पप्पू का जिक्र है उस पप्पू पर संस्कृत पढ़ने वाले बच्चों ने पत्थर मारा था।
कर्फ्यू लगा हुआ था, कारण दूसरा था लेकिन... धीरे-धीरे फिर पात्रों को ऐसा लगा, अहसास हुआ कि वे इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि लोग देखने आ रहे हैं तो महत्त्व के कारण सम्मान दे रहे हैं। कौन है जया सिंह, दीनबंधु तिवारी कौन है? तो कौन है पप्पू चाय दुकानवाला? तो जैसे उन्हें महत्त्व का ज्ञान हुआ अब गाली के बदले सम्मान मिलने लगा।
कथा भाषा को लेकर सवाल खड़े किए गए, श्लीलता-अश्लीलता का आरोप लगा, आपको विरोध झेलना पड़ा?
कथा भाषा को लेकर उन पात्रों की तरफ से कोई विरोध नहीं था, क्योंकि मैंने उन्हीं शब्दों को उन्हीं बातों में रखा था जिसे उन्होंने कहा था। बातों में सच्चाई थी इसलिए उन्हें इनका विरोध नहीं था। विरोध तो साहित्यिक रुचि के पाठकों को लगा, विरोध लेखकों का था उन पाठकों का था जो यह मानते हैं कि साहित्य बहुत अभिजात्य था। विरोध उनका था जो साहित्य को शराफत भरा मानते थे।
हाँ,... मैं पाठकीय प्रतिक्रियाओं के सन्दर्भ में पूछ रही थी।
सड़क के पाठकों के साथ ऐसा नहीं था उन्हें तो लग रहा था कि इसमें उनकी जिन्दगी बोल रही है।
एक बात खास यह लगती है कि दलित लेखन की भाषा पर भी अश्लीलता का आरोप लगा लेकिन वे अपने बचाव के लिए आपके पास क्यों नहीं लौटते हैं? क्यों नहीं कहते कि सवर्ण लेखकों ने भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया?
दलित लेखन एक आन्दोलन की तरह था - इनके पहले मैंने लिखा है, लेकिन दलित लेखन की भाषा पर हमसे कोई खास बात...। उन्होंने काफी बाद में शुरू किया लेकिन उनकी ओर से कोई तालमेल नहीं कोई सफाई नहीं...।
इधर बीच आपकी कहानियों में एक चीज देखने को मिल रही है लगभग कहानियों के शीर्षक कबीर के पदों की पंक्तियाँ हैं - इसके पीछे आपकी क्या चिन्तन पद्धति है? मुझे लगता है कि आपकी रचनाओं में पैठी साहसिकता है, जो बार-बार आपको उधर ले जाती है?
ये मेरी चिन्तन पद्धति नहीं है बनारस की एक परम्परा रही है जो बड़ी शालीन है। वह लोक परम्परा है जबकि दूसरी ओर तुलसी ब्राह्मणवादी परम्परा के प्रतिनिधि कवि हैं और कबीर उनके ठीक उलटे छोटी जातियों के कवि हैं। सम्प्रदाय विरोधी और साहस का काम करने वाले कवि हैं। शीर्षक चुनने के लिए कबीर से बल मिलता रहा है, इसलिए मैं कबीर की ओर लौटता हूँ। आँखिन देखी बात कबीर कहते हैं और मैं भी आँखिन देखी ही कहा करता था।
आप डॉ. धर्मवीर के बारे में क्या कहेंगे जो धर्मवीर कबीर पर और कबीर के आलोचकों पर प्रहार कर रहे हैं?
धर्मवीर कबीर पर ही नहीं प्रेमचंद पर भी (सामंत का मुंशी) प्रहार करते हैं। मैंने पढ़ा नहीं उसे। धर्मवीर को अब उतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, वे अनर्थ कर रहे हैं। चीजों को गलत इंटरप्रेट कर रहे हैं। सचमुच धर्मवीर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं।
ऐसा लगता है कि प्रेमचंद से आप ज्यादा प्रभावित नहीं हो पाए। ऐसा क्यों?
नयी कहानी प्रेमचंद की खिलाफत का आन्दोलन था। नये कहानीकार प्रेमचंद की कहानियों को पुरानी कहानी कहने लगे। कफन, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ में आधुनिक तत्त्व की तलाश की जाने लगी। नयी कहानी के तत्त्व भी तलाशे जाने लगे। विरोध के नाम पर प्रेमचंद की प्रासंगिकता शुरू हो गयी थी।
अपने समय में अपने समकालीनों के बीच मैंने ही सबसे ज्यादा प्रेमचंद की चर्चा की। प्रेमचंद ने शक्ति दी, प्रेमचंद ने बड़ा साहस प्रदान किया। वो कौन-सी चीज है जिसने प्रेमचंद को प्रेमचंद बनाया? देखिए, कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढ़ने और पढ़ाने की नहीं। श्रवणीयता बुनियादी चीज है। इसको मैंने समझा और ये हमारे लेखन में भी है। मेरे सभी कथा रिपोर्ताजों में मिलेगी। हमारे यहाँ भी श्रवणीयता बुनियादी चीज है।
महाकवि तुलसीदास में भी तो श्रवणीयता है वे केवल सनातनी और ब्राह्मणवादी ही नहीं थे। तो क्या भविष्य में तुलसीदास पर लिखने के लिए सोचा है आपने?
जी, नाटक लिखने की सोच रहा हूँ दस पन्द्रह वर्षों से। खासतौर से तुलसीदास जब अंतिम दिनों में बाहुशूल से पीड़ित हैं कोई देखने वाला नहीं है। तुलसीदास के उपेक्षित दिनों पर। जिस तरह से इस ब्राह्मण मुहल्ले ने उपेक्षित किया है उन्हें। वैसे इन विषयों पर लिखना इतिहास की ओर लौटना होगा और इतिहास की ओर लौटना एक तरह से भागना होता है। हमें वर्तमान पर लिखना चाहिए। वैसे जो भी नाटक आए जैसे- आषाढ़ का एक दिन हो अंधायुग हो कबिरा खड़ा बाजार में' हो सभी इतिहासाश्रित नाटक हैं। जबकि ऐसा मैं नहीं सोचता इसलिए हम वहाँ आश्रय नहीं चाहते हैं। इसलिए तुलसीदास पर मैंने नहीं लिखा।
संचारतंत्र और मीडिया, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद पर आप लगातार हमले कर रहे हैं। सच ही यह समय का यथार्थ है और यथार्थ की अभिव्यक्ति है लेकिन प्रारंभिक दौर में आपने जिस तरह काम किया है स्त्री-विमर्श पर। कहनी : उपखान में संग्रहित अनेक कहानियाँ इसकी गवाह हैं। अब जब पूरा दौर स्त्री-विमर्श को लेकर सक्रिय है आप मौन क्यों हैं? जबकि सातवें दशक में बड़े बेबाक तरीके से अभिव्यक्त कर रहे थे?
स्त्री-विमर्श पर बातें खूब हो रही हैं, बहसें हो रही हैं, राजेन्द्र यादव के अनुसार दलित और स्त्री एक हैं। स्त्रियों का शोषण दलित भी अपने घरों में करते हैं। पुरुष वर्चस्व सभी जगह है। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि वह लेखन ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है, न स्त्रियों द्वारा और न पुरुषों द्वारा। खुद स्त्रीविमर्श पर बात करने वाले लोग अपनी बेटियों और पत्नियों पर दोहरे मानदंड अपनाते हैं, यह सोचने का विषय है।
लेकिन डॉ. साहब यहाँ हावी तो पुंसवादी दृष्टि ही रही है।
हाँ-हाँ, आप ठीक कह रही हैं।
डॉ. साहब, मार्क्सवाद के बारे में बताएँ? पहले आप इस जीवन दर्शन से प्रभावित रहे लेकिन अब ऐसा नहीं लगता कि आप उससे कुछ अलग हटे हैं। इसमें एक और बात कि स्त्री और दलित लेखन में मार्क्सवाद की भूमिका कितनी बनती है?
देखिए, मार्क्सवादी दृष्टि से हम अलग नहीं हैं। अब हम लोकतांत्रिाक हो गए हैं। मार्क्सवाद को हम व्यवहार में लाए और वही हमारे विचार में भी बदलाव लाया। अब मार्क्सवादी कट्टरता नहीं रही है हमारे भीतर। स्त्री, दलित मुद्दे पर मार्क्सवादी दृष्टि हमें बल देती है। दलित जीवन में वर्ण के साथ वर्गान्तरण हो रहा है और दलित लेखक आत्मबद्ध हो रहे हैं। वर्ण एक सामाजिक सच्चाई है लेकिन वर्ग को दरकिनार करके नहीं देखना चाहिए। अम्बेडकर और मार्क्सवाद दोनों मिलकर दलित लेखन को ताकत प्रदान करते हैं।
हाँ, यह तो सही है लेकिन डॉ. साहब आपने भी जाति केन्द्रित कहानियाँ लिखीं हैं, जिसमें जातीय समस्याओं को लेकर गंभीर विमर्श किया गया है, फिर भी इन कहानियों ने दलित लेखकों का ध्यान आकर्षित नहीं किया?
हाँ, जाति केन्द्रित कहानियाँ हैं चोट, सराय मोहन... जाति को ध्यान में रखकर ७१ में चोट लिखी जो आधार पत्रिका में प्रकाशित हुई। वे तीन घर कहानी सराय मोहन की' उन्हें दलित विमर्श की कहानी नहीं कह सकता, क्योंकि दलित विमर्श तब तक आया ही नहीं था। इसमें सवर्ण दृष्टि... यह लेखक की गलती है। चोट कहानी में दलित अन्तर्विरोध भी है - तीन घरों के बारे में टिप्पणी है इसमें। दलित स्त्रीहै अपने कामरेड मित्र से कहती है कि उन दलित घरों पर ध्यान मत दीजिए। कहानी सराय मोहन' में ठाकुर, ब्राह्मण, हरिजन हैं। हरिजन रोटियाँ बना रहा है और उसकी रोटियाँ सब खा जाते हैं। भूख के सामने जाति का कोई मतलब नहीं रह जाता। लेकिन जैसे ही पता चलता है कि वह दलित है ब्राह्मण तो पचा जाता है और ठाकुर कै कर देता है और उसकी लुटिया भी चुराकर पंडित जी चल देते हैं। जैसे वे तीन घर दलितों के भीतर के अंतर्विरोध को व्यक्त करती हुई कहानी है वैसे ही कहानी सराय मोहन में ब्राह्मण के प्रति उपहास का भाव है दलित का प्रतिकार है। पर कहानीकार ने स्वयं बताया कि ये दलित विमर्श की कहानियाँ नहीं हैं।
भले ही आप कहें, लेकिन दलितों ने उसकी नोटिस क्यों नहीं ली जबकि दलित टोन तो है?
कोई बात नहीं... उधर ध्यान जाना चाहिए था।
ठाकुर का कुआँ, सद्गति, कफन इस पर क्या कहेंगे? जबकि ये भी तो दलित विमर्श से पहले की कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ बराबर उनके घेरे में हैं क्यों?
सारनाथ वाली गोष्ठी में मैंने कहा था प्रेमचंद बरगद हैं और हम लोग बरोह हैं, जो उसी की डाल से हम लोग निकले हुए हैं जिसकी जड़े जमीन में हो जाती हैं। प्रेमचंद आज भी अद्वितीय हैं। उनके सामने जातियाँ नहीं थी, पूरा देश था। जाति या दलित उसी स्वाधीनता आन्दोलन के अंग हैं।
आज के दलित लेखन को किस रूप में आप देखते हैं?
प्रेमचंद की दृष्टि गाँधीवादी थी और आज के दलित लेखन की दृष्टि अम्बेडकरवादी है। सुमनाक्षर ने रंगभूमि जलायी। जबकि ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल पाल चौहान की सहमति है प्रेमचंद से। हाँ, असहमति है तो इसलिए कि प्रेमचंद लेखक हैं दलित नहीं। दलितों की पीड़ा केवल दलित ही लिख सकते हैं, जबकि साहित्य में ऐसा कोई अंकुश नहीं है। वे मानते हैं कि दलितों की समस्या पर अम्बेडकरवादी दृष्टि से विचार करें। लेकिन यदि कोई सवर्ण भी अम्बेडकरवादी दृष्टि से लिखे तो भी वे ऐसा नहीं मानेंगे। इसके लिए वे दलित होना आवश्यक मानते हैं। यह नजरिया एकांगी है।
आपने महत्त्वपूर्ण दलित लेखक सूरजपाल चौहान की संतप्त की भूमिका लिखी है। दो पृष्ठ की भूमिका पाठक को बाध्य कर देती है कृति से होकर गुजरने के लिए। डॉ. साहब एक बात बताना चाहेंगे कि सूरजपाल ने दलित पीड़ा को न सिर्फ बाहरी संघर्ष को अभिव्यक्त किया है अपितु दलित समाज के भीतर की संरचना को एकांकित किया है? दूसरे शब्दों में दलित अंतर्विरोधों का खुलासा किया है उन्होंने इस कृति में। हम देख भी रहे हैं। आज यह स्थिति दलित लेखन में तेजी से घर कर रही है। दो हिस्सों में बँटा दलित लेखन कहीं अपने उत्स तक पहुँचने के पहले चूक तो नहीं रहा है?
मैं ऐसा नहीं मानता। कहानियाँ उतनी अच्छी नहीं लगीं आत्मकथा के बनिस्बत। आत्मकथाएँ मुझे बेहद पसंद हैं। अंतर्विरोध आन्दोलन को अंततः मजबूत करता है। यह एक डेमोक्रेटिक प्रोसेस' है। इससे आन्दोलन मजबूत होगा। मैं देखता हूँ प्रगतिशील आन्दोलन को, शिवदान सिंह चौहान, रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द गुप्त, अमृत राय, यशपाल एक ही आन्दोलन में थे। लेकिन इनके विचार विरोधी थे और आन्दोलन प्रभावित हुआ, प्रगतिशील लेखन खत्म हुआ। दलित आन्दोलन का भी ऐसा हो सकता है। लेकिन विचारधाराओं में टकराव से जो स्थिति आएगी उसमें से लेखन की एक उर्वर भूमि बनेगी। विघटन के बीच से जो चीज आएगी उसमें एक ताजगी एक नयी ऊर्जा मिलेगी।
हाँ, यह भी एक संभावना बनती है। लेकिन क्या दलित लेखन में खासतौर पर आत्मकथाएँ एक रस नहीं हो रही हैं?
हाँ-हाँ, जो आन्दोलन हुआ था अफ्रीका में ब्लैक लिटरेचर का वह थम गया। आज दलित आन्दोलन की आवाज भी मद्धिम हो रही है। कंट्राडिक्शन का आना शुभ है यहाँ से ऊर्जा मिलेगी। दूसरी बात सभी एक ही दिशा में सोचेंगे-लिखेंगे तो आन्दोलन का क्या होगा?
फिर भी डॉ. साहब आन्दोलन की धार मद्धिम पड़ी है?
हाँ, ऐसा हो रहा है।
दलित लेखन में स्त्रीलेखन की कमी आपको परेशान करती है? मान लीजिए कि विमला चौहान भी अपने सच को लिखें तो कहीं सच का दूसरा रूप तो उभरकर सामने नहीं आयेगा? क्योंकि शुरू से ही सब कुछ का बहुत हद तक एहसास करते हुए सूरजपाल मूक क्यों बने रहे? उनका लेखन तो काफी बोल्ड है। लेकिन इसके मूल में वजह क्या है? उनमें भी कोई कमी तो नहीं है? लेखन में इतनी प्रखरता साफ दृष्टि और जीवन में इतनी चुप्पी?
विमला चौहान का प्रसंग पढ़ा था भूमिका लिखते समय, उस समय मेरी स्थिति थी कि एक तरफ तो सूरजपाल के सामने सिर झुक रहा था और क्रोध भी आ रहा था कि रोका क्यों नहीं? सूरजपाल की कौन-सी मजबूरियाँ थी? सूरजपाल ने क्यों नहीं रोका क्यों चुप थे? विमला आगे बढ़ती जा रही थी। (क्षणभर चुप रहकर) यह तो विमला ही बता सकती हैं।
दलित लेखन में स्त्रियों को लेकर उनकी समस्याओं को लेकर लेखक चुप हैं, लेखन के क्षेत्र में दलित स्त्रिायाँ भी आगे नहीं आ रही हैं। जबकि मराठी में कुछ दलित स्त्रियों ने बड़ी शिद्दत से अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं?
देखिए, मैं तस्लीमा को पढ़ता हूँ भारतीय लेखिकाओं को पढ़ता हूँ। अब लेखन कम हो रहा है, विमर्श ज्यादा हो रहा है। यहाँ वह तेजस्विता नहीं है। स्त्रीविमर्श का मतलब हिन्दी के लेखक के लिए देहमुक्ति है।
जी डाक्टर साहब, कुछ लेखकों के लिए हो सकता है, पर स्त्रीविमर्श यहीं तक सिमटा हुआ नहीं है। स्थितियाँ तो विपरीत हैं, एक साथ स्त्री पर भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद मिलकर हमला कर रहे हैं, स्त्री आन्दोलन आज भी साहित्य के धरातल पर ही ज्यादा दीख रहा है। सामाजिक धरातल पर बहुत कम, तो ऐसे में किस प्रकार यह सामाजिक धरातल पर आएगा क्योंकि स्त्रीआन्दोलन और स्त्री साहित्य अस्मत और अस्मिता का साहित्य है?
देखिए, जो हजारों साल से हमारे संस्कार बने हैं, उसे न तो पुरुष लेखक तोड़ रहे हैं और न स्त्रियाँ। स्त्रियाँ तो तोड़ रही हैं बहुत हद तक पुरुष लेखक नहीं तोड़ पा रहे हैं। उनकी फ्यूडल मानसिकता स्त्री शोषण से बाज नहीं आ रही है।
वर्तमान कथा लेखन पर आपकी क्या टिप्पणी है?
संभावनाओं से भरा अच्छा लेखन हो रहा है। हाँ, युवा लेखकों में प्रसिद्धि पाने की बेचैनी है जो घातक है उनके लिए।
पहले लेखन में जो प्रतिरोधी स्वर था जो धार थी, वह धार आज के लेखन में क्या कम हुई है?
(थोड़ा गंभीर होकर) इसे पॉजिटिव ढंग से लेना चाहिए। ये कम अधिक होते रहते हैं। आज के युवा लेखकों में कम लिखकर प्रसिद्धि पाने का जो उतावलापन है, उसी बाजारवाद के कारण है। बाजारवाद के विरोध में लिखते भी हैं और उसी से स्वीकृति भी पाना चाहते हैं। धार तो कमजोर हुई ही है।
अपना रास्ता लो बाबा' में एक छटपटाहट है उस युवक के मन में। उसे लगता है कि उसके अंदर जो लगाव है वह टूटेगा तो कोई बड़ी चीज बिखर जायेगी। लेकिन आज सम्बन्धों के भीतर वह गहराई नहीं रह गयी है, वह उष्मा भी नहीं बची है। उससे रिक्त हो रहा है युवा लेखन। कहीं अपनी आत्मबद्धता के कारण है। इसे पीढ़ियों का गैप ही कहा जा सकता है? इनका लेखन आपको चुनौती नहीं दे पा रहा है। आपको इरीलिवेन्ट साबित नहीं कर पा रहा है। यही कारण है कि आज भी पाठक आपके लेखन को बड़ी शिद्दत के साथ पसंद कर रहे हैं।
इस टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद दे रहा हूँ। आप बहुत सही कह रही हैं। हाँ, यह पीढ़ी हमें हाशिए पर नहीं डाल पा रही है, जबकि इनसे पहले की पीढ़ी में एक ऊर्जा थी, चुनौती थी।
क्या व्यवस्था के साथ उनकी सहमतियाँ ज्यादा बन रही है?
हाँ, ऐसा है। लिखने के साथ जितना श्रम किया जाना चाहिए उतना श्रम नहीं कर रहे हैं। साथ ही लेखक का जो संबंध जनजीवन से होना चाहिए, लोक जीवन से होना चाहिए, अब ऐसा कम है।
सही है जब सुरेश कांटक, अखिलेश, उदय प्रकाश, सृंजय, देवेन्द्र आदि लिख रहे हैं तो उनमें तो एक धार है, कथा लेखन में एक ऊँचाई है।
आपसे मैं सहमत हूँ।
लेकिन आज?
आज निश्चित ही वह बात नहीं रह गयी है जो व्यवस्था को चुनौती दे सके या पाठक को व्यग्र और बेचैन बना सके और उद्वेलित कर सके।
वैसे आज आपको कथा लेखन के क्षेत्र में कौन से नये लेखक आकृष्ट कर रहे हैं?
चंदन पाण्डेय, कुणाल सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, राकेश कुमार मिश्र अच्छा लिख रहे हैं। इनके भीतर वह बेचैनी नहीं है जिसे हम लोग महसूस कर रहे हैं अपने लेखन के दौरान। चंदन पांडेय की दो कहानियाँ तो ठीक आयीं लेकिन तीसरी कहानी ऐसी लिखी जिस पर हम उम्मीद रखें या न रखें। देखिए न, आज ही एक लड़के ने फोन किया और कहा कि यह पुरस्कार मुझे मिल जाता तो ठीक रहता। स्वयं के लिए कहा था।

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मैं कहानी का होल टाइमर समीक्षक हूँ : मधुरेश

साधना अग्रवाल
हिन्दी कथा आलोचना के क्षेत्र में लगभग ३५ वर्षों से आप निरन्तर सक्रिय रहे हैं। हिन्दी कहानी और उपन्यास पर आपकी कई पुस्तकें छपकर चर्चित हुई हैं। मेरे मन में यह जानने की उत्सुकता है कि कविता, कहानी जैसी रचनात्मक विधा से शुरुआत न करके आपने किन कारणों से कहानी समीक्षा से लेखन का आरम्भ किया?
मैंने कई जगह इस बात का उल्लेख किया है कि अपने लेखन की शुरुआत मैंने कहानी से ही की थी। सन्‌ १९५६ में जब मैं बरेली कालेज, बरेली में इंटर में पढ़ता था, कालेज की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा मेरी कहानी बुघिया को प्रथम पुरस्कार मिला था जबकि उस प्रतियोगिता में एम.ए. के भी कई छात्र सम्मिलित थे। तब कुछ स्थानीय पत्रों में एक-दो कहानियाँ छपी भी थीं। बाबाशाह नामक अपनी एक कहानी मैंने यशपाल को सम्मति और संशोधन को भी भिजवाई थी। रांगेय राघव ने मेरी एक कहानी का शीर्षक ऊपर खाल नीचे खून रखा था। इसी दौर में मैंने कुछ अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद भी किया जो तब की कहानी और ज्ञानोदय प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपे थे। लेकिन इसी बीच मैंने कहीं अश्क को लिखा गया प्रेमचंद का एक पत्रपढ़ा जिसमें उन्होंने नए लेखकों को खूब सारा साहित्य, इतिहास, दर्शन आदि पढ़ने का सुझाव दिया। इस पत्र के प्रभाव में ही मैंने बी.ए. में हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य के साथ दर्शन भी पढ़ा फिर तीन-चार वर्ष मैंने कुछ नहीं लिखा - यह सोचकर कि अब पूरी तैयारी के बाद ही लिखूंगा। जब मैंने एम.ए. अंग्रेजी साहित्य में किया तो पढ़ने का और अधिक अवसर मिला। वह कुंजियों और गाइडों का दौर नहीं था। इसके बाद कहानी लिखने के बदले मैंने लहर की संपादिका मनमोहिनी जिनसे मेरा पत्राचार था और जिन्हें मैं मोना जी कहता था के सुझाव पर लहर के लिए यशपाल पर अपनी पहली टिप्पणी लिखी जो दिसम्बर ६७ के अंक में छपी। उसके बहुत पहले यशपाल से मेरा पत्राचार शुरू हो चुका था। वस्तुतः उस टिप्पणी के बाद आलोचना भीगे कंबल की तरह मुझ पर सवार हो गई। वैसे उसके बाद भी काफी समय तक मुझे लगता था कि कहानी ही मेरा मूल क्षेत्र है लेकिन आलोचना ने मुझे कभी छोड़ा ही नहीं। बाद में कुछ संस्मरण अवश्य लिखे जो कभी-कभार अभी भी लिख लेता हूँ।
जिस समय आपने लिखना शुरू किया कहानी समीक्षा का परिदृश्य कैसा था? यह धारणा प्रचलित है कि कहानी समीक्षा की शुरुआत डॉ. नामवर सिंह ने कहानी एवं नई कहानियाँ के अपने स्तम्भ से की। आगे चलकर धनंजय वर्मा, देवीशंकर अवस्थी, गोपाल राय तथा विजय मोहन सिंह भी इस क्षेत्र में आये। इन लोगों के बीच कहानी समीक्षा में किस तरह आपने अपने लिए स्पेस बनाया?
जब मैं कथालोचना के क्षेत्र में आया नामवर सिंह भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में निकलने वाली नई कहानियाँ में अपना स्तम्भ हाशिए पर लिख रहे थे। कहानी की आलोचना में धनंजय वर्मा, देवीशंकर अवस्थी, सुरेन्द्र चौधरी और विजय मोहन सिंह सक्रिय थे। इनमें सबसे अधिक क्षमतावान आलोचक सुरेन्द्र चौधरी थे। लेकिन कुछ तो इसलिए कि उन्होंने बहुत व्यवस्थित ढंग से कुछ नहीं लिखा और कुछ प्रकाशन के प्रति उनकी उदासीनता के कारण आज भी उनकी लिखी अधिकतर आलोचना पत्रिकाओं में दबी पड़ी है। बाद में देवीशंकर अवस्थी की पत्नी श्रीमती कमलेश अवस्थी ने अपने पति की पुस्तकों के प्रकाशन की दिशा में जैसी निष्ठा और समर्पण भाव से अपनी सक्रियता दिखाई वैसा दुर्भाग्य से सुरेन्द्र चौधरी के साथ नहीं हुआ। उनकी नई कहानीः प्रकृति और पाठ अपने समय में खूब चर्चित रही। बाद में उसकी लंबी भूमिका अलग से भी पुस्तक रूप में छपी। रेणु पर उनका एक महत्त्वपूर्ण और सुलिखित मोनोग्राफ साहित्य अकादमी से आया। लेकिन इससे कहीं अधिक उनका साहित्य आज भी असंकलित पड़ा है। धनंजय वर्मा की छवि नई कहानी की बदनाम त्रायी - मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर के जेबी आलोचक की ही अधिक रही। कलकत्ता कथा - समारोह में बाकायदा उन्हें ऐसा कहा गया। गोपाल राय ने कहानी पर कभी नहीं लिखा, वे पूरी तरह से उपन्यास के आलोचना और अनुसंधान-कर्ता ही बने रहे। देवीशंकर अवस्थी द्वारा संपादित नई कहानी : संदर्भ और प्रकृति और विवेक के रंग उनके आलोचना-विवेक की साझी है। कहानी पर वे अधिक नहीं लिख सके। लेकिन नई कहानी के बाद की कहानी की उनकी पहचान बहुत प्रामाणिक और विश्वसनीय है। विजय मोहन सिंह ने भी मुख्यतः सातवें दशक की कहानी पर ही अपने को केंद्रित किया। अज्ञेय उनके प्रिय लेखक थे। प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी उपन्यास में प्रेम की प्रकृति पर ही उन्होंने अपना शोध कार्य किया। पहले नामवर सिंह और बाद में अशोक वाजपेयी का संरक्षण उन्हें मिला। कहानी पर उनकी दो पुस्तकें भी छपीं जो समय-समय पर लिखे गए उनके लेखों और सभी समीक्षाओं के संकलन थे। कुछ कहानीकारों का उन्होंने स्वतंत्र मूल्यांकन भी किया, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, मुक्तिबोध, रघुवीर, रेणु, अमरकांत आदि, लेकिन पूर्वग्रह कराने का यह पूर्व ग्रह उन पर भी हावी रहा कि कवियों द्वारा लिखी कहानियाँ ही अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इसीलिए कहानी को सामाजिक विकास की समानांतरता में वे नहीं देख सके। कुल मिलाकर मेरे सामने यही परिदृश्य था और यहीं से मुझे शुरू करना था।
कहानी समीक्षा पर अपकी आरम्भिक पुस्तक आज की कहानी : विचार और प्रतिक्रिया है जो वस्तुतः आप द्वारा लिखित समीक्षाओं का संकलन है। आज इस पुस्तक को लगभग लोग भूल चुके हैं। शायद इसका दूसरा संस्करण भी नहीं हुआ, जबकि आपके कथा-आलोचक के विकास को समझने में यह पुस्तक मद्द करती है। अब पीछे मुड़कर देखने पर अपनी इस पुस्तक को आप किस रूप में लेते हैं?
मेरी पहली पुस्तक आज की हिंदी कहानी : विचार और प्रतिक्रिया सन्‌ ७१ में ग्रंथ निकेतन, पटना से छपी थी। उसे मेरे मित्रप्रो. गोपाल राय ने छापा था। उसमें संकलित अधिकतर निबंध और समीक्षायें मैंने बिसौली जैसे कस्बे में रहकर लिखी थीं। उसके निबंध तब अनेक महत्त्वपूर्ण पत्रिाकाओं - आलोचना, कल्पना, राष्ट्रवाणी कहानी तथा विकल्प आदि के विशेषांकों में छपे थे और उन्होंने मेरे बनते हुए आलोचक की पहचान को सघन किया था। उनमें से हिन्दी की चौदह श्रेष्ठ कहानियाँ : पुरानी पीढ़ी का योगदान मैंने शिवदान सिंह चौहान के अनुरोध पर आलोचना के चार खण्डीय स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी साहित्य विशेषांक के लिए लिखा था। नई कहानी के लेखक तब प्रेमचंद या कैसी भी परम्परा से अपने को जोड़ कर देखने में परहेज बरत रहे थे। यह निबंध मैंने छह महीने की तैयारी के बाद लिखा था। नई कहानी ने पुरानी पीढ़ी से क्या और कैसे लिया है इसका सोदाहरण उल्लेख इसमें विस्तार से हुआ था। इस लेख के लिखे जाने की प्रक्रिया में अनेक लेखकों - जैनेन्द्र कुमार, विष्णु प्रभाकर, अश्क, निर्गुण आदि से मेरा पत्राचार हुआ। बाद में कमल जोशी ने इससे प्रभावित होकर मुझे अपनी अनेक पुस्तकें भिजवाईं। अपने पत्रों में उन्होंने यह भी सूचनायें दीं कि कैसे राजेन्द्र यादव कभी आनंद परिहार और कभी किसी अन्य छद्म नाम से कल्पना, ज्ञानोदय आदि में उनके विरुद्ध लिखते रहे हैं - अपनी षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति के रहते। बाद में राजेन्द्र यादव ने उस लेख को पढ़कर मुझे पहला पत्र लिखा - अपने घोर विरोध और असहमतियों का उल्लेख करते हुए। भैरव प्रसाद गुप्त, शानी, अमरकान्त आदि के पत्र भी मुझे मिले और निबंधों की भी सघन और व्यापक पहचान बनी। वैसे उस किताब का कोई और संस्करण नहीं हुआ। लेकिन उसके कुछ निबंध मैंने सिलसिला में शामिल किए थे और हिन्दी कहानी : अस्मिता की तलाश में वह प्रायः सारी महत्त्वपूर्ण सामग्री ले ली गई है। इसका मतलब मेरे विचार से साधना जी यही है कि वे निबंध आज भी कुछ न कुछ महत्त्व रखते हैं - चालीस वर्ष बाद भी। कहानी की आलोचना में वह मुझे स्थापित करने वाली किताब है। तब विक्टर बालिन, नामवर सिंह, रमेश कुंतल मेघ आदि ने उस पर बहुत उत्साहवर्धक प्रतिक्रियायें भी प्रेषित की थीं। उसने मेरी आगे की राह तय भी की और आसान भी। मेरी दृष्टि में यही उसका महत्त्व है।
जहाँ तक मुझे याद है आपकी पुस्तक सिलसिला : समकालीन कहानी की पहचान' के अन्त में आपने महत्त्वपूर्ण कथा समीक्षकों पर भी विचार किया है। इस पुस्तक में खासकर डॉ. नामवर सिंह को आपने ठीक से याद किया है। नामवर जी के प्रति आपके पूर्वग्रह के कोई खास कारण हैं?
मेरी पुस्तक सिलसिला १९७९ में आई। सहयात्री के अंतर्गत उसमें नामवर सिंह और धनंजय वर्मा पर लेख हैं। नामवर जी पर लिखा गया लेख मूलतः रणधीर सिन्हा द्वारा सम्पादित आलोचक नामवर सिंह के लिए लिखा गया था और पहले वह वहीं छपा भी था। नामवर जी को मैंने पर्याप्त निकट से देखा है। उनका स्नेह भी मुझे मिला है एक समय मेरे अनुरोध पर वे पी-एच.डी. के मेरे गाइड भी थे भले ही वह काम कभी हुआ नहीं। बाद में उनकी उखाड़-पछाड़ काटने जमाने वाली प्रवृत्ति और जिसे वे रणनीतिक आलोचना कहते हैं। उस रुख को देखने-समझने के बाद मुझे कष्ट हुआ। शिष्यों और लाभार्थियों की जो भारी भीड़ उनके साथ रही आई है, उनमें से ही अनेक बाद में उनके विरोधी भी साबित हुए हैं। मेरी सबसे बड़ी पीड़ा अपने को उनका धीरे-धीरे नष्ट करते जाना रही है। व्याख्यान, चर्चा, विवाद का खून उनके मुंह को लग जाने से वे वह बहुत कुछ नहीं कर सके जो सिर्फ वे ही कर सकते थे। पहले वे प्रायः कहते थे कि रिटायरमेंट के बाद जमकर बैठेंगे और काम करेंगे। वैसा कुछ नहीं हुआ। मेरी पीड़ा कहीं न कहीं उन्हें नष्ट होते देखने की ही पीड़ा है। पिछले कुछ समय से मुझे लगता रहा है कि नामवर सिंह पर अपना संस्मरण और उनके पत्रों के प्रकाशन की दिशा में मुझे गंभीर होना चाहिए। शायद यहीं उसका सही समय है। उनके प्रति मेरे अनेक पूर्वग्रह मेरी उपेक्षाओं के आहत होने से उपजे हैं। वैसे भी लल्लो चप्पो और ठकुर सुहाती मेरा स्वभाव नहीं है। मैंने कभी सचमुच उन्हें बहुत प्यार और सम्मान दिया है।
हिन्दी कहानी की पहचान के बाद फिर आपने उसकी अस्मिता की तलाश की है। क्या आप पहचान और अस्मिता को अलग-अलग परिभाषित करना चाहेंगे?
जिसे आप कहानी की मेरी आलोचना में हिन्दी कहानी की पहचान' कह रही हैं वह वस्तुतः मेरी पुस्तक सिलसिला का उपशीर्षक था। यह पुस्तक सन्‌ ७९ में आई थी। हिन्दी कहानीःअस्मिता की पहचान सन्‌ ९७ में अर्थात्‌ उसके लगभग अठारह वर्ष बाद आई। हिन्दी में सामान्यतः आलोचना पुस्तकों के दूसरे संस्करण कम ही निकलते हैं। अस्मिता वस्तुतः पहचान का ही विस्तार है। अस्मिता की पहचान में कुछ निबंध मेरी पहली पुस्तक के भी हैं। सिलसिला में वे दो या तीन थे, यहाँ अधिक हैं। लेकिन इससे अधिक वह इन बीच के अठारह वर्षों में लिखी गई कहानी का मूल्यांकन ही अधिक है।
हिन्दी कहानी का विकास लिखकर आपने कथा आलोचना के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया है। लेकिन आपकी कहानी समीक्षा सम्बन्धित पुस्तकें देखने के बाद ऐसा लगता है कि आपमें पुनरावृत्ति बहुत ज्यादा है। क्या कभी आपने इस पर विचार किया है?
हिन्दी कहानी का विकास सचमुच पाठकों द्वारा पसंद की गई है। तीन वर्षों में उसके तीन संस्करण हुए हैं। हार्ड बाउंड के साथ उसका पेपर बैक्स संस्करण भी हुआ था। उसी श्रृंखला में फिर आगे चलकर मैंने उपन्यास और आलोचना पर भी पुस्तकें लिखीं और वे भी पढ़ी गईं। पहले की पुस्तकें मेरे पूर्व लिखित निबंधों और समीक्षाओं का संकलन थीं। यह पुस्तक एक बार में योजना बनाकर व्यवस्थित रूप में लिखी गई थी। स्वाभाविक है कि इसमें अपनी ही पूर्व प्रकाशित बहुत-सी सामग्री का उपयोग हुआ है। जिसे आप पुनरावृत्ति कह रही हैं वह नयी कहानी : पुनर्विचार और मेरी नई किताब कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार में भी मिलेगी क्योंकि संबंधित लेखकों पर आधार सामग्री तो एक ही है और मेरी ही है।
उपन्यास समीक्षा के क्षेत्र में आप देर से आये। कहानी पर तो आपकी कई पुस्तकें हैं लेकिन उपन्यास की आलोचना पर हिन्दी उपन्यास का विकास और हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान ही क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं है कि कहानी समीक्षा आपके लिए अपेक्षतयः सुविधाजनक है। हिन्दी उपन्यास का विकास तो बिल्कुल नई पुस्तक है इस क्षेत्र में लेकिन हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान में आपने न केवल महत्त्वपूर्ण उपन्यासकारों पर विचार किया है बल्कि महत्त्वपूर्ण उपन्यासों पर भी। फिर भी ऐसा लगता है कि हमारे समय के कुछ महत्त्वपूर्ण उपन्यास छूट गये हैं और कुछ ऐसे उपन्यास सम्मिलित कर लिये गये हैं जो हिन्दी उपन्यास की सार्थकता की पहचान ठीक से नहीं कराते। क्या यह इसलिए हुआ कि प्रकाशित समीक्षाओं को एक जगह एकत्र कर लिया जाए?
मेरे लेखन की शुरुआत सन्‌ ६२ में हुई। कहानी पर मेरी पहली किताब सन्‌ ७१ में आई। लेकिन पत्र-पत्रिकाओं में उपन्यास पर मेरा लिखना प्रायः साथ ही शुरू हुआ। मुझे अभी भी याद है कि उपन्यास पर मेरी पहली समीक्षा ठाकुर प्रसाद सिंह के कुब्जा सुंदरी पर थी जो लहर में ही छपी थी। इसके बाद मैंने यशपाल, अश्क, रेणु, भगवती चरण वर्मा, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश आदि के कुछ उपन्यासों पर समीक्ष में लिखीं। इस दौर में गोपाल राय द्वारा संपादित समीक्षा में मैं अधिकतर उपन्यासों की समीक्षा और वार्षिक सर्वेक्षण से संबंधित निबंध लिखे। हिन्दी उपन्यास पर मेरी पहली पुस्तक सम्प्रति है जिसकी जानकारी शायद आपको नहीं है। यह सन्‌ ८३ में आई। उसके पूर्व सन्‌ ८० में साहित्य अकादेमी से देवकीनंदन खत्री पर मेरा मोनोग्राफ छप चुका था। वहीं से दूसरा मोनोग्राफ रांगेय राघव पर सन्‌ ८८ में आया। स्पष्ट ही इन सबमें उपन्यासों पर ही विस्तार से लिखा गया है। हिंदी उपन्यास का विकास भी वस्तुतः इस पूर्व लिखित और प्रकाशित सामग्री के आधार पर ही बनी पुस्तक है। जहाँ तक हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान का सवाल है, वह एक तरह से उपन्यास पर मेरे लेखन का एक प्रतिनिधि चयन भी मानी जा सकती है। इसे संपूर्णता देने की दृष्टि से ही मैंने कुछ सामग्री देवकीनंदन खत्री और हिन्दी उपन्यास का विकास से भी ली है। ऐसी पुस्तकें योजनाबद्ध तरीके से नहीं लिखी जातीं। अपनी लिखित और पूर्व प्रकाशित सामग्री को संकलित करने की इच्छा भी स्वाभाविक है। इस तरह वह सामग्री कम से कम उसमें की कुछ सुरक्षित और संरक्षित रह जाती है। अच्छी से अच्छी पुस्तक में भी चयनित सामग्री के होने न होने को लेकर चुनौती दे सकती हैं। हिंदी उपन्यास : सार्थक की पहचान की अधिक समीक्षायें नहीं छपीं। प्रायोजित समीक्षकों के इस दौर में इसे मेरी और मेरे प्रकाशक की सीमा भी माना जा सकता है, लेकिन इसके प्रकाशन से मुझे संतोष है।
स्वतंत्र रूप से आपने या तो यशपाल पर विचार किया है या कहानीकार जैनेन्द्र कुमार पर। मेरे ध्यान में रांगेय राघव और यशपाल पर प्रकाशित आपके मोनोग्राफ भी हैं। मैं आपसे यह जानना चाहती हूँ कि आपने कथालोचना के व्यावहारिक पक्ष पर ही ज्यादा ध्यान दिया सैद्धान्तिक पक्ष पर कम, ऐसा क्यों?
हवाई और सैद्धांतिक आलोचना के दौर में भी मेरी भरसक यही कोशिश रही कि आलोचना लेखकों और कृतियों पर केंद्रित हो। मैंने देवकीनंदन खत्री, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर, भैरव प्रसाद गुप्त आदि पर पुस्तकें और मोनोग्राफ लिखे हैं। नयी कहानी : पुनर्विचार में भी नई कहानी आंदोलन के दौर के सोलह लेखकों पर समग्रता में विचार करने की कोशिश की गई है। मुझे इस बात का संतोष है कि अपने विचारों से बाहर के अनेक लेखकों पर मैंने विस्तार से लिखा है। इसका नया उदाहरण जैनेन्द्र की कहानियों पर मेरी किताब है। आपकी यह बात शायद ठीक है कि मैंने आलोचना के व्यवहारिक पक्ष पर ही अधिक लिखा है। हिन्दी में जनवादी आलोचना के दौर में घोर सैद्धांतिक लेखन हुआ और बाद में पूर्वग्रह घराने के लेखकों ने विचार को लगभग आलोचना से निष्कासित करके साहित्य में स्वायत्तता के नाम पर निर्जन, वीरान टापू बसाने की कोशिश की। मेरा मानना है कि सिद्धांत रचना में से ही अर्जित और विकसित होने चाहिए। पूर्वग्रह घराने के लोग आलोचना को जब विचारों का उपनिवेश बनाने की प्रवृत्ति का विरोध करते हैं तो वे वस्तुतः समय के वैचारिक दबावों से रचना को अलग और ऊपर रखने की ही वकालत करते हैं। रचना के मूल्यांकन का यह अवैज्ञानिक और अतार्किक रूप है। अपने समय के प्रति सच्ची रचना ही आगे आने वाले समय में भी पुनर्पाठ की संभावनाएँ जगाती है। किसी सैद्धांतिक समझ के अभाव में सार्थक व्यावहारिक आलोचना नहीं लिखी जा सकती। मेरी कोशिश रही है कि सिद्धांतों के किसी बाहरी जाप के बजाय व्यावहारिक आलोचना में से ही वे सिद्धांत उभरकर सामने आयें। ऐसी आलोचना अपनी प्रकृति में अधिक ग्रह्य, विश्वसनीय और पठनीय भी होगी।
क्या आपके मन में कभी हिन्दी कहानी का सौन्दयच्चास्त्र या हिन्दी उपन्यास का सौन्दर्य शास्त्र लिखने की बात नहीं उठी? जबकि हिन्दी आलोचना का मार्क्सवादी सौन्दय शास्त्र लिखने की बात जब-तब उठती ही रही बल्कि पहल ने मार्क्सवादी सौन्दय शास्त्र पर एक अंक भी केन्द्रित किया था।
सौंदय शास्त्र की शास्त्रीय अवधारणा ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया। शायद इसी कारण कहानी या उपन्यास का सौंदय शास्त्र लिखने का विचार भी मन में कभी नहीं आया। प्रेमचंद ने ही बहुत पहले सौंदर्य की कसौटी बदलने का सवाल उठाया था। जिस मार्क्सवादी सौंदय शास्त्र के निर्माण और विकास की बात हिंदी में जब-तब की जाती रही है वह वस्तुतः जीवन के संदर्भ में विकसित और निर्मित सौंदर्यबोध है। सौंदय शास्त्रे को मैं जीवन की परिपूर्णता और सलीके से उसे जीने की कला के अतिरिक्त और कुछ नहीं मान पाता। रचना की परिवर्तित अंतर्वस्तु के साथ उसका सौंदर्यबोध भी बदलता है। नयी कहानी : पुनर्विचार में आंदोलन और पृष्ठभूमि की चर्चा के प्रसंग में मैंने कहानी के इस परिवर्तित सौंदर्यबोध की चर्चा भी विस्तार से की है। हिन्दी में प्रायः ही नागार्जुन, त्रिलोचन आदि कवियों के प्रसंग में एक नए और परिवर्तित सौंदय शास्त्र की बात उठती रही है। यशपाल पर आने वाली अपनी पुस्तक यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश में मैंने यह दिखाने की कोशिश की है जिसे यशपाल का परम्परागत और रूढ़ शिल्प कहा और समझा जाता है। वह वस्तुतः कथानक हृास और उपन्यास में चरित्रकी तोड़-फोड़ के दौर में एक क्रांतिकारी कदम था। यशपाल मिली हुई दुनिया के विरुद्ध संघर्ष करके एक नई दुनिया बनाने के सपने को साकार करना चाहते हैं। भरे पूरे कथानक और पात्रों के द्वारा ही वे ऐसा कर पाते हैं। उनकी कला अपनी प्रकृति में ठीक वैसी ही कला है जो जीवन को सलीके से जीने की राह दिखाती है। जीवन की परिपूर्णता की इस कला को साधना ही वस्तुतः एक परिवर्तित सौन्दर्यबोध को विकसित करना है। हिंदी में मार्क्सवादी सौंदय शास्त्र के निर्माण और विकास की दिशा भी इससे बहुत अलग और भिन्न नहीं होगी।
मेरी जिज्ञासा आपसे यह जानने की भी है कि हिन्दी कथा-आलोचना खासकर कहानी समीक्षा पर कहानीकारों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि आठवें दशक से लेकर बीसवीं सदी के अन्त तक लिखी कहानियों का ठीक से मूल्यांकन नहीं हुआ। इस आरोप को आप किस रूप में लेते हैं?
साधना जी, हिन्दी कथा-समीक्षा के विरुद्ध सबके लिए कहने को काफी कुछ हैं। कभी-कभी आलोचकों में से भी कुछ उसे लतियाते देखे-सुने जाते हैं। स्थिति सचमुच बहुत अच्छी भी नहीं है। हिंदी में कहानी पर्याप्त विकसित विधा है और निरन्तर वह उत्कर्ष की ओर बढ़ रही है। काफी समय तक उसे हिन्दी में केंद्रीय विधा का गौरव भी दिया जाता रहा है। यदि सचमुच ही किसी विधा को केंद्रीय कहकर स्थापित किया जा सकता है। कहानीकारों और कहानी की तुलना में कहानी के आलोचक बहुत कम हैं। आठवें दशक से बीसवीं सदी तक की ही कहानी का नहीं, पुराने कहानीकारों का भी ढंग से मूल्यांकन नहीं हुआ है। हिन्दी में प्रायोजित समीक्षाओं के इस दौर में यह काम और भी मुश्किल हुआ है। उन पुराने लोगों से अलग किसी को क्या मिलने वाला है? लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस परवर्ती दौर की कहानी का मूल्यांकन हुआ ही न हो। कहानी पर मेरी ही पांच किताबें हैं। हिन्दी कहानी का विकास में मैंने अखिलेश और सारा राम तक की कहानियों को लिया है, बेशक उसके दूसरे संस्करण में, लेकिन इधर बिना देखे-पढ़े ही कथा-समीक्षा को गलियाने और लतियाने की प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है। अपने मन की आलोचना न होने पर... विलम्बित आलोचना की स्थिति में भी, लेखक सारी खीझ आलोचना पर उतारता है। आज हिन्दी में कहानी की आलोचना में दस आलोचक मुश्किल से मिलेंगे। कहानीकार हजारों में हैं। स्वाभाविक है कि सबका वैसा व्यवस्थित और संपूर्ण मूल्यांकन संभव नहीं है। यह गजब की आपा-धापी का दौर है। अपने अलावा किसी को और की चिंता ही जैसे नहीं है। अपने नाम के अलावा लेखक जैसे आलोचना में और कुछ पढ़ना ही नहीं चाहता। मुझे लगता कि हिन्दी कथालोचना की स्थिति सचमुच वैसी ही है जैसा उसका स्यापा आए दिन देखने-सुनने को मिलता है। महत्त्वपूर्ण लेखकों, प्रवृत्तियों और पुस्तकों की उपेक्षा उसने कभी नहीं की। यदि लेखक में दम है जो आलोचक झक मारकर उसका मूल्यांकन करेगा और वैचारिक असहमतियों के बावजूद मेरी नई पुस्तक कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार इसका प्रमाण है।
आरोप तो यह भी लगाया जाता है कि कहानी समीक्षा का कोई होल टाइमर समीक्षक नहीं मिला। ऐसे समीक्षक अनेक मिले जिनके लेखन में न निरन्तरता थी और न व्यवस्थित ढंग से कथा आलोचना करने की फुर्सत। बेशक हांडी के चावल की तरह जब-तब कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियों को टटोलने की कोशिश जरूर की। क्या इस आरोप का कोई ठोस आधार आपको लगता है?
बार-बार अपने को ही सामने रखना और उदाहरण बनाकर चलना अच्छी बात नहीं है। लेकिन जिसे आप कहानी का होल टाइमर समीक्षक कह रही हैं। मैं वही हूँ। मैं पिछले ब्यालीस वर्षों से लिख रहा हूँ - सिर्फ और सिर्फ कथा-समीक्षा। कहानी का इतिहास भले ही न लिखा हो, लेकिन जो लिखा है सब मिलकर वह इतिहास ही है। जिसे आप आलोचक के प्रसंग में उसकी निरन्तरता कहती है और सचमुच भी उसका बहुत मूल्य है, मैंने कभी उसे भी छीजने और सूखने नहीं दिया है। मेरे साथ और बाद के अन्य आलोचक जो कभी बहुत सक्रिय थे अब लिखना छोड़ बैठे हैं। मैं कह चुका हूँ कि कहानी की तुलना में आलोचना बेशक बहुत अपर्याप्त है। लेकिन मैं फिर उसे दोहराना चाहूँगा कि महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय लेखकों, प्रवृत्तियों, कहानियों का इसी आलोचना ने भरपूर नोटिस लिया है। कभी संपादक भी बहुत जिम्मेदारी के साथ इस प्रक्रिया में शिरकत करते थे। इसके कम से कम दो उदाहरण मैं अपने ही प्रसंग में दे सकता हूँ। जब आलोचना के स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी साहित्य विशेषांक के लिए पुरानी पीढ़ी का योगदान पर लिखने के लिए शिवदान सिंह चौहान ने मुझे आमंत्रिात किया तो कहानियों की एक सूची भिजवाकर यह सुझाव भी दिया कि इन कहानियों को आधार बनाया जा सकता है। मूल रूप में मुझे १२ कहानियाँ चुननी थीं। संख्या अधिक होने पर उन्होंने १४ की छूट दी। जिन कहानियों की सूची उन्होंने भिजवाई थी, मैंने उनमें से आधी कहानियाँ भी उस लेख में शामिल नहीं की लेकिन इससे संपादक के रूप में उनकी सजगता का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। आगे चलकर ज्ञानरंजन ने आधार के एक कहानी विशेषांक का संपादन किया। तब तक शायद पहल शुरू नहीं हुई थी। तब जेराक्स वाला दौर नहीं हुआ था। मुझे आज भी याद है कि लेख के लिए मेरी स्वीकृति के बाद उन्होंने कहानी, कल्पना सहित कुछ अन्य पत्रिकाओं में छपी कहानियों के कटिंग मुझे भिजवाए थे। इसके बाद भी यह छूट उन्होंने मुझे दी थी कि इनके अतिरिक्त भी यदि कोई महत्त्वपूर्ण कहानी हो तो मैं अपनी ओर से शामिल कर सकता हूँ। इसी तरह कभी शैलेश मटियानी ने विकल्प के कथा विशेषांक के लिए कुछ समीक्षार्थ कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण संग्रह भिजवाये थे। उनमें राजेन्द्र यादव, निर्मल वर्मा, मन्नू भण्डारी से लेकर तब की एकदम नवोदित कहानीकार सुधा अरोड़ा के बग़ैर तराशे हुए की याद मुझे अभी भी है। उन्होंने सुधा अरोड़ा को लिखा था और उन्होंने वह संग्रह सीधे मुझे भिजवाया था। मुझे नहीं लगता कि संपादन के प्रति ऐसी निष्ठा और ईमानदारी आज बची रह गई है। आज संपादक से असहमति का मूल्य उसकी काली सूची में शामिल होना है - चाहे नामवर सिंह हों, चाहे राजेन्द्र यादव हों या प्रभाकर जो पत्रिका में लेखक को कुछ मानदेय भी देते है, उनके संपादक जो आलोचक के कटोरे में जैसे भीख का सिक्का डालते हैं। क्या सचमुच आपको नहीं लगता कि इन स्थितियों ने भी स्वस्थ, विश्वसनीय और जेनुइन आलोचना को लगातार मुश्किल किया है? आलोचक से ही यह अपेक्षा क्यों की जाती है कि एक साथ वह इन सब मोर्चों पर लड़े? बयालीस वर्षों की अपनी रचनात्मक-आलोचनात्मक सक्रियता के बावजूद आज भी अपनी पसंद की किताब पर लिख पाना मेरे लिए हमेशा ही सुकर नहीं होता। यह जरूरी नहीं कि अपनी रुचि संपादक की रुचि से मिलती हो। इधर संपादकों के मन में आलोचक की इच्छा और रुचि का सम्मान निरन्तर छीजता गया है। वह दौर अब इतिहास की बात है जब रामविलास शर्मा से घोर असहमतियों के बीच शिवदान सिंह चौहान, अमृत राय, प्रकाश चंद्र गुप्त, हंसराज रहबर आदि उनके समालोचक में लिखते थे और रामविलास शर्मा, एक संपादक के रूप में, अज्ञेय को भी अपनी पत्रिाका में लिखने को आमंत्रिात करते थे। आलोचक इसी धरती का जीव है, अपने समय के प्रभावों और दबावों से वह कैसे और कहाँ तक मुक्त रह सकता है। उग्र असहमतियों की हम चाहे कितनी ही बात करें, मूल रूप से हम चापलूसी और ठकुर सुहानी वाली दुनिया में ही रह रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि लेखक की चिप्पी हटाने के बाद उसके नीचे संपादक का नाम साफ दिखाई देता है। मुझे लगता है कि इस पूरे परिवेश को ध्यान में रखकर ही आलोचना पर कोई सार्थक टिप्पणी की जा सकती है।
आज कहानी की एक सदी पूरी होने पर क्या आप महसूस करते हैं कि हिन्दी कहानी का विकास ठीक दिशा में हुआ? संक्षेप में आप कहानी के टर्निंग प्वाइंट और प्रवृत्तियों के बारे में यदि खुलासा करें तो वास्तविकता उजागर होगी?
मुझे तो यही लगता है कि सौ वर्षों में हिन्दी कहानी ने बिना अधिक भटके अपना रास्ता तय किया है। जहाँ तक मेरी जानकारी है किसी यूरोपीय या भारतीय भाषा की कहानी के मुकाबले इस विकास और कुल मिलाकर हिन्दी कहानी की उपलब्धियों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। आरम्भिक कहानियों के संदर्भ में मौलिकता और कलात्मक का सवाल जरूर उठाया जा सकता है लेकिन प्रेमचंद के हिन्दी में आने के पूर्व यानी १९१६ से पहले ही हिन्दी में प्रसाद की अनेक महत्त्वपूर्ण कहानियों के साथ ही माधवराव सप्रे, बंग महिला, चंद्रधर शर्मा गुलेरी आदि की कहानियाँ आ चुकी थीं। ये कहानियाँ एक ओर यदि कहानी को सामाजिक राष्ट्रीय संदर्भों से जोड़ती हैं वहीं रचना विधान की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। हिन्दी कहानी का पहला चरण यही है। प्रेमचंद का हिन्दी में आना और दो दशकों की उनकी रचनात्मक सक्रियता उसका दूसरा कारण है। जैनेन्द्र और अज्ञेय से हिन्दी कहानी का तीसरा चरण माना जा सकता है। प्रेमचंदोत्तर हिन्दी कहानी में जैनेन्द्र और यशपाल दो धाराओं के प्रतिनिधि लेखकों के रूप में भी रेखांकित किए जा सकते हैं। हिन्दी कहानी में नई कहानी का आंदोलन अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। आज हम इस स्थिति में हैं कि उसका तटस्थ और वस्तुपरक मूल्यांकन कर सकें, ऐसी ही एक विनम्र कोशिश नयी कहानी : पुनर्विचार में मैंने की भी है और उसकी उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाओं को देख सकें। हिन्दी में कहानी-समीक्षा की शुरुआत वस्तुतः इस आंदोलन की ही देन है। इसके बाद सातवें दशक और समकालीन कहानी के रूप में कहानी के इस विकास को रेखांकित किया जा सकता है। नई कहानी के बाद आंदोलन कई हुए लेकिन सचेतन कहानी, अकहानी, जनवादी कहानी आदि के वे आंदोलन नई कहानी के रचनात्मक उत्कर्ष तक नहीं पहुँचे। आज उनका महत्त्व सिर्फ कहानी के इतिहास की दृष्टि से ही बचा रह गया है। अपनी पुस्तक हिन्दी कहानी का विकास में मैंने इसी तरह हिन्दी कहानी के विकास और प्रवृत्तियों को समझने की कोशिश की है।
समकालीन कथा समीक्षा में सक्रिय आलोचकों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि आज हिन्दी में गम्भीर समीक्षा नहीं लिखी जा रही। ज्यादातर समीक्षाएं जो समाचार पत्रों या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रों में छपती हैं, बेरोजगार का धन्धा हैं।
आपकी यह बात काफी हद तक ठीक है कि हिन्दी कहानी की सक्रियता के अनुपात में उसकी समीक्षा वैसी गंभीरता से नहीं लिखी जा रही है। लेकिन मैं कह चुका हूँ कि इसके लिए एक ओर यदि संपादक जिम्मेदार हैं, वहीं हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि पिछले दशकों में आलोचना के क्षेत्र में कितने कम लोग उभरकर आए हैं। आलोचना एक गंभीर साहित्यिक उद्यम है। वह पूरी तैयारी और समर्पण की मांग करती है। लोगों के पास अधिक रुकने और ठहरने का धैर्य नहीं है - वे तत्काल अपनी उपलब्धियों और किए गए श्रम का प्रतिफल चाहते हैं। इस दृष्टि से आलोचना उन्हें हताश करती है। चापलूसी और ठकुर सुहाती वाली आलोचना की उम्र अधिक नहीं होती। हिन्दी में प्रायोजित समीक्षकों की चर्चा इधर आम है। संपादकों और लेखकों का पूरा नेटवर्क सक्रिय देखा जा सकता है। पत्रिकाओं, प्रतिष्ठानों और संपादकों के अपने गुट हैं। समग्रता और वस्तुपरकता का आग्रह कहीं दिखाई नहीं देता। लोगों का बस चले तो वे अपने विरोधियों का नाम ही मिटा दें। बात आलोचना के जनतंत्र और विचार की तानाशाही के विरोध की जाती है जबकि सबसे बड़े तानाशाह वे लोग ही हैं। इन स्थितियों में आमतौर पर आलोचना और खासतौर पर कथालोचना के संकट को समझना अधिक मुश्किल नहीं है। पिछले दिनों जो कुछ नाम इस दिशा में उभरकर आए हैं उनमें वीरेन्द्र यादव, रविभूषण, गोपेश्वर सिंह आदि के नाम तत्काल ध्यान में आ रहे हैं। नवजागरण के संदर्भ में कर्मेन्द्र ने भी ठीक-ठिकाने का काम किया है। एक खास चीज जो ध्यान आकृष्ट करती है वह बड़ी संख्या में महिला आलोचकों की उपस्थिति है जो इससे पहले हिन्दी में कभी नहीं रही। अर्चना वर्मा, अनामिका, सुधा सिंह, रोहिणी अग्रवाल आदि अनेक नाम हैं जो इस दिशा में सक्रिय हैं और उम्मीद जगाते हैं। चाहें तो आप अपना नाम भी इनमें जोड़ सकती हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति कथा-आलोचना में नियमित और निरन्तर हस्तक्षेप न करने के बावजूद कभी-कभार बहुत अच्छी समीक्षा लिखकर सन्नाटे को तोड़ देता है। आखिरी कलाम पर आकार में छपी अरुण प्रकाश की समीक्षा एक ऐसी ही समीक्षा है।
आपकी दृष्टि में आज नई पीढ़ी में ऐसे कौन समीक्षक हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है?
अरविंद त्रिापाठी, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी - इनमें से कोई पूरी तरह कथालोचक नहीं है। पंकज चतुर्वेदी की आलोचना तो पूरी तरह काव्य-केन्द्रित है, लेकिन आलोचना में इन्होंने अपनी पहचान बनाई है और अपेक्षाएँ जगाई हैं। इनके अपने-अपने संरक्षक और गॉड-फादर हैं - जिन्हें आलोचना में उसका रोल-मॉडल भी कहा जा सकता है। कहीं न कहीं इससे उनका अपना आलोचना-व्यक्तित्व कुंठित और विकास बाधित भी होता है, इनकी आलोचनात्मक तैयारी में भी गुणात्मक अंतर हो सकता है, लेकिन फिर भी इनके विकास का अनुमान लगा पाना मुश्किल नहीं है। मुझे लगता है कि जो काम कभी देवीशंकर अवस्थी ने विवेक के रंग के माध्यम से किया था, वैसे प्रयास अभी भी किए जाने चाहिए। इसके भी पहले या फिर इसी के आस-पास यही काम बालकृष्ण राव ने विवेचना के माध्यम से किया था। हिन्दी की आरम्भिक समीक्षाओं का भी एक चयन आना चाहिए। आज प्रायोजित और साधारण समीक्षाओं के दौर में जो कुछ अच्छी, चमकदार और विश्वसनीय समीक्षायें लिखी जा रही है उन्हें अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है। ऐसा करके ही शायद और लोगों को वैसी समीक्षाएँ लिखने के लिए उत्प्रेरित किया जा सकता है।
मैं समीक्षा क्यों लिखता हूँ शीर्षक लेख जो आपकी पुस्तक हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान की पीठिका के रूप में प्रकाशित है, पुस्तक समीक्षा को गम्भीर और दायित्वपूर्ण रचनात्मक कर्म मानते हुए आपने अनुभव का साक्ष्य दिया है कि हिन्दी में आलोचना को सहने और झेल पाने के माद्दे का विकास बहुत कम हुआ है जबकि आपके शब्दों में ही उपेक्षा की मुद्रा अपनाने वाले लेखक भी अच्छी प्रशंसात्मक समीक्षा के लिए जमीन-आसमान के कुलावे मिलाते देखे जाते हैं' इस विडम्बानात्मक स्थिति पर आपकी टिप्पणी क्या है?
मैं समीक्षा क्यों लिखता हूँ? नामक जिस लेख का उल्लेख किया है वह लंबे समय तक हंस में बिना छपे पड़ा रहा। लगभग गुस्से की हालत में उसे वापस मंगवाकर मैंने साक्षात्कार में भिजवाया था। क्या छपने पर उसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई। मैंने सचमुच बेहद जुनूनी भाव से समीक्षा-कर्म किया है और आज भी उसे छोड़ा नहीं है। हिन्दी का आलोचक विकसित और स्थापित हो जाने के बाद समीक्षा-कर्म को हिकारत से देखने लगता है। हिन्दी में अश्क और अज्ञेय ने अपने बाद की पीढ़ी के युवा लेखकों पर खूब लिखा है। सामान्यतः बहुत तेजावी समीक्षा में लिखना मेरी प्रकृति नहीं है। लेकिन फिर भी अनेक अवसरों पर मेरी समीक्षाओं ने अश्क, विष्णु प्रभाकर, अमृत लाल नागर जैसे बड़े और स्थापित लेखकों को भी दुखी किया है। इस विडम्बनापूर्ण स्थिति पर मैं यही कह सकता हूँ कि यह हमारे समाज में व्याप्त ढोंग का ही एक हिस्सा है। मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू वाली यह प्रवृत्ति मैंने अनेक युवा और विकासशील लेखकों में भी देखी है। लेकिन इन्हीं के बीच प्रियवंद जैसे कुछ लेखक भी हैं। अक्षरा में अपने उपन्यास परछाई नाच पर मेरी लिखी समीक्षा पढ़कर उन्होंने बहुत कृतज्ञ भाव से मुझे पत्र लिखा और अपनी किताबों के बारे में पूछा कि मेरे पास न होने पर वे मुझे भिजवा सकते हैं। यद्यपि मेरी समीक्षा में उस उपन्यास के नकारात्मक पक्षों की चर्चा भी थी।
एक तरफ तो समीक्षा कर्म को आप महत्त्वपूर्ण मानते हैं दूसरी तरफ ठीक गोपाल राय और परमानंद श्रीवास्तव की तरह समीक्षा लिखने में, चुनाव करने में सावधानी नहीं बरतते? क्या यही कारण तो नहीं कि आप जैसे समीक्षकों की छवि पाठकों में जैसी बननी चाहिए नहीं बनी।
यह स्थिति सचमुच बहुत अंतर्विरोधी है कि एक ओर तो पुस्तक समीक्षा को घटिया, हेय और उपेक्षणीय काम समझा जाता है वहीं, प्रायः ही पुस्तक समीक्षा की स्तरीय पहचान के लिए लोग मुझे शाबासी भी देते हैं। आपकी यह बात ठीक है कि पुस्तकों के चयन के मामले में मैंने अधिक सावधानी शायद नहीं बरती है। ख़ासतौर से शुरू के दौर में। लेकिन जब ऐसा नहीं होता था तब भी मैं अपने संपादक-मित्रों प्रकाशकों या फिर स्वयं लेखक को लिखकर अपनी पसंद की किताब पर लिखे जाने को तरजीह देता था। कभी अपनी समीक्षा की रचना-प्रक्रिया पर लिखूंगा तो इस प्रसंग की चर्चा भी करूँगा। एक समीक्षक के रूप में मेरी चिंता यह भी होती है कि अपने समय की महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय पुस्तकें छूटें नहीं। मैं इसे अपने समय के रचनात्मक प्रवाह के बीच होना और बने रहना कहता रहा हूँ। लेकिन चुनाव में अधिक सतर्क न रहने के अपने खतरे तो हैं ही। एक ओर इसके लिए यदि मेरी प्रशंसा की जाती है कि अपने समकालीन आलोचकों में मेरे यहाँ अपेक्षाकृत लेखकों और पुस्तकों की एक बड़ी और व्यापक दुनिया मिलती है तो वहीं शायद जैसा कि आप कहती हैं, पाठकों में एक समीक्षक के रूप में मेरी वैसी छवि नहीं बन पाती जैसी बननी चाहिए। लेकिन मैं दूर तक इससे सहमत हो पाने की स्थिति में नहीं हूँ। ढेरों लेखकों और पाठकों के पत्र मुझे मिलते हैं। प्रायोजित समीक्षकों के इस दौर में ईमानदारी, वस्तुपरकता और विश्वसनीयता से मुझे जोड़कर देखा जाता है। इससे संतोष मिलना स्वाभाविक है। महत्त्वपूर्ण शायद यह भी है कि मैंने लिखा क्या है। प्रायोजित और अतिरेकपूर्ण समीक्षा मैंने नहीं लिखी। संपादकों की ऐंठ और अकड़ मुझसे नहीं बर्दाश्त होती। पिछले आठ-दस वर्षों से पुस्तकों पर अपने को केन्द्रित करने का यह भी यह बड़ा कारण है। इससे समीक्षा कर्म अपने आप खत्म हो जाता है। फिर भी कसौटी समय माजरा, कथाक्रम, वागर्थ, तद्भव, साक्षात्कार, समीक्षा, अकम्‌ आदि में मैं नई किताबों पर विस्तार से लिखता रहा हूँ। ये समीक्षायें चयन के संबंध में मेरी सतर्कता का संकेत भी देती हैं।

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अम्बेडकर के विचारों की अभिव्यक्ति ही दलित साहित्य है : ओमप्रकाश वाल्मीकि

डॉ. शगुफ्ता नियाज
पारिवारिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइये?
मैं, बरला, मुजफ्फर नगर के एक साधारण परिवार में पैदा हुआ और उन दिनों दलित परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। जो स्कूल जाने की कोशिश करते थे, उनको जाने नहीं दिया जाता था। जो जाना भी चाहते थे, उनको रोकने की कोशिश की जाती थी। जो पहुँच जाते थे, उनको भगाने की कोशिश की जाती थी। शिक्षकों की मानसिकता जातिवादी होती थी और वे ऐसा कोई मौका नहीं चूकते थे जहाँ वे जाति के आधार पर अपमानित किया जा सके। बचपन की ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जिनका चित्रण मैंने जूठन में किया है जो दलित जीवन के दग्ध अनुभव हैं। ऐसी स्थितियों में शिक्षा पाना बहुत मुश्किल होता था। परिवार की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं होती थी कि शिक्षा ग्रहण कर सके। इन हालात में शिक्षा पाकर साहित्य की तरफ मुड़ना बहुत ही मुश्किल काम था, लेकिन मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ता रहा मेरे मन में साहित्य के प्रति आकर्षण भी बढ़ा और साहित्य ने ही मुझे हीनता-बोध से बाहर निकाला और जब मैं ७-८वीं कक्षा में था, तभी से कविता, कहानी लिखने की कोशिश करने लगा था, लेकिन सही दिशा मुझे मिली जब मैंने महाराष्ट्र में दलित पेंथर के आन्दोलन को बहुत करीब से देखा और डॉ. अम्बेडकर के जीवन दर्शन को अपनी व्यथा-कथाओं में अभिव्यक्त करने की प्रेरणा मिली।
आपकी नजरों में दलित कौन है? शब्द दलित क्यों और कब प्रचलन में आया?
अगर सीधे-सीधे दलित को परिभाषित किया जाये, तो दलित वह है, जिसे संविधान में अनुसूचित जाति, जनजाति कहाँ गया है और जिसे सामाजिक जीवन में उसके मानवीय हक़ों से दूर रखा गया है। वर्ण-व्यवस्था में जो अस्पृश्य, अन्त्यज, अछूत है, वही दलित है।
दलित शब्द डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन से बाहर आया है और इसे राष्ट्र स्तर पर स्वीकार किया गया। ऐसा पहली बार हुआ है कि दलितों ने दलितों द्वारा अपने लिए किसी शब्द को चुना। अभी तक जितने भी शब्द दिये गये थे, वे तमाम शब्द गैर दलितों द्वारा दिये गये थे, इस शब्द ने उनकी आकांक्षा और अस्मिता को एक पहचान दी है। इस शब्द का प्रचलन तब और अधिक बढ़ा जब मराठी दलित साहित्य आन्दोलन का सूत्रापात हुआ। आज यह शब्द संघर्ष का प्रतीक बन गया है।
आपकी दृष्टि में दलित साहित्य क्या है? दलित साहित्य के सैद्धान्तिक पक्ष पर अपनी राय प्रकट कीजिए?
दलित साहित्य वही साहित्य है जिसमें दलितों की पीड़ा की अभिव्यक्ति हो और जिसकी अन्तर्ऊर्जा में दलित चेतना का समावेश हो। दलित चेतना का केन्द्र बिन्दु हजारों साल का उत्पीड़न, शोषण है और उससे मुक्त होने की कोशिश ही दलित चेतना है। दलित चेतना का सरोकार डॉ. अम्बेडकर के जीवन संघर्ष से जुड़ता है। इसीलिए हम यूं भी कह सकते हैं कि जिस साहित्य में अम्बेडकर विचार हो वही दलित साहित्य है। अम्बेडकर के विचार से विहीन साहित्य, भले ही वह लिखा हो किसी दलित ने वह हरिजन साहित्य हो सकता है, लेकिन दलित साहित्य नहीं हो सकता है। यदि कोई गैर दलित इस विचार के तहत अपनी रचनाधर्मिता की अभिव्यक्ति करता है तो उसे भी हम दलित साहित्य कह सकते हैं। लेकिन गैर दलित को जातीय भावना से मुक्त होना चाहिए, वर्ण व्यवस्था में अटूट विश्वास रखने वाला कोई लेखक दलित साहित्य लिखेगा तो वह सिर्फ दिखावा ही होगा।
हिन्दी साहित्य के सौन्दयशास्त्र और दलित साहित्य के सौन्दयच्चास्त्र में आपको कोई भेद लगता है। अगर लगता है तो बताने का कष्ट करें।
हिन्दी साहित्य का सौन्दयशास्त्र संस्कृत के काव्य शास्त्र के आधार पर तैयार किया गया है। जिसके तहत उसकी तमाम मान्यताएं सामंतवादी हैं और उसके जीवन मूल्य ब्राह्मणवादी विचारधारा से संचालित होते हैं। उस साहित्य में आनन्द और रस की जो महत्ता स्थापित होती है, उसे दलित साहित्य स्वीकार नहीं करता है। दलित साहित्य आनंद के लिए नहीं लिखा जाता है, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्राता, समता, भाई चारे की भावना को महत्ता देता है और उसके केन्द्र में मनुष्य ही सर्वोपरि है। उन तमाम मान्यताओं का विरोध करता है, जिनमें महाकाव्यों का नायक उच्च कुलोत्पन्न होना चाहिए। ऐसी तमाम चीजों को दलित साहित्य स्वीकार नहीं करता साथ ही भारतीय समाज व्यवस्था जो वर्ण व्यवस्था से संचालित होती है। उसे मनुष्य विरोधी मानता है।
आपकी दृष्टि में दलित-चेतना क्या है?
जैसा कि उससे पहले कहा गया है कि दलित चेतना हजारों साल के उत्पीड़न से मुक्त होने की इच्छा ही दलित चेतना है।
दलित लेखन में दलित लेखकों और गैर-दलित लेखकों की अपनी-अपनी भूमिकाएँ क्या हैं? क्या ग़ैर दलित लेखक दलित साहित्य के प्रति पूर्व धारणा से ग्रस्त है साथ ही इस बात पर भी प्रकाश डालने का कष्ट करेंगे कि क्या दलित साहित्यकारों पर सवर्ण विचारधारा का प्रभाव है?
दलित लेखन में दलित लेखकों और गैर दलित लेखकों की भूमिकाएँ अलग-अलग ही हैं। अभी तक जो हिन्दी साहित्य में गैर दलित लेखकों द्वारा लिखा गया साहित्य सामने आया है उसका मुख्य स्वर यथास्थिति बनाए रखने का है। वह आदर्शवादी और सुधारवादी दृष्टिकोण के तहत लिखा गया है, और एक मुख्य बात है कि उन रचनाओं में दलित व्इरमबज की तरह इस्तेमाल हुए हैं, ...की तरह नहीं। जहाँ ... की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश हुई है, वहाँ भी दलितों के आन्तरिक चित्रण का अभाव दिखाई पड़ता है। दलित लेखकों ने दलित पात्रों को ...की तरह लिखा और उनकी सामाजिक भूमिकाओं को प्रतिबद्धता के साथ चित्रित किया है। जहाँ तक दलित साहित्यकारों पर सवर्णों के प्रभाव का कारण है। दलित साहित्य के पूर्व अनेक रचनाकार उसी प्रभाव में आकर लेखन कार्य कर रहे थे। आज भी ऐसे अनेक जन्मा दलित लेखक हैं जो कहते हैं वे दलित लेखक नहीं हैं। उनकी रचनाओं में सवर्ण-सोच का प्रभाव दिखायी पड़ता है, उनकी रचनाओं में दलित चेतना और दलित-संघर्ष का अभाव साफ-साफ देखा जा सकता है।
सदियों का सन्ताप और बस बहुत हो चुका आपके दो कविता संग्रह है। सलाम एवं घुसपैठिए आपके कहानी संग्रह है तथा जूठन आपकी आत्मकथा है। दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र पुस्तक भी आपने लिखी है। मैं जानना चाहती हूं कि आपको दलित साहित्य की रचना करने में कौन-कौन सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, क्या सवर्णों के अलावा आपके अपनों ने भी आपको आहत किया?
जब मैंने लिखना शुरू किया तो बहुत सारी कठिनाइयाँ और चुनौतियाँ मेरे सामने थीं। छपने-छपाने की समस्याओं से भी जूझना पड़ा। उस समय की चर्चित पत्रिका सारिका ने दस वर्ष तक मेरी कहानी अपने पास रखकर लौटाई थी इस आशय के साथ यदि और इन्तजार कर सकते हैं तो भेज दीजिए हम उसे छापेंगे। अब आप इसी से अन्दाज लगा सकते हैं कि हिन्दी सम्पादकों का रवैया दलित लेखक के साथ कैसा रहा, किसी भी लेखक के लिए दस वर्ष बहुत होते हैं लेकिन सम्पादकों को यह करते समय कतई शर्मिन्दगी नहीं हुई और वे लगातार दलित रचनाओं के साथ यही करते रहे। जहाँ तक अपनों का सवाल है, ऐसे कई दलित प्रकाशक थे जिनके पास मैं अपनी पुस्तकें लेकर गया, लेकिन वहाँ भी जातिवाद कुण्डली मारे बैठा था और दलित लेखकों में मैं अकेला लेखक था जिसकी कोई भी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई थी।
दलित कविता लिखने का विचार आपके मन में कब और कैसे आया?
मैंने अपने बचपन में ही इस बात को महसूस कर लिया था कि हमारा समाज तमाम प्रताड़नाओं, उत्पीड़न, शोषण को चुपचाप सह रहा है। ऐसा नहीं है कि उसको बयान नहीं करते थे। वे अपने घरों में या बिरादरी के छोटे-मोटे समारोहों या कार्यक्रमों में शोषण के खिलाफ बोलते थे। लेकिन उनकी आवाज अनसुनी रह जाती थी, और जब मेरा परिचय साहित्य से हुआ तो मुझे लगा कि साहित्य ही इस आवाज को दूसरों तक पहुंचा सकता है। मैंने बचपन में ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं।
कहानी लिखने के पीछे कौन-सा दर्द छिपा है?
कहानी लिखने के पीछे भी वही स्थितियाँ मौजूद थीं जो बात कविता में सीधे-सीधे नहीं कही जा सकती है। वह कहानी के माध्यम से ज्यादा आसानी से लोगों तक जा सकती है। जीवन का यथार्थ, उसके उसी रूप में, जैसा मौजूद है, पाठकों तक पहुंचाने में कहानी विधा की अपनी महत्ता है। जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। कथाकथन कार्यक्रमों के माध्यम से ये अनुभव और ज्यादा गहरे हुए थे। दिल्ली की दलित बस्तियों में राजेन्द्र यादव जी के साथ ऐसे अनेक कार्यक्रम हुए जहां आम आदमी सीधे कहानियों से जुड़ता था।
डॉ. अम्बेडकर और महात्मा गाँधी में से प्रेमचन्द पर किसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। क्या प्रेमचन्द का कुछ लेखन दलितों के लिए समर्पित है?
प्रेमचन्द पर गाँधी के प्रभाव से पहले आर्य समाज का प्रभाव था। उनकी बहुत सारी रचनाएं आदर्शवाद की मानसिकता के साथ लिखी गईं। बाद में वे गाँधी जी के प्रभाव में आते हैं और कर्मभूमि, रंगभूमि जैसी रचनाएं लिखते हैं। अम्बेडकर का प्रभाव उन पर सीधे-सीधे नहीं दिखाई देता लेकिन सामाजिक दबाव के तहत उन्होंने कुछ ऐसी कहानियाँ लिखीं, जिन पर अम्बेडकर का प्रभाव साफ दिखाई पड़ता है। उदाहरण के तौर पर ठाकुर का कुंआ, दूध का दाम और मंत्र जैसी कहानियाँ अम्बेडकर के प्रभाव की कहानियाँ हैं। लेकिन ३५० कहानियों में से तीन-चार कहानियाँ लिखकर वे दलित के प्रति समर्पित नहीं हो सकते। उनकी ज्यादातर कहानियाँ गाँधीवादी प्रभाव के सुधारवादी दृष्टिकोण की कहानियाँ हैं।
दलित साहित्य के बारे में हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचकों का नजरिया क्या है?
आरम्भिक दौर में हिन्दी के आलोचकों का नजरिया दलित साहित्य के प्रति नकारात्मक ही रहा है। आज भी ऐसे अनेक आलोचक हैं जो दलित साहित्य को साहित्य मानने को तैयार नहीं हैं। लेकिन दलित साहित्य को ऐसे आलोचकों की स्वीकृति की जरूरत नहीं है, क्योंकि दलित साहित्य का फलक व्यापक है। वह समाज की बेहतरी के लिए समर्पित है और समाज में बदलाव की प्रक्रिया का समर्थक है। उसका उद्देश्य भिन्न है। जो लोग भारतीय समाज व्यवस्था के समर्थक हैं उन्हें दलित साहित्य क्यों स्वीकार होगा। ऐसे आलोचक ब्राह्मणवादी मानसिकता के साथ साहित्य को पढ़ते हैं।
दलित विमर्श पर आज लगभग हर पत्रिाका अपने विशेषांक निकाल रही है। क्या दलित विशेषांक निकालने वालों के यथार्थ से अवगत करायेंगे साथ ही यह भी बताना चाहेंगे कि दलित विमर्श के पीछे का विमर्श क्या है?
हाँ, प्रत्येक पत्रिाका दलित विशेषांक निकाल रही है लेकिन उनमें से बहुत सारी पत्रिकायें हैं, जो आज भी दलित रचनाकारों को छापने का मन नहीं बना पा रही हैं। बल्कि उनके विरोध में ही कभी टिप्पणियाँ, कभी लेख प्रकाशित करने में पीछे नहीं हैं। इसीलिए ऐसे सम्पादकों के तमाम गठजोड़ कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाते हैं। ऐसे सम्पादकों को अवसरवाद के बजाए पहले अपनी मानसिकता को बदलना होगा और दलित विमर्श में सक्रिय भागीदारी करनी होगी। दलित विशेषांक निकालने से पहले दलित रचनाओं को स्थान देना होगा। दलित साहित्य के उद्देश्य को भी समझना होगा।
दलित और स्त्रीदोनों ही सामाजिक शोषण के शिकार रहे हैं। क्या आप इससे सहमत है?
हाँ, बिलकुल सहमत हूँ। मैं स्वयं इस बात को मानता हूँ जिन स्थितियों से दलितों को गुजरना पड़ा है। उन्हीं स्थितियों से स्त्रियाँ भी गुजर रही हैं। दलित यदि मन्दिरों में नहीं जा सकते हैं तो दक्षिण के एक मन्दिर में स्त्री के प्रवेश को लेकर हंगामा मचा हुआ है। दलित के भगवान की मूर्ति छू लेने से भगवान अपवित्रहो जाते हैं वही स्थिति महिलाओं की भी है। दक्षिण ही नहीं उत्तर भारत में अनेक ऐसे मन्दिर हैं जहाँ स्त्रियों के प्रवेश को निषेध किया गया है। घरेलू स्तर पर भी स्त्रियों के अधिकार नगण्य हैं। उन्हें पांव की जूती मानने वालों की कमी नहीं। तरह-तरह के बंधनों में उन्हें जकड़ा हुआ है और यह सब धर्म और संस्कृति के नाम पर होता है।
दलित साहित्य को लेकर आपकी भविष्य में क्या रणनीति है और क्या योजना है?
दलित साहित्य को लेकर भविष्य में रणनीति और योजना को लेकर इस तरह अभिव्यक्ति नहीं किया जा सकता है। किसी एक लेखक के करने से कुछ नहीं होता। एक समूह होता है लेखकों का। वह अपनी रचनाओं के माध्यम से आने वाले समय को तय करता है।
वरिष्ठ दलित साहित्यकारों ने मार्ग तैयार किया है उस पर चलने के लिए उभरते दलित रचनाकारों का आप कैसे मार्ग दर्शन करना चाहेंगे?
उभरते रचनाकारों को अपनी दृष्टि को साफ करने के लिए अपनी अध्ययनशीलता को बढ़ाना होगा और साहित्य के सरोकारों को गम्भीरता के साथ विश्लेषण करके समझना होगा। आज जिस तरह से स्थितियां बदल रही हैं, उनमें कई तरह की चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। उन चुनौतियों को दूर करना और अपनी प्रतिबद्धता के द्वारा समाज में बदलाव की प्रक्रिया को, रचनाओं के द्वारा रेखांकित करना होगा।
क्या हिन्दी दलित साहित्य पर मराठी दलित साहित्य का प्रभाव है?
दलित साहित्य की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई है और डॉ. अम्बेडकर का आन्दोलन भी पहले महाराष्ट्र में शुरू हुआ और इसके बाद ही देश के अन्य राज्यों में उसका विस्तार हुआ। इस विस्तार के कारण ही हिन्दी में दलित साहित्य का विकास हुआ और यह कोई अनुचित बात नहीं है। एक जगह से दूसरी जगह पर साहित्य का प्रभाव पड़ता है। हिन्दी में इससे पूर्व ऐसी घटनाएं हुई हैं। भक्ति काव्य दक्षिण के प्रभाव से शुरू हुआ। छायावाद पर यूरोप के रोमान्टिक प्रभाव को देखा जा सकता है। निराला पर विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस का प्रभाव देखा जा सकता है। प्रेमचन्द पर आर्य समाज का प्रभाव, गाँधीवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। प्रगतिवाद और प्रयोगवाद पर मार्क्स का प्रभाव देखा जा सकता है। जनवादी दौर की तमाम कहानियाँ वामपंथी प्रभाव से मुक्त नहीं हैं।
आप कहानियाँ लिखते हैं आप अपनी कहानियों के माध्यम से शोषितों को क्या संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं, विस्तार से बताने का कष्ट करेंगे, साथ ही यह भी बताने का कष्ट करेंगे कि समाज में घुसपैठिए कहाँ-कहाँ पर मौजूद हैं?
कहानी मैं सिर्फ शोषितों के लिए नहीं लिख रहा हूँ। मैं कहानियाँ लिख रहा हूँ शोषितों के दर्द को, उनकी वाणी को शब्द देने के लिए ताकि शोषकों के छद्म और शोषण की सही-सही तस्वीर साहित्य के माध्यम से लोगों तक जा सके। वे तमाम लोग जो ये कहते हैं कि देश में जातिवाद नहीं है उन्हें बताया जा सके कि देश में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं और जहाँ तक घुसपैठियों का सवाल है ऐसे लोगों की कमी नहीं है। जो दलितों की हर-एक गतिविधि को अपने कार्य क्षेत्रों में अनावश्यक घुसपैठ मानते हैं। जबकि यह उनकी घुसपैठ नहीं, बल्कि ये उनका मौलिक अधिकार है कि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कर सकें।
कुछ दलित साहित्यकार अपने को डॉ. अम्बेडकर से भी बड़ा स्थापित करने की जुगाड़ में रहते हैं? उनसे दलित साहित्य का कितना भला होगा।
ऐसे लोगों से साहित्य का भला तो बाद की बात है, वे पहले अपने को ही बड़ा बना लें और यदि कोई व्यक्ति डॉ. अम्बेडकर से अपने को ही बड़ा बना लेता है तो यह हीनता की नहीं गर्व की बात होगी लेकिन उससे पहले उसे अपने इर्द-गिर्द अच्छी तरह से देख लेना चाहिए कि वह कहाँ खड़ा है। झूठ ज्यादा दिन नहीं चलता, मुखौटे में भी चेहरा तो दिखायी दे ही जाता है।
साहित्य में दलित विमर्श क्या है? साहित्य में यह कब प्रारम्भ हुआ और वर्तमान में उसकी क्या स्थिति है?
साहित्य में दलित विमर्श से सीधा-सीधा तात्पर्य दलित साहित्य आन्दोलन और अम्बेडकर विचारधारा से है। इसका सूत्रापात डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन से हुआ जो आज भी जारी है। यह विमर्श दलित मुक्ति से जुड़ा है।
दलित आन्दोलन का दलितों के व्यापक धरातल पर क्या कोई प्रभाव पड़ रहा है? अगर पड़ रहा है तो किस प्रकार?
बिलकुल पड़ रहा है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दलितों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की है। जिसकी प्रेरणा उन्हें दलित आन्दोलन से ही मिली है और भविष्य में भी इसके सकारात्मक परिणाम दिखायी देंगे। आज दलितों में मुक्ति की छटपटाहट बढ़ी है। वे समाज में समता, बंधुता के लिए संघर्षरत हैं और यह सब दलित आन्दोलन से प्रेरित होकर हुआ है, इसमें दलित साहित्य ने सकारात्मक भूमिका निभायी है।
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दलित-मार्क्सवादियों का संयुक्त गठबंधन कट्टरवाद से लड़ने में कारगर भूमिका निभा सकता है : कंवल भारती

अंशुमाली रस्तोगी
खैर इसमें दोराय नहीं कि दलित साहित्य ने तमाम विरोधों-अवरोधों के बीच हिंदी साहित्य में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की है, सवर्ण माठाधीशों को चुनौतियां दी हैं - दे रहा है। इन सबके बावजूद दलित साहित्य-लेखन में एक ठहराव-सा आ गया है। नया कुछ नहीं आ रहा है और जो आ रहा है उसमें विमर्श या वैचारिकता की गुंजाइश कम आक्रोश और फूहड़ता अधिक है। इस ठहराव पर आपकी टिप्पणी।
दलित साहित्य में ठहराव-सा आ गया है, इसमें दोराय नहीं। दरअसल एक ही कीली के चारों ओर घूमते रहने को दलित लेखकों ने विकास मान लिया है। वे सब जाति-केंद्रित होकर रह गए हैं। आज के निजी पूंजीवाद के विकास के दौर में दलित वर्ग के सामने इतनी सारी समस्याएं हैं, जिनसे टकराना दलित साहित्यकारों का फर्ज बनता है। पर वे इस ओर से विमुख क्यों हैं? यह प्रश्न मुझे भी पीड़ित करता है। लेकिन यहां मैं एक बात यह जरूर कहना चाहूंगा कि सिर्फ वाल्मीकि, चौहान और बेचैन का लेखन ही एक मात्रदलित लेखन नहीं है। बहुत सारे नए लेखकों ने नई चेतना के साथ दस्तक दी है। वे नया लिख रहे हैं और उनमें वैचारिकता भी है और विमर्श भी। उदाहरण के लिए अजय नवारिया की कहानियों ने दलित कहानी को नया विस्तार दिया है। उन्हें पढ़कर आप यह कह सकते हैं कि दलित लेखन आगे बढ़ रहा है।
हिन्दी दलित साहित्य में एक ऐसा दौर भी आया था यहां आत्मकथाओं का जोर था। सभी दलित लेखक-साहित्यकार अपनी-अपनी आत्मकथाएं लिख रहे थे। कुछ तो अपनी आत्मकथाओं के बल पर स्थापित भी हुए और सम्मान-पुरस्कार भी पाए लेकिन वे दलित लेखन को आत्मकथाओं से बाहर निकालकर उसे उस दलित से नहीं जोड़ पाए जिनके अधिकारों और सम्मान की वे बातें लिखते और किया करते थे/हैं। आखिर क्या हमें दलित साहित्य को आत्मकथाओं तक ही सीमित कर देना चाहिए?
हिंदी दलित साहित्य में आत्मकथाओं का दौर आया नहीं था, आया हुआ है। यह दौर अभी कुछ समय और रहेगा। दरअसल, यह अनुकरण के सिद्धांत का परिणाम है। लोगों ने सोचा कि वाल्मीकि जूठन से ऊपर उठ गए, तो हम भी उठ जाएंगे। हमने भी वही भोगा है, हम भी लिखेंगे। तो लोग लिख रहे हैं। लेकिन वे कोई नया नहीं दे पा रहे हैं। वास्तव में सभी दलितों का सामाजिक यथार्थ समान है, तो सभी आत्मकथाओं में एक-सा ही यथार्थ है। इसलिए सभी आत्मकथाएं पुनरावृत्ति लगती हैं। देखिए, दलित लेखन में सामाजिक यथार्थ तो आना चाहिए। परंतु मेरे विचार में यह जातियों का यथार्थ होना चाहिए। मसलन, चमार का सामाजिक यथार्थ वही नहीं है, जो भंगी का है। जो यथार्थ भंगी का है, वह कंजड़ का नहीं है। जो डोम का यथार्थ है, वह पासी का नहीं है। पासी का यथार्थ मुसहर के यथार्थ से भिन्न है। इसलिए यदि अलग-अलग जातियों के सामाजिक यथार्थ के साथ अलग-अलग आत्मकथाएं आएं, तो उसमें विविधता भी होगी और भारतीय समाज व्यवस्था का विद्रूप भी सामने आएगा। पर यह हो नहीं रहा है और इसलिए नहीं हो रहा है कि सभी दलित जातियों में अभी लेखक पैदा नहीं हुए हैं। १९१४ में छपी हीरा डोम की जो चर्चित कविता है, उसमें डोम जाति का सामाजिक यथार्थ दिखाई देता है। माता प्रसाद की एक बहुत मार्मिक लोक कविता है, मुसहर जाति पर। वह एक तरह से आत्मकथा है मुसहर जाति की। लेकिन कोई लेखक, जो मुसहर जाति से आया है, आत्मकथा लिखेगा, तो वह जूठन और अपने-अपने पिंजरे से बिल्कुल भिन्न होगी। इस यथार्थ को साहित्य में लाने की जरूरत है।
देखिए, कौन किसको भुना रहा है, इस पर तो मैं टिप्पणी नहीं करूँगा। लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि सिर्फ आत्मकथाओं तक ही दलित साहित्य को सीमित नहीं रहना है, वह आगे जाएगा और इस दिशा में युवा दलित लेखक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
अभी तक आपने अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखी?
मैंने आत्मकथा क्यों नहीं लिखी? जहां तक इस बात का सवाल है, तो इसके दो कारण हैं एक तो मेरा जीवन और परिवेश उसी यथार्थ का हिस्सा है जो आत्मकथाओं में अब तक आ चुका है। दूसरे यह कर्म मेरे लिए उतना महत्त्वपूर्ण है, जितना की आलोचना-कर्म है।
प्रायः दलित लेखन में सौंदयशास्त्र की बात की जाती है। सवर्ण लेखकों ने तो कई दफा दलित लेखन में सौंदयशास्त्र के अभाव पर अपनी आपत्तियां भी दर्ज करवायी हैं। हिंदी साहित्य में, खासकर दलित साहित्य में, सौंदयशास्त्र की भूमिका को आप किस नजरिए से देखते हैं?
जब छंदशास्त्र भंग हुआ था तब उसका भी विरोध हुआ था। आज सौंदयशास्त्र भंग भी हो रहा है तो भी विरोध हो रहा है। यह परिवर्तन की धारा है, इसे रोका नहीं जा सकता। जिस तरह छंदशास्त्र भंग हुआ, उसी तरह सौंदयशास्त्र भी भंग हुआ है। ब्राह्मणवादी और सामंती सौंदयशास्त्र को मार्क्सवादी सौंदयशास्त्र ने भंग किया और मार्क्सवादी सौंदर्यचेतना ने जो शास्त्र निर्मित किया, उसे दलित साहित्य ने भंग किया है। देखने का नजरिया ही सौंदयशास्त्र है, जिसका परिवर्तनशील होना जरूरी है। ब्राह्मणों और सामंतों ने जिन प्रथाओं और मूल्यों को धर्म और संस्कृति के नाम पर स्थापित किया, दलित सौंदर्यचेतना ने उन्हें अमानवीय घोषित किया। उसने धर्म और संस्कृति की संपूर्ण विरासत को कटघरे में खड़ा कर दिया। ब्राह्मणवादी सवर्ण आज भी मनुष्य से ज्यादा गाय की गरिमा को मानते हैं - यह उनका सौंदयशास्त्र है। दलित साहित्य इसका खंडन करता है। वह मानवीय गरिमा में आस्थावान है, पशु की गरिमा में नहीं। लेकिन उनके सौंदयशास्त्र में मानवीय गरिमा का हनन और पशु की बलि दोनों साथ-साथ चलते हैं। इस ढकोसले के आधार पर क्या कोई साहित्य स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है? इसलिए, हिंदी साहित्य में दलित साहित्य ने नया सौंदर्यबोध स्थापित किया है। यही उसकी भूमिका है।
युवा दलित कहानीकारों में आपके हिसाब से कौन बेहतर लिख रहा है उनमें कितनी संभावनाएं आप देखते हैं?
मैं किसी भी एक लेखक का नाम लेकर विवाद पैदा नहीं करना चाहता। कई युवा कहानीकार बहुत अच्छी कहानियां लिख रहे हैं। वे न केवल नई परिस्थितियों में नए यथार्थ का चित्रण कर रहे हैं, बल्कि उनका कला-सौष्ठव भी बहुत अच्छा है। ये कहानीकार कलावाद को भी चुनौती दे रहे हैं।
हंस और तद्भव में मार्क्सवाद और दलित पर लिखे लेखों में आपने वर्ग और वर्ण संबंधी समस्या पर काफी गहनता से प्रकाश डाला है। आपने उसमें कहा भी है कि वर्ग से ज्यादा वर्ण की समस्या अहम्‌ है और इसके समाप्त होते ही वर्ग स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे। परंतु हमारे तथाकथित मार्क्सवादी लेखक इस तथ्य को स्वीकारने को तैयार नहीं, उनके प्राण अभी भी वर्ग की स्थापनाओं में अटके पड़े हैं और वर्ण व्यवस्था को वे आज भी आदर्श व्यवस्था मानते हैं, ठीक हिंदुत्ववादियों की तरह। इस वर्ग और वर्ण के बीच छिड़ी जंग का कभी कही अंत होगा भी या नहीं! वे कौन-से कारण हैं जो मार्क्सवादियों को दलितों के साथ जुड़ने से रोकते हैं?
इस विषय पर मैंने बहुत विस्तार से अपनी बातें कहीं हैं। मार्क्सवादी और दलित चिंतन में यही एक बुनियादी अंतर है कि एक पूंजीवाद को तो शत्रु मानता है, ब्राह्मणवाद को नहीं, जबकि दूसरा दोनों को शत्रु मानता है। हमारा कहना है कि ब्राह्मणवाद के कारण ही जातिव्यवस्था टिकी हुई है और यह जातिव्यवस्था ही भारत के मजदूरों और सर्वहारा में एकता स्थापित नहीं होने दे रही है। यही कारण है कि यहां वर्ग-संघर्ष से ज्यादा जाति-संघर्ष है। जाति समाप्त हो जाए तो फिर वर्ग-संघर्ष ही रह जाता है। हिंदुत्ववादी तो न जाति-संघर्ष चाहते हैं और न वर्ग-संघर्ष जबकि उनका अपना वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है। मार्क्सवाद के अब लगभग सभी गुटों ने जाति की सच्चाई को स्वीकार कर लिया है। पर यह बहुत देर से उठाया गया कदम है। यदि डॉ. अम्बेडकर के समय में ही वामपंथियों ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ उनके प्रतिरोध को अपने आंदोलन में शामिल किया होता, तो भारत की शासन-सत्ता सामंतों, ब्राह्मणों और पूंजीपतियों के हाथों में न जाती। अब तो दलित आंदोलन भी भटक गया है और सत्ता प्रतिष्ठान के आंदोलन में बदल गया है। वामपंथ भी रेडिकल और संशोधनवादी दो गुटों में विभाजित हो गया है। कुल मिलाकर क्रांति की शक्तियाँ दयनीय हैं।
सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने में दलित-मार्क्सवादियों का संयुक्त गठबंधन कितनी कारगर भूमिका निभा सकता है, विस्तार में प्रकाश डालें।
यदि सांप्रदायिक ताकतों से आपका मतलब धार्मिक कट्टरवाद से है, तो निश्चित रूप से यह कट्टरवाद सामाजिक परिवर्तन और प्रगतिशील दृष्टिकोण का दुश्मन है और दलित-मार्क्सवादियों का संयुक्त गठबंधन इस कट्टरवाद से लड़ने में सचमुच कारगर भूमिका निभा सकता है। दरअसल, देखा जाए तो दलित और मार्क्सवादी ही कट्टरवाद के खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हैं। लेकिन यदि सांप्रदायिक के प्रतिरोध का अर्थ मुस्लिम समर्थन है, तो दलित इस प्रतिरोध में शामिल नहीं हो सकते। क्योंकि मुसलमानों ने भी दलितों को उतने ही जख्म दिए हैं, जितना हिंदुओं ने। अयोध्या प्रकरण में जिस तरह वामपंथी मुसलमानों का पक्ष लेते हैं, उस तरह दलित नहीं ले सकते। दलित का मत न हिंदू न मुसलमान का है। उसे न हिंदुओं के राम से मतलब है और न मुसलमानों के अल्लाह से। जैसे कबीर ने कहा है - जहां अल्लाह राम का गम नहीं, तहं घर किया। मुसलमान अपनी शरीयत के खिलाफ किसी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। जो मार्क्सवादी मुसलमानों का सबसे ज्यादा पक्ष लेते हैं उन्हें मालूम होगा कि मुसलमान इस्लाम के आगे नहीं जाएंगे और कम्युनिज्म उनका सबसे बड़ा दुश्मन है। ये मुसलमान जो अपने धार्मिक अधिकारों के लिए सारे धर्मनिरपेक्ष लोगों का समर्थन चाहते हैं, वे अपने समाज में व्याप्त जातिभेद और दलितों की बदतर स्थिति पर किसी का दखल पसंद नहीं करते। इस आधार पर दलित मुस्लिम पक्ष में वामपंथ का साथ नहीं दे सकते।
दलित राजनीतिक को नई दिशा में देने में कांशीराम का खासा योगदान रहा है, बसपा उन्हीं के संघर्ष-प्रयास से अस्तित्व में आई थी लेकिन आज उसी पार्टी में कांशीराम कहीं नहीं है। बसपा पर मायावती का एकछत्र कब्जा है और प्रत्येक दंद-फंद का इस्तेमाल कर वे उसे चला भी रही हैं परंतु आम दलित आज भी उनकी पार्टी और सहयोग से कोसों दूर है। मायावती बसपा को किधर ले जाना चाहती हैं और उनका आम दलित के प्रति उदासीनता का भाव क्या प्रकट करता है?
यदि आज कांशीराम कहीं नहीं हैं तो मैं नहीं समझता कि इसका कारण मायावती का बसपा पर कब्जा होना है। किसी एक पर किसी दूसरे का कब्जा करने से उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता है। यदि कांशीराम आज नहीं हैं तो इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं जो नेता अपने ही आंदोलन के खिलाफ चला जाता है, उसे कौन बचा सकता है? रहा सवाल यह कि मायावती दंद-फंद का इस्तेमाल कर बसपा को चला रही हैं, तो मायावती ही क्यों, सभी दलों के सुप्रीमो यही कर रहे हैं। मौजूदा सभी राजनैतिक दलों के प्रति जनता में उदासीनता है। दलित को आप जनता से अलग मत कीजिए। वह उसका ही हिस्सा है। मायावती दलित के नाम की राजनीति करती हैं, इसलिए दलित उनसे अपेक्षा रखता है। मेरी दृष्टि में अब राजनीति के सरोकार बदलने चाहिए, धर्म और जाति की राजनीति प्रतिबंधित होनी चाहिए।
डॉ. अम्बेडकर ने दलितों को समाज और राजनीति में समान अधिकार दिलवाने का जो सपना देखा था और ताउम्र उन्होंने जिसके लिए संघर्ष भी किया उसे दलित नेताओं ने कहां तक पूरा किया है या कर रहे हैं?
आपका प्रश्न सही नहीं है। डॉ. अम्बेडकर ने सपना नहीं देखा था, उसे मूर्त्त रूप दिया था। पूना-पैक्ट उसका उदाहरण है। दलितों के मानवीय अधिकारों के लिए सीधी लड़ाई डॉ. अम्बेडकर ने ही लड़ी थी। वे इस लड़ाई में सफल हुए थे। उनके प्रयासों से ही दलितों को वे संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुए थे, जिनसे वे हजारों वर्षों से वंचित थे। आज के दलित नेता उसी की देन हैं।
डॉ. अम्बेडकर ने दलितों को शिक्षित बनो, संघर्ष करो नारा दिया था लेकिन देखा गया है कि दलितों का एक बड़ा वर्ग, अपवादों को छोड़कर, आज भी शिक्षा-ज्ञान से वंचित है उन्हें पर्याप्त साधन तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में डॉ. अम्बेडकर का दलितों को शिक्षित बनाने का उद्देश्य क्या कभी पूरा हो पाएगा?
डॉ. अम्बेडकर सत्ता के केंद्र नहीं है। वे नेता थे। उन्होंने शिक्षित बनो का जो नारा दिया था उसके लिए दलितों के संघर्षों को सफलता भी मिली है। पर, यदि दलितों का एक बड़ा वर्ग आज भी शिक्षा से वंचित है, तो इसके लिए सरकार की व्यवस्था जिम्मेदार है। व्यवस्था का संचालन वे सामंती और पूंजीवादी शक्तियां कर रही हैं, जो शिक्षा का तीव्र विकास नहीं चाहतीं। अगर दलित शिक्षा से वंचित हैं, तो इसे आप अंबेडकर के सपने या उद्देश्य से मत जोड़िए। यह हमारे जनतंत्र की विफलता है।
प्रायः देखने में आया है राजनीतिक दलों ने दलितों के आर्थिक पक्ष पर उतना जोर नहीं दिया जितना दिया जाना चाहिए था आप इस मसले पर क्या सोचते हैं? घोर पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था से दलितों की मुक्ति कैसे संभव हो सकती है?
यह बात सही है कि राजनीतिक दलों ने दलितों के आर्थिक पक्ष पर ज्यादा जोर नहीं दिया है। वे केवल समाज-कल्याण की कुछ योजनाओं की सिफारिश करते हैं। असल में, लोकतंत्रका यह ढांचा हमें यूरोप के पूंजीवाद ने दिया है। इसका मतलब है कि गरीबों को मरने दो। गरीबी कायम रखो और जो गरीबी की रेखा से नीचे हैं, उनके हितों में कुछ लाभकारी योजनाएं लागू कर दो, ताकि वे सत्ता के खिलाफ बगावत न कर सकें। इसलिए गरीबों को, बूढ़ों को, विधवाओं और निराश्रित महिलाओं को पेंशन दी जाती है और अन्य योजनाएं लागू की जाती हैं। मैं कहता हूं कि आप दलितों को एक लाभांवित किए जाने वाले वर्ग के रूप में क्यों देखते हो? उसे कमजोर समाज के रूप में क्यों नहीं देखा जाता, जिसके विकास पर ही जनतंत्र का विकास निर्भर करता है। आप दलित-मुक्ति की बात करते हैं और घोर पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था में तो जन-मुक्ति भी संभव नहीं है। इसलिए जैसा कि मैंने कहा कि समाजवाद में ही दलित, सर्वहारा और गरीब समाज की मुक्ति संभव है। अन्य कोई भी व्यवस्था आर्थिक विषमता ही पैदा करेगी।
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लोक साहित्य का स्वर्णयुग आने वाला है : डॉ. अर्जुनदास केसरी

डॉ. हरेराम पाठक
आप का बाल्यकाल किन परिस्थितियों में बीता? साहित्य के प्रति आकर्षण आपमें कब से पैदा हुआ?
मेरा बाल्यकाल कठिन संघर्षशील परिस्थितियों में बीता। वर्तमान सोनभद्र जनपद के विजयगढ़ परगना में ब्राह्मण बाहुल्य ग्राम भवानीगाँव में (कोरियांग) जो बेलन नदी का उद्गम स्थल है, १९३९ ई. में एक सामान्य शिक्षक परिवार में मेरा जन्म हुआ था। यह गांव साहित्य, संस्कृति, लोक कला की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। मेरी माँ तुलसीदेवी स्वयं सैकड़ों किस्से-कहानियाँ सुनाती थीं, लोकगीत और जगरनाथिया गाती थीं, जो मुझे बड़ा प्रेरक और प्रिय लगता था। पिता श्री भगवान दास गुरु वाणियाँ सुनाया करते थे। गाँव में नाटक और रामलीला होती थी। मुझे याद है, मैंने एक बार उत्तरा का पाठ किया था। गाँव में चमार नथुआ नृत्य करते थे। होली खूब गायी जाती थी। मेरे भीतर लोक साहित्य के प्रति आकर्षण तभी से पैदा हुआ था।
विशेषकर लोक साहित्य के प्रति आपके झुकाव का क्या कारण है? इसकी प्रेरणा आपको कहाँ से प्राप्त हुई?
इस प्रश्न का उत्तर बहुत कुछ पूर्व प्रश्न के उत्तर में निहित है, तब भी मेरा किशोर काल पकरहट गांव में बीता था जो अभिशप्त कर्मनाशा के तट पर स्थित है और अहीर, आदिवासी बाहुल्य है। वहाँ के लोगों का बहुत कठिन अभावग्रस्त जीवन था। लोक की परख मेरी वहीं से हुई। विरहा, लोरिकी, विजयमल के गीत वहाँ रात-रात भर या कौड़ा पर गाये जाते थे। मैं गाय चराने, महुआ बीनने, घास काटने वन जाया करता था और वहीं गीत की पंक्तियाँ भी गुनगुनाने लगता था। रत्थीनाई, मनीजरी बुदिया, रामदास कुर्मी लोकगाथाएँ लोरिकी, विजयमल सुनाया करते थे। उनको सुनने से लिखने के भाव का बीजांकुरण तभी हो गया था। लोरिकायन, विजयमल गाथाओं को लिखने की प्रथम प्रेरणा मुझे वहीं से मिली थी।
हिन्दी के किस लोक साहित्यकार से आप अधिक प्रभावित हैं? उनसे प्रभावित होने की खास वजह क्या है?
मैं हिन्दी के डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय से सर्वाधिक प्रभावित हूँ। उनसे प्रभावित होने का कारण यह है कि पी-एच.डी. के दौरान सबसे अधिक मदद मुझे उन्हीं से बातचीत के द्वारा और उनके साहित्य से मिली थी। उनकी पुस्तकें लोक साहित्य की विश्व कोश हैं।
लोकवार्ता शोध पत्रिका का प्रकाशन आप कब से करते आ रहे हैं? इस पत्रिका के प्रकाशन में कौन-कौन सी बाधाएँ उपस्थित हुईं थीं?
इसका प्रथम अंक लोकवार्ता नाम से १९८५ ई. में वार्षिकांक के रूप में ६८ पृष्ठों का छपा था। इसकी प्रथम प्रेरणा मुझे अपने गुरु एवं शोध निर्देशक डॉ. श्याम तिवारी से मिली थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. विद्यानिवास मिश्र, भाई ठाकुर प्रसाद सिंह और मोहन लाल गुप्त ने भी हमें इसके लिए प्रेरित किया था। हमें का मतलब है मेरी टीम को जिसमें श्री शेख जैनुल आब्दीन, सुधेंदु पटेल और एस. अतिबल से है। इनमें से सभी समर्पित थे। वे समय के थपेड़े से कट गये तो मैं अकेले बच गया-लगभग। मैं इसे कैसे चला रहा हूँ, अब तक, मैं भी नहीं कह सकता। बस भगवान और मेरा आत्मबल या यों कहें कि मेरी संकल्पशक्ति इसे चला रही है। मैं कभी भी हार नहीं मानता। अर्थ की तो ऐसी बाधाएँ आयीं कि यदा-कदा अपनी तनख्वाह या पेंशन तक लगा देनी पड़ी। आधा पेट खाया-खिलाया, परन्तु उसे प्रकाशित किया। सन्‌ १९९५ से बिना नागा वर्ष में ७५ प्रतिशत तीन अंक तो छप ही रही है।
आज की निरन्तर बदलती हुई अध्ययन की विभिन्न दिशाओं में लोक साहित्य को आप किस जगह पर खड़ा देख रहे हैं?
साहित्य की अन्यान्य विधाओं का विकास हुआ है, परन्तु उनमें लोक साहित्य का दिनों दिन विकास और विस्तार हो रहा है। अब वेद का समय समाप्त प्रायः है, लोक ही बढ़ चढ़ कर रहेगा, लोकतंत्र में। अनेक विश्वविद्यालयों में लोक साहित्य पर बहुत काम हो रहा है। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय सहित अन्य विश्वविद्यालयों में, विदेशों में भी लोक साहित्य स्थान पाने लगा है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में मेरी १३ कृतियों को स्थान मिला है। लोक साहित्य पर बहुत सारी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। शोध कार्य हो रहे हैं। हाँ, संग्रह का कार्य नहीं के बराबर हो रहा है, जो दुःखद है। लोक साहित्य का स्वर्णयुग आने वाला है।
आधुनिक तकनीकी युग में शिष्ट साहित्य भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में लोक साहित्य को बचाये रखने में आप कहाँ तक आशान्वित हैं?
भाई, मुझे आप द्वारा प्रयुक्त शिष्ट शब्द पर आपत्ति है, क्या लोक साहित्य अशिष्ट है। उसे तथाकथित अभिजात्य कहिए। ऐसा कहकर लोगों ने दोनों के बीच दीवार खड़ी कर दी, उपेक्षा भी बहुत की, परन्तु आप ही सोचिए वे कहाँ हैं? कविता, नयी कविता, अकविता, नयी कहानी, अकहानी का अब कोई नामलेवा नहीं है? ललित निबंधकार कितने बचे? हाँ, उपन्यास, कहानी, थोड़ा बहुत नाटक अभी है, परन्तु ये विधाएँ भी अब लोकपरक और आंचलिक हो गयी हैं। आंचलिक होने के कारण प्रेमचंद अमर हैं। मैं पूर्ण आशान्वित हूँ कि लोक साहित्य वाचिक परम्परा या मौखिक परंपरा में रहते हुए भी आज तक अपना अस्तित्व बनाये हुए है, आगे भी बनाये रखेगा, क्योंकि अब उसे लिखा या लिपिबद्ध भी किया जाने लगा है। हाँ, मैं फिर कहता हूँ कि हम सब लोग मिलकर इसे लिपिबद्ध भी कर लें, ताकि शोध-कार्य भी तेजी से चले। लोक साहित्य में लोक विज्ञान है, लोक की सदियों पुरानी तकनीक है।
अभिजात्य साहित्य की तरह लोक साहित्य भी कुछ पेशेवर लोगों तक ही सिमट कर रह गया है। इसे जन-सुलभ बनाने के लिए क्या करना चाहिए?
हमारा पकाया अभिजात्य वाले खा रहे हैं, हम मुँह ताक रहे हैं। कोई पैदा करता है, कोई बनाता है, कोई खाता है, यह जगत्‌ की रीति है। यही तो शोषक और शोषित का अंतर है। उन शोषकों से हमें बचना चाहिए।
जहाँ तक जन-सुलभ बनाने की बात है, वह तो पहले ही से है। उसे जनसाहित्य कहते ही हैं। जनता के बीच से ही वह उन तक पहुँचा है। हाँ, संग्रह, संपादन, प्रकाशन करके उसे जन-जन तक पुस्तकालयों के माध्यम से पहुँचाया जा सकता है। इसीलिए मैं गाँव-गाँव में पुस्तकालय बनाने की बात ही नहीं करता, हर घर में पुस्तकालय की बात का पक्षधर हूँ।
अभिजात्य साहित्य के विभिन्न विधाओं के अलग-अलग सुधी समीक्षक हैं। लोक साहित्य में ऐसे समीक्षकों का अभाव खटकता है। इसके कारण क्या हैं?
पूरे देश में कितने सुधी समीक्षक हैं? आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद उस स्तर के किसी एक समीक्षक का नाम बताइए। समीक्षा विधा भी लुप्तप्राय है। प्रकाशक छद्म नाम से समीक्षाएँ लिखते-लिखवाते हैं, बिक्री के लिए लोक साहित्य कम लिखा ही गया है तो समीक्षक तो कम होंगे ही। अभिजात्य साहित्य के समीक्षक लोक साहित्य की समीक्षा लिख भी नहीं सकता। हमें समीक्षक पैदा करना होगा। लोक साहित्य की पत्रा-पत्रिाकाएँ बढ़ेंगी तो समीक्षाएँ भी लिखी जायेंगी।
आप अपनी किस रचना को सर्वोत्कृष्ट मानते हैं और क्यों?
मैं तो लोरिकायन को ही अपनी सर्वोत्कृष्ट कृति मानता हूँ, क्योंकि यह भोजपुरी की सबसे लोकप्रिय, लोक विश्रुत लोकगाथा है जिसे पहली बार ७ वर्षों के अथक श्रम से मैंने लिपिबद्ध किया था किसी लोकगाथा के लिपिबद्ध करने का यही श्रीगणेश था। उसके पहले किसी ने इतनी विशाल गाथा को लिपिबद्ध प्रामाणिकता और क्रमबद्धता-समग्रता के साथ किया हो तो बताइए। आप कहेंगे, यह मेरा अहम्‌ बोल रहा है। नहीं भाई, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तो इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था - किसी लोकगाथा को लिखने का यह प्रथम कार्य है। इसके लिए इतना श्रम किया गया है कि इस पर एक लाख रुपये का पुरस्कार भी कम है। बात का प्रसंग यह है कि इसकी पाण्डुलिपि पर राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार(उ.प्र. हिन्दी संस्थान का) देने पर विवाद खड़ा हो गया था। तब उसकी टंकित तीन प्रतियाँ भाई ठाकुर प्रसाद सिंह ने (निदेशक) निर्णय के लिए तीन विद्वानों के पास भेजी थीं-द्विवेदी जी, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय और डॉ. रघुवंश (इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष) तीनों ही ने कलम तोड़कर इस कार्य को सराहा था और तब आचार्य द्विवेदी, महादेवी वर्मा, रामविलास शर्मा, रामकुमार वर्मा, सेठ गोविन्ददास जैसे विद्वानों के साथ इस आदिवासी लेखक को भी सर्वोच्च नामित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से ३७ वर्ष की अवस्था में सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
इस कृति पर केंद्रित होकर मैंने लोरिकायनः एक अध्ययन नाम से शोधकार्य किया जो बाद में प्रकाशित हुई और उस पर बिहार सरकार राजभाषा विभाग का सर्वोच्च नामित विद्यापति पुरस्कार मिल गया। इस कृति पर एक था लोरिक, एक थी मंजरी, लोरिकायन का चरित्रसंगठन और काव्य सौष्ठव नामक दो और कृतियाँ प्रकाशित हुयीं। बिहार से भी इस पर शोधकार्य हुआ। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रश्नपत्र में इससे प्रश्न पूछे जाते हैं। इस पर अध्ययन की और भी संभावनाएँ हैं - जैसे भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, कथा-संरचना एवं कथा-रूढ़ियाँ आदि। रामार्णल के तीन खण्डों का संपादन पुनर्लेखन मेरा दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य है, समय आने पर उसे समझा जायेगा।
लोक साहित्य एवं लोक कलाओं के संग्रह-संकलन हेतु सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका कैसी रही है? क्या आप उनके क्रिया-कलापों से संतुष्ट हैं।
लोक साहित्य एवं लोक कलाओं के संग्रह संकलन हेतु सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं की न भूमिका रही है न रहेगी। पहले सूचना विभाग ऐसे कार्य करता था। पं. रामनरेश त्रिापाठी के संग्रह छपे। आज वोट की राजनीति का जहाँ बोलबाला हो, वहाँ यह सब कार्य नहीं हो सकता। पहले सरकारी संस्थाएँ, केन्द्र में कार्य कराती थीं, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद से अच्छा कार्य हुआ। आदिवासी लोक कला परिषद् भोपाल से श्री कपिल तिवारी भी अच्छा कार्य कर-करा रहे हैं और जगहों से कुछ होता होगा, मुझे पता नहीं है। मैं सरकारी संस्थाओं के क्रिया-कलापों से कतई संतुष्ट नहीं हूँ। दो हजार कजरियों का संग्रह करके मैंने उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी को पच्चीस वर्ष पहले दिया था, एक कजली नहीं छपी। उ.प्र. संस्कृति विभाग में मेरी एक पुस्तक पड़ी है। एक केन्द्र सरकार में भी है, कहाँ छप रही है। इसके लिए और सरकारी संस्थाओं को आगे आकर टीम बनाकर काम-करना, कराना होगा। असम की लोक कलाओं का संग्रह आप करिये कराइए न। ऐसे ही और लोग भी करें।
लोक साहित्य के अध्येताओं को आप कौन-सा संदेश देना चाहते हैं?
यही कि जो जहाँ है, वह काम करें। तमाम लोकवार्ताओं का संग्रह टीम भावना से मिशन बनाकर करने की जरूरत है। हर विश्वविद्यालय महाविद्यालय में हिन्दी विभाग के अन्तर्गत लोकवार्ता प्रमाण बनाया जाये। सामग्री संकलित कराकर उस पर निरंतर कार्य कराया जाये।
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देह से नहीं दिमाग से होगी स्त्री-मुक्ति : चित्रा मुदगल

श्याम सुशील
चित्रा जी, पिछले दिनों राष्ट्रीय सहारा में मैनेजर पाण्डेय, राजेन्द्र यादव और निर्मला जैन के बीच काफी वाद-विवाद और प्रतिवाद हुआ-स्त्रीलेखन को लेकर। लेकिन उनकी बहसों के केन्द्र में, खासकर राजेन्द्र यादव के लिए स्त्रीलेखन का मतलब देह तक सीमित है। जबकि निर्मला जैन देह के साथ स्त्रीके मन की भी बातें करती हैं और इसी संदर्भ में उन्होंने कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और आप सबकी चर्चा की। इन बहसों को लेकर आप क्या सोचती हैं?
सुशील जी, स्त्रीविमर्श पर जिस तरह की साहित्यिक बहसें चल रही हैं, मुझे लगता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सोच की बात कर रहा है और अपनी सोच को वह स्त्रीविमर्श की परिभाषा के रूप में रेखांकित होते देखना चाहता है। हालांकि यह बहुत स्वस्थ प्रक्रिया है कि स्त्रीविमर्श को लेखक, समीक्षक और विद्वानजन अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर रहे हैं और इससे हमें मुख्य बिन्दुओं तक पहुँचाने का रास्ता भी मिलता है। लेकिन रास्ता तब अवरुद्ध होता लगता है, जब राजेन्द्र यादव जैसे महत्त्वपूर्ण रचनाकार स्त्रीविमर्श को अपनी सोच से परिभाषित करने की कोशिश में उसे सीमित कर देते हैं। राजेन्द्र की चेष्टा हमें अवाक्‌ करती है कि यह स्त्रीविमर्श को सही अर्थों में परिभाषित करने का प्रयत्न है या उसकी आड़ में स्त्रीदेह को ले करके अपनी कुण्ठाओं की अभिव्यक्ति है। यहाँ मुझे मल्लिका सेहरावत और राजेन्द्र यादव के स्त्रीविमर्श में कोई विशेष फर्क नज+र नहीं आता। औचित्य खोजने का पराक्रम-भर है। कुछ लोग समझते हैं कि देह से मुक्ति में ही स्त्रियों की मुक्ति है और उस मुक्ति को वह देह के निचले हिस्से में ही खोजते हैं। उन्हें स्त्रीधड़ के ऊपर एक अदद मस्तिष्क नज+र नहीं आता, जो पुरुषों के मुकाबले उतना ही उर्वर है। मुझे उसी मस्तिष्क की सामाजिक पहचान और मान्यता में ही स्त्रीविमर्श की सही परिभाषा नजर आती है। आधी आबादी की पहचान का संघर्ष और विमर्श उसी को अर्जित करने का संघर्ष है। स्त्रीधड़ के निचले हिस्से की बात करने वाला लेखक बड़ी चालाकी से स्त्रीधड़ के ऊपर अवस्थित उसके मस्तिष्क को अनदेखा और उपेक्षित कर उसकी पुरुष सत्तात्मकता को ही जाहिर कर रहा है ताकि वह स्त्रीधड़ के निचले हिस्से का अपने धड़ के ऊपर के मस्तिष्क के माध्यम से जिस तरह चाहे उपयोग कर सके। वह स्त्रियों को बेवकूफ बनाना चाहता है।
मैं समझती हूँ कि मस्तिष्क की पहचान के साथ ही आधी आबादी की समाज में निर्णायक भागीदारी को स्वीकृति हासिल हो जाएगी हासिल हो रही है, लेकिन अभी उसे अपनी धरती, अपना क्षितिज और अपना आकाश जहाँ और जिस सीमा तक उपलब्ध होना चाहिए, नहीं हो रहा, नहीं दिया जा रहा, बल्कि पुरुष वर्चस्व स्त्रीविमर्श के आन्दोलन से अतिरिक्त सतर्क और सावधान हो रहा है और उसे दिग्भ्रमित करने के अनेक मंच सृजित किए जा रहे हैं, जहाँ स्त्रीके परम हितैषी होने के दावे-प्रतिदावे ऊँची आवाज में किए जा रहे हैं। स्त्रीका दैहिक उत्पीड़न और बढ़ गया है, जब से वह अपने स्व की लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में डंके की चोट पर उतर आई है, चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो, राजनीति का क्षेत्र हो, चाहे सेना हो या गाँव। गाँव में हमारी आधी आबादी का बहुत बड़ा प्रतिशत जो अभी भी नाक तक घूँघट को खींच, सूर्य की ओर अपनी आँखें नहीं उठा पाता है, और इक्कीसवीं सदी में भी लोटा लेकर खेतों में जाने को मजबूर है और शोषित होता है इन सबकी लड़ाई चैतन्यशील स्त्रीलड़ रही है और निश्चय ही वो उसे पालतू भेड़-बकरी की परिभाषा से बाहर लाएगी और बताएगी कि तुम्हारे इस घूँघट के भीतर का जो मस्तिष्क है, वह पुरुषों के मस्तिष्क से किसी तरह से कम नहीं है और तुम्हारी देह को अपवित्र करने वाले जब कुएँ और तालाबों में डूबकर नहीं मरते तो तुम्हें भी डूबकर मरने की जरूरत नहीं है। इस बात को महिलाएँ समझ रही हैं, चेतना ग्रहण कर रही हैं और इसी का परिणाम है कि अब शहरों में जिन लड़कियों के साथ देह उत्पीड़न होता है, वो लड़कियाँ बस और टे्रन के नीचे जाकर स्वयं को खत्म नहीं कर रही हैं, बल्कि यह साहस दिखा रही हैं कि पुलिस स्टेशन में जाकर उन बलात्कारियों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करवा रही हैं। इन लड़कियों की अपने दैहिक शोषण के खिलाफ यह पहल, अपने उनके मस्तिष्क और उनकी चेतना की पहचान है क्योंकि उनके मस्तिष्क ने ही उन्हें यह साहस दिया कि अपने देह के निचले हिस्से के शोषण का प्रतिकार वे बेखौफ होकर करेंगी और उनके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगी। मस्तिष्क की चेतना ने ही उन्हें यह साहस प्रदान किया है कि वे अपने धड़ के नीचे की लड़ाई भी लड़ सकें। जब तक वो अपने मस्तिष्क की चेतना से सम्पन्न नहीं थीं तब तक धड़ के नीचे की लड़ाई लड़ने की वो हिम्मत नहीं जुटा सकती थीं या अपने विषय में निर्णय नहीं ले सकती थीं कि उन्हें क्या करना चाहिए। दूसरे लोग निर्णय लेते थे कि देह के अपवित्र हो जाने के बाद उन्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं है। यह निर्णय भी पुरुषसत्तात्मक समाज ने ही लिया था, क्योंकि वह अपनी स्त्रीमें किसी की साझेदारी नहीं चाहता था, उसके मन की बात तो दूर। इसी तरह से उसके घर में जो उसकी स्त्रीबनकर आने वाली होती, उसकी यौन शुचिता भी उसके लिए जरूरी थी।
अगर समाज में आधी आबादी को अपने मस्तिष्क की पहचान मिल जाएगी तो वह अपनी इच्छा-अनिच्छा की लड़ाई भी लड़ लेगी और अपने तईं होने वाले उत्पीड़नों का प्रतिकार साहस के साथ कर सकेगी। स्त्री विमर्श में स्त्री के मस्तिष्क के पहचान की लड़ाई की बात न करके राजेन्द्र यादव ने यह साबित कर दिया है कि वह स्त्री विरोधी व्यक्ति हैं फ्यूडिस्टिक आचरण वाले व्यक्ति हैं। उनके विषय में मन्नू जी ने भी यह बात स्वीकारी है। राजेन्द्र जी को वही स्त्रियाँ स्वचेतना सम्पन्न लगी हैं जो धड़ के नीचे वाले स्त्री विमर्श के समर्थन में आगे आईं और उनकी रचनाओं में भी, वक्तव्यों में भी यह एकपक्षीय स्त्री विमर्श रेखांकित हुआ है, शायद वह मन से उसकी समर्थक न हों।
आज हिन्दी आलोचना में स्त्री, दलित, आदिवासी आदि जिन मुद्दों पर बहसें हो रही हैं, उसे आप कितना जरूरी समझती हैं। जबकि आप हिन्दी आलोचना की परम्परा को देखें तो वहाँ सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक विकास की प्रक्रिया, मार्क्सवाद आदि बड़े-बड़े मुद्दे रहे हैं। एक लेखिका होने के नाते आपके लिए आलोचना या इस तरह के विमर्श का अर्थ क्या है?
मेरे लिए साहित्यिक आलोचना या विमर्श का अर्थ समाज के सर्वांगीण सरोकारों से है। स्त्रीविमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श को भी उसी परिप्रेक्ष्य में संतुलन और विवेक और विवेच्य दृष्टि के साथ देखा, परखा और मूल्यांकित किया जाना जरूरी है, नहीं तो किसी की भी पक्षधरता का अतिवाद साहित्य के सरोकारों के संतुलन को डगमगाता है। एक तरफ आप पँसेरी चढ़ा दीजिए और दूसरी तरह सेर भी न रखिए तो तराजू असंतुलित हो जाएगा और न्याय नहीं होगा। बल्कि दलित और स्त्रीविमर्श की अतिवादिता ने चाहे वह लेखकों के द्वारा हो या समीक्षकों के विकासशील समाज की किशोर और युवा पीढ़ी की कठिनाइयों और जटिलताओं को लगभग अनदेखा कर रही है; जिनके कंधों पर विकासशील समाज की समृद्धि, संस्कार और एक समतामूलक समाज का सपना टिका हुआ है। आज अगर किसान आत्महत्या कर रहा है तो नई पीढ़ी भी चौंधियाते मॉलों की छठी और सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर रही है। इन गाँठों को आखिर कौन खोलेगा, कौन मूल्यांकित करेगा? समीक्षक को वर्गरहित, जातिरहित तथा गुटबंदी रहित हो कर के रचना को रचनात्मक उसकी समग्रता में मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि लेखकों के साथ वह भी (आलोचक) खेमों में बँटकर और ओछी राजनीति में उलझकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परम्परा को विस्मृत कर चुके हैं, बल्कि उससे आगे बढ़कर जो नए प्रतिमान उन्हें स्थापित करने चाहिए थे, मुझे लगता है कि कुछ विद्वान ही ऐसा कर पा रहे हैं।
कुछ ऐसे आलोचकों के बारे में आप बताएँ, जिन्होंने हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित किए हैं या कर पा रहे हैं?
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की परम्परा में डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. विजय मोहन सिंह, शिवकुमार मिश्र, मैनेजर पाण्डेय, सुधीश पचौरी, मधुरेश, पुष्पपाल सिंह, निर्मला जी हैं। निर्मला जैन जितनी विदुषी हैं, उसका स्वतंत्रउपयोग उन्होंने नहीं किया। निर्मला जी जैसी विदुषी ने अपनी एक स्वतंत्रसत्ता नहीं बनाई। कभी वो नामवर जी की आवाज लगीं, कभी नगेन्द्र जी की आवाज लगीं, कभी राजेन्द्र यादव की। उन्होंने इन लोगों से स्वतंत्रकिसी कृति की स्थापना नहीं की। हाँ, देवीशंकर अवस्थी और मलयज ने आलोचना में जिस स्वस्थ परम्परा की शुरूआत की, दुख इस बात का है कि वे असमय हमसे छिन गए। इन लोगों ने उन लोगों के लेखन की शक्ति को रेखांकित किया। जिनके नाम कुछ दिग्गजों ने कभी नहीं लिये।
हिन्दी के नए आलोचकों से आपकी उम्मीदें क्या हैं? किन लोगों में आपको संभावनाएँ दीखती हैं, जो आलोचना में नई चीजों को लेकर आ रहे हैं?
नए लोगों में अजय तिवारी, महेश दर्पण, देवेन्द्र चौबे, अरविन्द त्रिापाठी, ज्योतिष जोशी, अनामिका, पंकज चतुर्वेदी और इधर साधना अग्रवाल भी एक निष्पक्ष समीक्ष्य दृष्टि विकसित कर रही हैं। अच्छी बात यह है कि ये लोग किसी एक खाँचे से पोषित पल्लवित नहीं हो रहे। इनका मेग्नीफाइन ग्लास सूक्ष्म से सूक्ष्म पक्षों की परिणितियों को भी दृष्टि में रखता है और ये चरित्रों के दबावजन्य प्रभावों और उनसे उपजी मनोवैज्ञानिक संरचनाओं का अध्ययन गहरी संवेदना और सरोकारों के साथ जिस तरह चलनी से चाल कर, निथारकर जिस तरह से हमारे सामने रखते हैं, किसी भी रचना या कृति को, सहमतियों और असहमतियों के बावजूद-उसके निकट से निकटतर होने का पाठकीय अवसर उपलब्ध होता है, जो दुराग्रह जनित नहीं लगता है।

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